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हरित क्रांति नहीं किसानों की आत्महत्या है पंजाब में चुनावी मुद्दा

राजीव खन्ना | Updated on: 8 February 2016, 23:20 IST
QUICK PILL
  • कभी हरित क्रांति का केंद्र रहे पंजाब में आज किसानों की दुर्दशा और उनकी आत्महत्या को लेकर सुर्खियों में है. आम आदमी पार्टी और कांग्रेस किसानों की आत्महत्या के मामले को राजनीतिक मुद्दा बना रही है.
  • पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी (पटियाला) और अमृतसर के गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी के एक सर्वे के मुताबिक 2000 से 2011 के बीच 6,926 लोगों ने आत्महत्या की, इसमें से 42 फीसदी यानी 2,972 कृषि मजदूर थे.

पंजाब में किसानों की दुर्दशा और उनकी आत्महत्या का मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक विमर्श का केंद्र होगा. पंजाब में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. तीन दशक पहले तक कोई शायद यह सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन पंजाब में कृषि समस्या इस कदर बढ़ जाएगी कि किसानों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ेगा. पंजाब हरित क्रांति का केंद्र रहा है. हालांकि अब कृषि समस्या पंजाब की सच्चाई है. 

राज्य में किसान और मजदूरों को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ रहा है. किसानों के आत्महत्या का सिलसिला थम नहीं रहा है और आने वाले दिनों में यह पंजाब की राजनीतिक का बड़ा मुद्दा बनने जा रहा है. पंजाब में फिलहाल 10.53 लाख किसान परिवार हैं और इनमें से 3.6 लाख परिवार छोटे और मझोले किसानों की श्रेणी में आते हैं जिनके पास पांच एकड़ से कम की भूमि का मालिकाना हक है.

ग्रामीण इलाकों में किसानों की आत्महत्या के पीछे क्या तात्कालिक कारण है इसके बारे में अभी कुछ साफ नहीं है लेकिन इस समस्या के मूल में आर्थिक तंगी है. अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ताओं को लगता है कि इस समस्या से निजात पाने के लिए लंबी रणनीति पर काम करना होगा और राजनीतिक दलों को इस मामले में दृढ़ इच्छाशक्ति दिखानी होगी.

क्या है समस्या की मूल वजह?

किसानों की आत्महत्या पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों के मुताबिक आत्महत्या की खबरें 1980 के दशक में आनी शुरू हुई लेकिन इसने 1990 के दशक में जोर पकड़ा. हालांकि पिछले डेढ़ दशक में यह खतरनाक स्तर पर जा पहुंचा है.

सबसे बड़ी समस्या यह है कि सरकार कृषि क्षेत्र में मौजूद समस्या की स्थिति को मान ही नहीं रही है. सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल एंड इंडस्ट्रियल डिवेलपमेंट में जवाहर लाल नेहरू चेयर के अध्यक्ष आर एस गुमान बताते हैं कि 2006-07 तक किसानों की आत्महत्या का मुद्दा कोई मुद्दा ही नहीं था. 

गुमान बताते हैं, 'केंद्र सरकार की राहत पैकेज के अधीन शायद ही आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को मुआजवा दिया जाता था क्योंकि राज्य सरकार इसे आत्महत्या मानती ही नहीं. शिरोमणि अकाली दल ने 2007 में स्थानीय प्रशासन की मदद से एक सर्वे कराया जिसमें यह बात सामने आई कि राज्य में महज 32 किसानों ने आत्महत्या की. इसी समय भारतीय किसान यूनियन ने अपनी तरफ से एक आंकड़ा जारी किया जिसके मुताबिक करीब 2600 किसानों ने आत्महत्या की थी.'

2000-11 के बीच 6,926 लोगों ने आत्महत्या की और जिसमें से 42 फीसदी यानी 2,972 कृषि मजदूर थे

उन्होंने कहा कि सरकार ने बाद में पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, पंजाबी यूनिवर्सिटी (पटियाला) और अमृतसर के गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी को सर्वे का आदेश दिया और इस सर्वे को अब तक का सबसे प्रमाणिक शोध माना जाता है. सर्वे के मुताबिक 2000-11 के बीच 6,926 लोगों ने आत्महत्या की और जिसमें से 42 फीसदी यानी 2,972 कृषि मजदूर थे.

बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम कर चुके और अब किसानों के बीच काम कर रहे इंद्रजीत सिंह जैजी बताते हैं, 'किसानों की आत्महत्या का आंकड़ा जानबूझकर कम दिखाया जाता है क्योंकि राज्य और केंद्र सरकार यह संदेश नहीं देना चाहते कि कृषि क्षेत्र में परेशानी मौजूद है.' उन्होंने कहा कि सरकार ने अब आत्महत्या को लेकर सर्वे का आदेश दिया है और विशेषज्ञों की माने तो यह चुनावी चाल है.

कैसे निकलेगा समाधान

किसानों के बीच आत्महत्या के बढ़ते मामलों पर रोक लगाने के लिए कई तात्कालिक और लंबी रणनीति पर काम करने की जरूरत है. आत्महत्या करने वालों में कृषि मजदूरों का अनुपात करीब 50 फीसदी है और इन पर आर्थिक तंगी का सबसे बुरा असर पड़ा है.

गुमान बताते हैं कि सरकार को मरने वाले किसानों के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजा की रकम बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर देना चाहिए और इस रकम का आधा हिस्सा फिस्स्ड डिपॉजिट में रख देना चाहिए. उन्होंने कहा, '1980 के बाद से राज्य की प्राथमिकता विकास से बदलकर कानून और व्यवस्था को बनाए रखने पर जा टिकी है. स्वास्थ्य और शिक्षा के मद में दी जाने वाली बजट में कटौती की गई है.'

सबसे बड़ी विडंबना यह रही कि 2006-07 तक किसानों की आत्महत्या देश में कोई बड़ा मुद्दा ही नहीं रहा

गुमान ने कहा ग्रामीण क्षेत्रों में गैर कृषि अर्थव्यवस्था को भी बढ़ाया जाना चाहिए क्योंकि केवल कृषि के भरोसे जिंदगी चलाना अब असंभव हो चुका है. पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सुखपाल सिंह बताते हैं, 'किसानों को जो भी सब्सिडी दी जाती है उसे तार्किक तरीके से व्यवस्थित किया जाना चाहिए. मसलन सरकार बिजली पर 4800 करोड़ रुपये की सब्सिडी देती है लेकिन छोटे और मझोले किसानों को इस रकम का महज 8 फीसदी लाभ मिलता है. यही हाल सिंचाई और कर्ज पर दी जाने वाली सब्सिडी का है.' उन्होंने कहा कि छोटे और मझोले किसानों के लिए अलग से फसल की खेती का पैटर्न तय किया जाना चाहिए.

सरकार की भूमिका महज मुआवजा देने की रही है. कांग्रेस और आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को अपना चुनावी एजेंडा बना रही हैं जबकि शिरोमणि अकाली दल इस मामले में बचाव की भूमिका में है. अकाली सरकार ने डैमेज कंट्रोल की कोशिशों के तहत आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को उसी दिन 3 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने की घोषणा की है. हालांकि सूत्रों की माने तो सरकार की जल्दबाजी में की गई यह कोश्शि उसके लिए खतरनाक साबित हो सकती है. 

First published: 8 February 2016, 23:20 IST
 
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