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किसान आंदोलन: CM फडणवीस को क्यों कहना पड़ा 'सभी आंदोलनकारी किसान नहीं'

सुनील रावत | Updated on: 12 March 2018, 14:50 IST

महाराष्ट्र में हजारों की संख्या में आंदोलन कर रहे किसानों ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस का दावा है कि 95 प्रतिशत प्रदर्शनकारी आदिवासी हैं और उन्हें तकनीकी रूप से किसान नहीं कहा जा सकता. जबकि अखिल भारतीय किसान सभा के नेताओं का कहना है कि यह विरोध प्रदर्शनों को बदनाम करने के लिए सरकार की ओर से एक प्रयास है.

किसानों की मुख्य मांगों में कृषि ऋण, बिजली बिल, फसलों के लिए बेहतर मूल्य, किसानों के लिए पेंशन योजना, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों के कार्यान्वयन और वन उत्पाद को नियंत्रित करने वाले कानूनों का उचित कार्यान्वयन है.

 

ऋण माफ़ी पर सवाल 

पिछले साल महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने 89 लाख किसानों के लिए 34,022 करोड़ रुपये की ऋण माफी योजना की घोषणा की थी. लेकिन सभी किसान इसके लिए पात्र नहीं थे. किसानों का आरोप है कि ऋण माफी के कार्यान्वयन बड़ी गड़बड़ियां हुई है. योजना के घोषित होने के छह महीने बाद भी लक्षित किसानों को आधे से कम छूट की बात कही गई है.

मौसम और खराब वर्षा ने फसलों को नष्ट कर दिया गया है. महाराष्ट्र के आर्थिक सर्वेक्षण में अनुमान लगाया गया है कि अनाज, दाल और कपास की फसलों के उत्पादन में कमी के चलते वित्तीय वर्ष 2017-18 में नकारात्मक कृषि विकास 8.3 फीसदी पर रहेगा.

सूखा, अपर्याप्त मूल्य निर्धारण नीतियां और जल संकट ने राज्य में कृषि को प्रभावित किया है. अनाज, दाल, तिलहन और कपास का उत्पादन क्रमशः 4 प्रतिशत, 46 प्रतिशत, 15 प्रतिशत और 44 प्रतिशत घटने की उम्मीद है. पिछले साल के मुकाबले अनाज, दालों और तिलहन के क्षेत्र में क्रमशः 42 प्रतिशत, 6 प्रतिशत और 60 प्रतिशत की कमी आई है.

 

किसान आंदोलन के पीछे राजनीति 

महाराष्ट्र के मंत्री गिरीश महाजन ने कहा, वह किसानों के साथ दोपहर 1 बजे बैठक में हम किसानों के मुद्दों का 80-90% समाधान कर देंगे. उन्होंने कहा हम ऋण माफी सहित मांगों के बारे में गंभीर हैं और सबसे अच्छे निर्णय लेंगे, स्वीकृत मांगों के लिए लिखित आश्वासन दिया जाएगा.

राज्य में कृषि संकट ने किसानों में गुस्सा भरा है लेकिन किसानों का मुंबई मार्च बिना राजनीति के संभव नहीं था. मार्च का नेतृत्व अखिल भारतीय किसान सभा (एआईकेएस) कर रही है जो सीपीएम से संबद्ध एक संगठन है. इस मार्च का शिवसेना, एनसीपी, कांग्रेस और महाराष्ट्र नवनिर्माण सहित सभी विपक्षी दलों ने मार्च का समर्थन किया है.

विपक्षी दल कृषि संकट को एक प्रमुख मुद्दे में बदल रहे हैं. यह मोदी सरकार और भाजपा को किसी भी अन्य मुद्दे की तुलना में मुश्किल में लगा सकता है. क्योकि आंदोलन पूरी तरह किसी पार्टी का तैयार किया हुआ नहीं है. मार्च मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आगामी विधानसभा चुनावों में विपक्ष की चुनौती को मजबूत कर सकता है, क्योंकि ये सभी कृषि वाले राज्य हैं और किसान यहां पहले से ही आंदोलित हैं.

First published: 12 March 2018, 14:44 IST
 
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