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धान के कटोरे' में 30 लाख किसान बेहाल

शिरीष खरे | Updated on: 1 October 2016, 2:26 IST
QUICK PILL
  • \'धान का कटोरा\' कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की में किसानों की स्थिति प्रधानमंत्री के रुख के ठीक उलट जाती दिख रही है. जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक दशक में यहां किसानों की संख्या 12 फीसदी घट गई. इसी दौरान 70 फीसदी खेतीहर मजदूर बढ़ गए.
  • कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेतिहर मजदूर बनने वाले ज्यादातर छोटे किसान ही हैं. इस तबके के किसानों को अपनी जमीन गंवानी पड़ी है. ऐसा या तो औद्योगिक परियोजनाओं और विकास कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण के कारण हुआ है या फिर खेती में बार-बार घाटा होने से किसानों ने खुद ही इससे तौबा कर ली है.

तारीख 1 अगस्त 2014, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी से नई-दिल्ली में व्यापार सुविधा समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेदों पर वार्ता कर रहे थे. इसमें प्रधानमंत्री ने अमेरिकी रुख पर अपना स्पष्ट मत जता दिया कि भारत की पहली प्राथमिकता छोटे किसान हैं और व्यापार समझौते में उनके हितों से किसी तरह का समझौता नहीं होगा. मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय से ज

जारी बयान में कहा गया-'अमीर देशों को भारत में छोटे किसानों की समस्या से निपटने की जिम्मेदारी समझनी चाहिए.' दूसरी तरफ, 'धान का कटोरा' कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ की स्थिति प्रधानमंत्री के इस रुख के ठीक उलट जाती दिख रही है. 

जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक दशक में यहां किसानों की संख्या 12 फीसदी घट गई. इसी दौरान 70 फीसदी खेतीहर मजदूर बढ़ गए.

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेतीहर मजदूर बनने वाले ज्यादातर छोटे किसान ही हैं. इस तबके के किसानों को अपनी जमीन गंवानी पड़ी है. ऐसा या तो औद्योगिक परियोजनाओं और विकास कार्यों के लिए भूमि अधिग्रहण के कारण हुआ है या फिर खेती में बार-बार घाटा होने से किसानों ने खुद ही इससे तौबा कर ली है.

बीते वर्ष धमतरी जिले के रतन साहू ( बदला हुआ नाम) को सूखे के चलते अपने खेतों में धान की सिंचाई के लिए पंप खरीदना पड़ा. इसके लिए उसने स्थानीय साहूकार से कर्ज लिया. उसने नजदीक के सरकारी बैंक में कर्ज लेने के बारे में नहीं सोचा. उसकी माने तो वह बहुत पढ़ा-लिखा नहीं है और बैंकों में अधिकारियों से बात करने में उसे डर लगता है. रतन एक छोटा किसान है और कोई ढाई एकड़ खेत में धान बोने से उसकी गृहस्थी को

थोड़ा सहारा मिल जाता है. बीते साल अल्प वर्षा के कारण खेतों में धान की फसल को बचाने के अलावा उसके पास साल भर जीने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी. समय बहुत कम बचा था, इसलिए मजबूरन उसे उधार पैसा लेकर पंप खरीदना पड़ा था.

छत्तीसगढ़ में करीब 30 लाख से ज्यादा छोटे किसानों की यही हालत है.

कृषि विशेषज्ञ संकेत ठाकुर बताते हैं, "राज्य में 80 फीसदी लघु-सीमांत किसान हैं. अधिकांश असिंचित रकबा इन्हीं के पास है, जो मानसून पर निर्भर होने के कारण साल में एक ही फसल लेते हैं. अल्प-वर्षा की स्थिति में प्रकृति की मार भी इन्हीं पर पड़ती है और मुआवजा राहत की राजनीति के भी यहीं शिकार होते हैं. इसमें अधिकांश आदिवासी और दलित हैं. इन्हीं लोगों को बड़ी संख्या में काम के लिए राज्य से बाहर पलायन करना पड़ता है. इस साल भी कहीं स्थानों पर पर्याप्त बारिश न होने के कारण छोटे किसान आशंकित हैं कि उनकी धान पकेगी या नहीं!"

संकेत के मुताबिक बीते 16 वर्षों में सिंचाई का रकबा 23 से 32  फीसदी ही बड़ा है, जो बताता है कि सरकार का इस ओर कितना ध्यान है. गौरतलब है कि सिंचाई की सुनियोजित सुविधा नहीं होने से 90 फीसदी किसान साल में दो फसल नहीं ले पाते. 

विशेषज्ञ की इस राय पर राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की रिपोर्ट भी मोहर लगाती है. यह कहती है, 2 हेक्टेयर तक की जमीन पर खेती करने वाले छोटे या सीमांत किसान उसकी आमदनी से औसत मासिक खर्च की भरपाई नहीं कर पाते. 

सिंचाई की सुनियोजित सुविधा नहीं होने से 90 फीसदी किसान साल में दो फसल नहीं ले पाते.

फसल अच्छी हो जाए और उसकी कटाई भी हो जाए तो भी छोटे किसान की सारी परेशानी हल नहीं हो जातीं. इसके बाद एक और कष्टदायक सफर शुरू होता है. 

दरअसल, छोटे किसानों के लिए खरीद केंद्रों तक फसल ले जाने के लिए ढुलाई काफी महंगी पड़ती है. इससे वहां के बिचौलियों को खेत से ही औने-पौने दाम पर फसल खरीदने का मौका मिल जाता है. जैसा कि किसान नेता राजकुमार गुप्ता बताते हैं, छोटे किसानों के पास भंडारण की व्यवस्था

 नहीं होने के कारण वे दो-चार महीने धान को रोक नहीं सकते हैं. इसलिए बाजार में फसल के दामों में बढ़ोतरी के लाभ से वंचित रहते हैं. फिर यहां छोटे किसानों के लिए सरकारी बैंकों से कर्ज लेने की सुविधा नाकाफी है. इसके चलते उन्हें साहूकारों के पास जाना पड़ता है.

दूसरी तरफ, इंदिरा गांधी कृषि विवि, रायपुर में डायरेक्टर ऑफ एक्सटेंशन डॉ. एमपी ठाकुर बाकी राज्यों के मुकाबले छत्तीसगढ़ खेती की अच्छी संभावना देखते हैं. वे बताते हैं, छत्तीसगढ़ की माटी अभी जहरीली नहीं हुई है. अब हमें कुएं-तालाब बनाकर पानी रोकने के प्रयास करने होंगे. इजराइल सालाना 500 मिमी बारिश का सही इस्तेमाल करके खुशहाल है. इसके अलावा लघु-सीमांत किसानों को सिर्फ धान की फसल लेने की मान

सिकता से उभर जाना चाहिए. यदि प्रदेश में छोटे किसानों की माली हालत सुधारनी है तो उन्हें खेती के साथ बागवानी, पशुपालन और डेयरी जैसे अन्य कामों से भी जोडऩा होगा.

डॉ. रिछारिया कैम्पेन के प्रदेश संयोजक जेकब नेल्लीथेनम कहते हैं, "सरकार यदि किसानों को सूखे की मार से नहीं बचा सकती तो खेतों में अत्याधिक पानी और रासायनिक खाद मांगने वाले बीजों को बांटना बंद कर दे. इन बीजों में कीटों से लडऩे की क्षमता काफी कम होती है और कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से जमीन की उर्वरक शक्ति भी नष्ट होती है. दूसरी तरफ, लागत बढऩे से खेती महंगी होती जा रही है." 

विश्व प्रसिद्ध वैग्यानिक आरएच रिछारिया ने छत्तीसढ़ में देसी धान की बीस हजार किस्मों के बीजों संग्रह किया था. रिछारिया का दावा था कि यही देसी बीज किसानों को हर मौसम और परिस्थितियों में अच्छी पैदावार दिलाने की क्षमता रखते हैं. 

वहीं, सरकार ने छोटे किसानों के सूखे सहित तमाम समस्या को राहत और मुआवजा राशि तक सीमित कर दिया है. इस बारे में राजस्व व आपदा प्रबंधन के सचिव केआर पिस्दा कहते हैं, "बीते वर्ष ही शासन ने हर पात्र किसान को निर्धारित नीति के मुताबिक मुआवजा बांटा है." पलायन की समस्या पर वे कहते हैं कि हमारे पास किसी भी जिले से पलायन की सूचना नहीं है. मामूली स्तर का पलायन तो हर साल होता है. इसके लिए इस वर्ष मनरेगा 

के तहत 10 लाख मजदूरों को शासन ने काम देने का प्रयास किया है. उनकी बात से पूछती होती है कि धान के कटोरे के नाम से प्रसिद्ध इस राज्य के किसान बड़ी संख्या में मनरेगा के मजदूर बन रहे हैं.

खेतीबाड़ी में छत्तीसगढ़ का हाल

  •  37 लाख 46 हजार किसान
  • 33 प्रतिशत आदिवासी किसान
  • 76 प्रतिशत छोटे और मझौले किसान
  • 46 लाख 85 हजार हेक्टेयर कृषि-भूमि
  • 80 प्रतिशत जनता कृषि और कृषि आधारित उद्योगों पर निर्भर
  • 90 फीसदी किसान नहीं ले पाते साल में दो बार फसल
  • 1222 मिमि सामान्य वार्षिक वर्षा

First published: 1 October 2016, 2:26 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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