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गुजरात: किसानों से गुजरात सरकार की बेरुखी महंगी पड़ सकती है

राजीव खन्ना | Updated on: 8 January 2017, 8:35 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

गुजरात के किसान गुस्से में हैं और यह विजय रूपानी की अगुवाई वाली भाजपा सरकार के लिए बुरी खबर है. बुरी ख़बर इसलिए भी कि क्योंकि राज्य में इसी साल चुनाव होने हैं. नोटबंदी से काफी प्रभावित और फसलों के नुकसान से आहत किसान पूरे राज्य में आन्दोलन की योजना बना रहे हैं. वे आन्दोलन के दौरान लोगों से अनुरोध करेंगे कि भाजपा को वोट न दें क्योंकि भाजपा लगातार किसानों की अनदेखी कर रही है.

राज्य में पिछले दिनों 'वेदना यात्रा' निकाली गई थी जिसमें किसानों के आक्रोश को दर्शाया गया था. यह यात्रा किसानों के गैर सरकारी संगठन खेदूत समाज गुजरात (केएसजी) ने निकाली थी. केएसजी के सचिव सागर राबरी ने गिर सोमनाथ जिले के वेरावल से राज्य की राजधानी गांधीनगर तक पद यात्रा निकाली.

वेदना यात्रा

450 किमी की यह यात्रा 20 दिनों में पूरी हुई. इस यात्रा में सैकड़ों गांवों के किसान आ जुटे और अपनी सहभागिता निभाई. एक गांव से दूसरे गांव तक किसानों का रेला लगा रहा था. जिस गांव में सागर राबरी लंच करते थे और रात को रुकते थे, वहां हर रोज किसानों की दो सभाएं होती थीं. इन सभाओं में हजारों की संख्या में किसान जुटते थे और अपना आक्रोश व्यक्त करते थे. ये किसान सागर राबरी समेत केएसजी के अन्य नेताओं के साथ अन्य समस्याओं पर भी गुस्सा जताते थे और चर्चा करते थे.

यात्रा के समापन पर केएसजी के एक प्रतिनिधिमंडल ने सोमवार को गांधीनगर में एक ज्ञापन सौंपा है. रबारी ने कैच न्यूज से कहा कि हमें सचिवालय तक जाने की अनुमति नहीं दी गई क्योंकि प्रशासन ने धारा 144 लगा रखी थी. हमें आश्वासन दिया गया था कि मुख्यमंत्री हमसे मिलने का वक्त देंगे और हमारी बातों पर चर्चा करेंगे. अगर ऐसा नहीं हुआ तो हम गांवों तक जाएंगे. 

रबारी ने यह भी कहा कि अब हम हर जिले में बाइक यात्रा निकालने जा रहे हैं. हमारे कार्यकर्ता एक गांव से दूसरे गांव में जाकर किसानों और उनके परिवारों से कहेंगे कि वे भाजपा को वोट न दें क्योंकि भाजपा के मन में किसानों के प्रति कोई सम्मान नहीं है.

वेदना यात्रा का एक अन्य उद्देश्य किसानों की अन्य समस्याओं को भी उजागर करना था. यात्रा के दौरान राज्य में नोटबंदी से किसानों की बदहाली पर भी विचार-विमर्श किया गया. किसानों ने सरकार के सामने जो मांगे रखी है, उसमें प्रमुख मांग यह है कि फसलों के नुकसान का पूरा आकलन किया जाए, विशेषकर बागवानी क्षेत्र, सब्जी और नगदी फसलों का भी.

नोटबंदी का असर

दक्षिण गुजरात के किसान नेता जयेश पटेल, जो केएसजी के अध्यक्ष भी हैं, कहते हैं कि सब्जी, गन्ना, कपास, मूंगफली और चीकू का उत्पादन करने वाले किसानों के हालात बद से बदतर हो गए हैं. नोटबंदी के चलते हालात और बिगड़े हैं तथा उनकी समस्याओं में इजाफा ही हुआ है. 

दक्षिण गुजारत का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि चीकू 900 रुपए में 20 किलो बेचा जा रहा था, अब इसी 20 किलो के दाम बमुश्किल ही 200 रुपए मिल पाते हैं. यह बहुत जल्द ही खराब होने वाला उत्पाद है. इसकी फसल सही समय ले ली जानी चाहिए. किसान की हालत बहुत बुरी हो गई है. जयेश पटेल कहते हैं कि यही हालत बैंगन और फूलगोभी का भी है.

किसानों का पलायन

सूत्रों के अनुसार राज्य के कई किसान, जो विशेषकर सब्जियां उगाते हैं, वे खड़ी फसलों से छुटाकारा पाने के लिए यंत्रीकृत खेती की ओर उन्मुख हो रहे हैं. दक्षिण गुजरात की शुगर इकोनॉमी पर भी नोटबंदा का काफी असर पड़ा है. किसान मजदूरों को उनकी मजदूरी का नगद भुगतान नहीं कर पा रहे हैं. इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि ज्यादातर मजदूर अपने गांवों की ओर पलायन कर गए हैं. 

गन्ने का उत्पादन नर्मदा के उत्तरी जिलों सूरत, नवसारी, तापी और वालसाड जिलों में होता है. खेती करने के लिए मजदूर महाराष्ट्र से सटे आदिवासी क्षेत्रों से आते हैं. किसान काम छोड़कर चले गए हैं और अब उन पर खेती के लिए यंत्रों पर निर्भर रहने के सिवाय कोई उपाय नहीं बचा है. जब फसलों की खेती कर ही ली जाएगी, तब मजदूरों को रोजगार कहां से मिल पाएगा?

सूत्रों ने कहा कि इस साल प्रति एकड़ पांच टन से भी कम गन्ने का उत्पादन हुआ है. इस कारण जमीन का भरपूर लाभ भी नहीं लिया जा सका है. नवसारी कृषि विश्वविद्यालय के एक कृषि विशेषज्ञ एन पटेल कहते हैं कि अगली फसल तक हालात के सुधर जाने की उम्मीद है. नोटबंदी और मजदूरों के चले जाने के कारण मंदी आई है. अब नगदी की व्यवस्था की जा रही है तो हालात ठीक हो जाएंगे.

कुछ हफ्ते पहले दक्षिण गुजरात के किसानों ने आयकर विभाग द्वारा रिकवरी नोटिस भेजने पर प्रदर्शन किया था. पटेल कहते हैं कि सरकार को समझना चाहिए कि सहकारी क्षेत्र में जो लोग चीन मिल चला रहे हैं, वे किसान हैं. 12 चीनी मिलों से चार सालों में 3,200 करोड़ रिकवरी की राशि किसी भी तरह से काफी विचित्र है. पटेल ने खुलासा किया है कि इस मुद्दे का सुलझाया जाना अभी बाकी है क्योंकि हमने कोर्ट से स्टे ले लिया है.

विशेष पैकेज की मांग

अब आते हैं वेदना यात्रा पर, किसानों की मांग है कि नोटबंदी से हुए नुकसान की भरपाई सरकार विशेष पैकेज देकर करे. यह यात्रा सोमनाथ मंदिर से शुरू हुई थी. इसमें सौराष्ट्र क्षेत्र विशेषकर जूनागढ़, राजकोट, गिर सोमनाथ, भावनगर और सुरेन्द्रनगर जिलों के किसानों ने अपनी सहभागिता निभाई थी. 

यह वे जिले हैं जहां कपास और मूंगफली की पैदावार बहुत अधिक होती है. यह क्षेत्र पिछले दो दशकों से भाजपा का गढ़ रहा है. किसानों के व्यापक समर्थन के कारण केशुभाई पटेल बड़े नेता के रूप में उभरे. यात्रा के अंतिम चरण में अहमदाबाद और उत्तरी गुजरात के किसान भी आ जुटे. किसानों ने कहा है कि जब बुवाई का मौसम चरम पर था, तब नोटबंदी की घोषणा के कारण उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा है.

केएसजी द्वारा जो ज्ञापन सौंपा गया है, उसे हजारों किसानों से विचार-विमर्श के बाद तैयार किया गया था. इस ज्ञापन के जरिए किसानों ने मांग की है कि किसी भी कीमत पर किसानों के भूमि अधिकारों का संरक्षण किया जाना चाहिए. इसमें मांग की गई है कि स्पेशल इन्वेस्टमेन्ट रीजन एक्ट-2009 को खत्म किया जाए. इसमें कथित रूप से प्रावधान है कि राज्य सरकार शहरी ढांचागत के नाम पर किसानों की 50 भूमि का इस्तेमाल कर सकती है. 

किसानों की सरकार से यह भी मांग है कि वह ड्रेनेज एंड एरीगेशन एक्ट को खत्म करे जिसमें किसानों का पानी उद्योगों को देने का प्रावधान है. इसके अलावा दिल्ली-मुम्बई इंडस्ट्रियल कॉरीडोर के लिए किसानों की भूमि का अधिग्रहण करना समाप्त किया जाए. उनकी यह भी मांग है कि नर्मदा सिंचाई क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले डि-कमांडिंग क्षेत्र को पहले की तरह ही नर्मदा योजना कमान के तहत लाया जाए.

First published: 8 January 2017, 8:35 IST
 
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