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'सरकार को समझना होगा कि हम किसान क्यों मर रहे हैं'

पार्थ एमएन | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में साल 2015 में एक हज़ार किसान आत्महत्या कर चुके हैं. दिसंबर के पहले हफ्ते में इस इलाके के 27 किसान अपनी जान दे चुके हैं. भारत में हर घंटे दो किसान आत्महत्या करते हैं.
  • महाराष्ट्र के बीड ज़िले के किसान राजाभाऊ देशमुख ने बताया किसानों की दुर्दशा का कारण और आत्महत्या करने की मजबूरी की वजह.

आर्थिक तौर पर देखा जाए तो भारत का आधे से ज्यादा मानव श्रम का हिस्सा खेती में लगा हुआ है. जबकि खेती का देश के जीडीपी में 13.7 प्रतिशत योगदान है. बहरहाल आर्थिक मसले को खारिज करते हैं और मानवीय पहलू से विचार करते हैं. भारत में हर घंटे दो किसान आत्महत्या करते हैं. इस महीने की शुरुआत में मराठवाड़ा एक हफ्ते के भीतर 27 किसानों ने आत्महत्या की. 

लोगों को किसानों की खुदकुशी से सहानुभूति हो सकती है लेकिन हमारे बीच कितने हैं जिन्हें इस समस्या की वास्तविक समझ है? हमारे बीच कितने ऐसे हैं जिन्होंने वास्तव में इस त्रासदी का कारण जानने की कोशिश की है और मराठवाड़ा में किसानों की जिंदगी में समझने की कोशिश की है.

बीड़ के एक किसान राजभाऊ देशमुख ने कैच को मराठवाड़ा के किसानों की त्रासदी के बारे में बताया. उन्होंने जो कहा कि वह देश के लिए एक चेतावनी है. आगे पढें उन्होंने क्या कहा-

किसानों की कहानी राजभाऊ की जुबानी

बबन के बेटे कालिदास की मौत को एक साल होने जा रहे हैं. यह घटना बीड जिले के ही तंबाराजौरी गांव की है. कालिदास की उम्र 23 साल थी. इस परिवार ने बैंक से लोन ले रखा था और बड़ी मुश्किल से उसे चुकाने की जद्दोजहद में लगा हुआ था. पिछले साल सूखे की वजह से उसका पूरा निवेश बर्बाद हो गया. कालिदास ने मजदूरी करने की कोशिश की लेकिन सब कुछ बेकार चला गया. अब उसके पास कोई उम्मीद नहीं थी और आखिरकार उसने मौत को गले लगाने का फैसला किया. 

परिवार ने आखिरी कोशिश करते हुए सरकारी अधिकारियों से एक लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी. बबन और उनका बेटा अधिकारियों से मिले भी लेकिन उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया. दोनों ने करीब एक साल तक अधिकारियों को अपनी स्थिति समझाने की कोशिश की. मौत के बाद अधिकारियों ने मामले की पड़ताल की और उन्होंने इसे मुआवजा योग्य मानने से इनकार कर दिया. 

कारण? कालिदास के नाम पर जमीन नहीं थी. यह उसके पिता बबन के नाम पर थी. कालिदास किसान नहीं था.

आपको इस बारे में सोचना होगा. कोई बीस साल का लड़का कभी किसी जमीन का मालिक नहीं हो सकता, बेशक वह इससे जुड़े सभी काम ही क्यों न करता हो. जमीन का मालिक हमेशा ही परिवार का सबसे बड़ा सदस्य होता है. लेकिन सिस्टम की इस खामी की कीमत किसानों को अपनी जिंदगी देकर चुकानी होती है. 

इस पूरी घटना का बबन के छोटे बेट पर गहरा असर पड़ा. कालिदास की मौत के बाद उसके पिता की घटना का उस पर बुरा असर हुआ. फिलहाल वह मानसिक रूप से अस्थिर हो चुका है और पुणे के यरवदा अस्पताल में उसका इलाज चल रहा है.

हमें फर्क भी नहीं पड़ता

यह पूरी कहानी एक ही परिवार की है. मैं आपको दावे से बता सकता हूं कि मराठवाड़ा में ऐसे कई बबन मिल जाएंगे. यहां की मौजूदा स्थिति भयावह है. यहां पानी लगभग खत्म हो चुका है. जो भाग्यशाली हैं उनके पास कुंआ है और उसमें करीब 10-15 फीट के स्तर पर पानी भरा हुआ है. सूखा इतना भयानक है कि जानवरों को पानी की कमी की वजह से सिल्ट पर गुजारा करना पड़ता है. 

हमें बीमार भी नहीं पड़ सकते. हम गले के इंफेक्शन का भी इलाज नहीं करा सकते, कैंसर जैसी बीमारियों की बात तो दूर है

हमें पिछले कुछ सालों से लगातार 20-30 फीसदी फसल का नुकसान उठाना पड़ता है. इस साल की तरह ऐसे भी कई साल रहे हैं जब हमारी पूरी फसल बर्बाद हो गई. बैंक और संबंधियों का कर्ज बढ़ता रहा है और हमारी स्थिति बद से बदतर होती गई. किसी भी तरह से हमें अपने घर को चलाना था. 

इसके अलावा इलाज, शादी और बच्चों के पढ़ाई की फीस जैसी कई अहम जिम्मेदारियां हैं. मैं आपको कह सकता हूं कि हमें बीमार भी नहीं हो सकते. हम गले के संक्रमण का इलाज तक नहीं करा सकते. कैंसर और डायबिटीज जैसी बीमारियों के इलाज का तो सोचना भी गुनाह है.

पहली बार 2004 में यहां सूखा पड़ा. तब से यह लगातार पड़ रहा है. इसके अलावा मौसम विभाग ने अगले साल अगस्त के पहले बारिश की संभावना जताई है. मतलब कि इस बार खरीफ फसल की उम्मीद भी कम है. हमारी खेती के सीजन की शुरुआत इसी से होती है. 

मॉनसून में तो फिर भी जिंदा रहा जा सकता है लेकिन गर्मियों में नदियों के सूख जाने के बाद रहना मुश्किल है

इस बीच मराठवाड़ा की झील और नदियां सूख चुकी हैं. एक दशक पहले तक इनमें पानी भरा होता था और इससे गर्मियों में भी कोई परेशानी नहीं होती थी. पिछले दशक में झील और नदियां महज 20-30 प्रतिशत ही भर पाई है. बहुत हुआ तो 40 प्रतिशत तक.

सरकार उस पेशे को कैसे नजरअंदाज कर सकती जिस पर देश की आधी आबादी की जिंदगी निर्भर करती है. मॉनसून के सीजन में तो फिर भी रहा जा सकता है लेकिन गर्मियों में यहां नहीं रहा जा सकता. इस वजह से पारंपरिक तौर पर जो बागबानी फसलें की जाती थीं वह अब लगभग गायब हो चुकी हैं.

खेती करना भारी

हमारे सामने हर दिन एक सवाल होता है कि हम किस तरह से अपनी जिंदगी चलाएं? खराब मौसम और सरकार की नीतियां दोनों ही मिलकर हमारी कब्र खोद रही हैं. सरकार उस पेश को कैसे नजरअंदाज कर सकती है जिस पर देश की आधी आबादी की जिंदगी निर्भर है. हमारे सामने सबसे बड़ी चिंता यह है कि फिलहाल हमारे सामने कोई उम्मीद की किरण नहीं है. हमें हमारी लागत और कड़ी मेहनत का नतीजा नहीं मिलता है. उत्पादन की बढ़ती लागत और मामूली बाजार कीमत कृषि को आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बना चुकी है. 

दलालों की वजह से हमारी समस्याएं और बढ़ गई हैं. हमारे पास अपने उत्पाद को उन्हें बेचने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है. मार्केट यूनियन ट्रेडर्स और बिचौलियों से भरा हुआ है. उनके पास हमारी परिस्थितियों का नाजायज फायदा उठाने का विकल्प है.

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हम उन्हें अपना उत्पाद बेचने के लिए मना नहीं कर सकते क्योंकि कर्ज और खर्च की जिम्मेदारी हमारे माथे पर होती है. हम उनके जाल में फंस चुके हैं और घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है.

हमारे पास क्या विकल्प हैं? अधिकांश किसान अशिक्षित हैं. अधिकांश घूम-घूम कर मजदूरी करते हैं. वे आधे साल तक चीनी मिलों में काम करते हैं और दिहाड़ी पर काम की तलाश में शहर जाते हैं.

आयात पर खुशी, निर्यात पर पाबंदी

जब हम हमारे फसलों की मामूली बाजार कीमत का आकलन करते हैं तो सरकार कठघरे में खड़ी नजर आती है. मसलन नवंबर अंत में हम चने की बुआई करते हैं. पिछले साल 25 नवंबर को भारत सरकार ने रूस से 53 रुपये प्रति किलो के भाव से चने की खरीदारी की. खरीदारी का सिलसिला अप्रैल तक चला और यह वह वक्त होता है जब हम अपना उत्पाद बेचने को तैयार होते हैं. 

फिर हमें औने पौने दाम पर चने को बेचना पड़ा क्योंकि सरकार पहले ही इसे रूस से खरीद चुकी थी. सरकार हमें यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं, 'आपको किसने चना उपजाने के लिए कहा था? किसने आपको खेती पर जिंदगी बिताने की सलाह दी थी.' सबसे खतरनाक बात यह है कि आयात में दिनों दिन बढ़ोतरी ही हो रही है.

सरकार ने तुअर की दाल 73 रुपये प्रति किलो के भाव से खरीदा. हमें अगर यह कीमत मिले तो हम साल भर इसकी खेती कर सकते हैं

सरकार की तरफ से दी जाने वाली कीमत कम है. और इसके अलावा भंडारण की क्षमता, सरकारी छुट्टियां, दस्तावेजी अड़चनें और भ्रष्ट नौकरशाही जैसी कई समस्याओं की वजह से स्थिति और खराब हो जाती है. इसलिए सरकार की खरीद नीति से जमीनी स्तर पर शायद ही कोई बड़ा बदलाव हो पाता है. जब सरकार हमसे नहीं खरीदती है तो ट्रेडर्स को पता होता है कि अब हमारे पास कोई विकल्प नहीं है और फिर वह इस मौके का फायदा उठाते हैं.

ऐसे कई तथाकथित विशेषज्ञ हैं जो यह बताते हैं कि खेती करना अब कितना मुश्किल हो चुका है. यह अब उतना फायदे का सौदा नहीं है जितना हुआ करता था. लेकिन मेरे विचार में सरकार की नीतियों और असंवेदनशील सिविल सोसाएटी ने खेती को घाटे का सौदा बना दिया है.

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सरकार प्याज के निर्यात पर प्रति टन 700 डॉलर का टैक्स लगाती है. इसका मतलब यह हुआ कि अगर कोई किसान जापान के एक ट्रेडर को एक टन प्याज बेचना चाहे तो उसे पहले 700 डॉलर का भुगतान करना पड़ेगा. जाहिर है किसान अपनी लागत निकालना चाहेगा.

लेकिन सवाल यह है कि जापान का कोई ट्रेडर हमसे महंगे दाम पर प्याज क्यों खरीदेगा? और एक बार जब निर्यात रुक जाता है तब स्थानीय ट्रेडर्स बाजार में कूद पड़ते हैं और फिर हमें मजबूरन बेचना पड़ता है. हमारे पास अगले साल की खेती के लिए पूंजी की समस्या होती है.

हम अपनी लड़ाई खुद लड़ रहे हैं

हमारी समस्याओं के लिए केवल मौजूदा सरकार ही जिम्मेदार नहीं है. सच्चाई यह है कि किसी भी सरकार ने हमें वैश्वीकरण से बचाने के लिए कुछ नहीं किया. हमें विदेशी कंपनियों से मुकाबला करना होता है जिन्हें उनके देशों में भारी सब्सिडी दी जाती है.

उदारीकरण के बाद भारत के किसान कभी भी जीतने की हालत में नहीं रहे. हमें सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार में झोंक दिया गया

विकसित देशों ने अपने बाजारों को खोला है लेकिन उन्हें किसानों को बाजार के भरोसे नहीं छोड़ दिया. स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को अभी तक लागू नहीं किया गया है. सरकार इस रिपोर्ट पर 2007 से ही बैठी है. बीजेपी की सरकार ने इसे लागू करने का वादा किया था लेकिन यह सिर्फ उनका चुनावी एजेंडा भर था. किसान जल्द ही इसके झांसे में आ गए. नरेंद्र मोदी के भाषण और रैलियों का मराठवाड़ा में असर पड़ा और हर किसी ने 2014 में बीजेपी को वोट दिया. लेकिन नई सरकार भी पिछली सरकारों की तरह ही बेईमान साबित हो रही है.

First published: 18 December 2015, 7:36 IST
 
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