पंजाब में गहराने लगा है खेती पर संकट

राजीव खन्ना | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

किसान बासमती चावल और कपास की खेती छोड़ कर गेहूं व दूसरे किस्म के धान की खेती करने में जुटे हैं, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में आती हैं. पंजाब में समय-समय पर, खेती पर संकट के बादल मंडराते रहते हैं. इस बार यह संकट खेती की जमीन के किराये में भारी गिरावट के रूप में सामने आया है. इस मौसम में राज्य के किसान ऐसी फसल की खेती करने से बच रहे हैं, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य के दायरे में नहीं आती और वे पारम्परिक धान की खेती की ओर लौट रहे हैं.

कपास की खेती में भी उल्लेखनीय गिरावट देखी जा रही है. कमोबेश पूरे राज्य में यही हालत है, कुछ एक अपवाद को छोड़ कर खेतों के किराये में करीब 40 फीसदी की गिरावट देखी गई. विशेषज्ञों के अनुसार पिछले दो साल में बासमती पूसा-1121 किस्म व आलू की गिरती कीमतों के चलते खेती की जमीन के किराये में कमी आई है. यह फसल न्यूनतम समर्थन मूल्य की श्रेणी में नहीं आती है और जिन किसानों ने इनकी खेती की थी, उन्हें भारी घाटा उठाना पड़ा है.

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किसान अपनी लागत भी नहीं वसूल सके है. पंजाब विश्वविद्यालय, पटियाला के कृषि अर्थशास्त्र विशेषज्ञ प्रो. ज्ञान सिंह के अनुसार यह बाजार में माल नहीं उठने और आय में गिरावट का नतीजा है. रिपोर्ट के मुताबिक पूसा 1121 बासमती चावल में गत वर्ष 1600 से 1800 रुपए प्रति क्विंटल का लाभ देखा गया जबकि उससे पूर्व के पिछले दो वर्षों में ये आंकड़े क्रमश: 3,000 से 3,300 रुपए और 5,000 से 5100 रुपए प्रति क्विंटल था.

प्रो. सिंह कहते हैं कि मालवा जैसे इलाके में जमीन का किराया जहां 70,000 रुपए प्रति एकड़ था वहां अब 30,000 से 45,000 रुपये प्रति एकड़ रह गया है. शिवालिक जैसे निचले पहाड़ी इलाके में जमीन का किराया 2,000 से 5,000 रुपये प्रति एकड़ है. उन्होंने अपेक्षित किराये की ओर संकेत करते हुए बताया कि रामपुराफुल इलाके में खेत का किराया 60,000 रुपये प्रति एकड़ है. यहां के किसान को आलू के सही दाम मिले और उनका कहना है कि वे आलू की ही फसल उगाना जारी रखेंगे.

ग्रामीण अनुसंधान एवं औद्योगिक विकास केंद्र (सीआरआरआईडी), चंडीगढ़ के एक अन्य विशेषज्ञ शेर सिंह सांगवान के अनुसार हाल के वर्षों में पंजाब और हरियाणा को किराए और खेती के तौर-तरीकों को प्रतिकूल परिस्थितियों पर निर्भर रहना पड़ रहा है. जिन मध्यम वर्गीय किसानों के पास संसाधन होते हैं वे अपने इन्हीं यंत्रों का प्रयोग कम खर्चे पर किराये वाली जमीनों की जुताई के लिए कर सकते हैं. किराये की यह पद्धति अस्सी के दशक के मध्य में शुरू हुई थी.

लेकिन छोटे किसानों में बेरोजगारी बढ़ने के चलते खेतों को किराये पर देने में प्रतिस्पर्धा बढ़ गई. इन छोटे किसानों को मनरेगा या कहीं और मजदूरी करने में शर्म महसूस होती है. पंजाब और हरियाणा में 85 फीसदी फसल आज गेहूं या किसी और धान की है. गौर से विश्लेषण करने पर पाया गया कि आम धान की फसल की जगह पूसा बासमती चावल की किस्म 1121 की खेती की जा रही है, जो कि वर्ष 2003 में इंडियन काउंसिल फॉर एग्रीकल्चरल रिसर्च ने विकसित किया था.

धान की 1121 किस्म यहां इसलिए लोकप्रिय हुई क्योंकि इसकी खेती के लिए कम पानी की जरूरत थी, यह जल्दी पक जाती है और बासमती चावल के मुकाबले इसकी उपज भी अधिक होती है. 1121 किस्म की उपज एक एकड़ में 19 से 20 क्विंटल होती है जबकि बासमती चावल केवल 9 से 10 क्विंटल प्रति एकड़ उपज देते हैं.

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वे कहते हैं कि वर्ष 2006 के बाद से निर्यात के कारण इसकी कीमतों में 1,000 रुपये प्रति क्विंटल से लेकर 4,500 रूपए प्रति क्विंटल का उतार-चढ़ाव देखा गया. सांगवान का कहना है वर्ष 2013-14 में 4500 रुपये प्रति क्विंटल के मुनाफे के साथ ही कई इलाकों में जमीन का किराया 60,000 रुपये प्रति एकड़ तक बढ़ गया. 

लेकिन कीमतों के एकदम से गिराव के कारण 10 एकड़ तक की जमीन किराये पर देने वाले किसान को कम से कम 3 लाख का कर्ज लेना पड़ता है. यह राशि अधिक भी हो सकती है क्योंकि बैंक लीज पर किराये के लिए ऋण नहीं देते और निजी वित्तीय संस्थाएं ऊंचे ब्याज दर पर देती हैं.

सांगवान कहते हैं लीज पर जमीन का भारी भरकम किराया किसी भी प्राकृतिक आपदा से कम नहीं है. ये दोनों ही विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल भूमि सुधारों के आधार पर ही किसानों का भला हो सकता है. ज्ञान सिंह कहते हैं किसान को फसल का दाम मिले, समर्थन मूल्य नहीं और जमीन भी उसी की हो जो खेती कर रहा है.

First published: 3 July 2016, 8:26 IST
 
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