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समय से पहले शुरू हो गई समाजवादी पार्टी में उत्तराधिकार की लड़ाई

अभिषेक पराशर | Updated on: 14 September 2016, 1:49 IST
QUICK PILL
  • मुलायम सिंह यादव के परिवार के भीतर समाजवादी पार्टी और सरकार पर नियंत्रण को लेकर चल रही लड़ाई अब खुलकर सामने आ गई है. 
  • नेताओं और अधिकारियों की बर्खास्तगी दरअसल पार्टी और सरकार पर नियंत्रण को लेकर चल रही लड़ाई का नतीजा है.
  • मुलायम सिंह के जरिए शिवपाल यादव ने अखिलेश यादव को पार्टी अध्यक्ष से हटाकर सरकार और पार्टी को अलग करने की कोशिश की.
  • अखिलेश यादव ने पहले दो मंत्रियों और मुख्य सचिव को बर्खास्त करने के बाद शिवपाल के अहम मंत्रालयों को छीनकर सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है.
  • नियंत्रण और उत्तराधिकार को लेकर लड़ाई तेज हो गई है. आम तौर पर इस तरह की लड़ाई पार्टी के चुनाव हारने के बाद होती है. लेकिन सपा में यह लड़ाई बेहद अहम माने जाने वाले 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ही शुरू हो गई है. 

मुलायम सिंह यादव के परिवार के भीतर समाजवादी पार्टी और सरकार पर नियंत्रण को लेकर चल रही लड़ाई अब खुलकर सामने आ गई है. 

कुछ दिनों पहले ही जब मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक मंच पर अखिलेश यादव को फटकार लगाई थी, तब यह समझा गया था कि उन्होंने सियासी फायदे को ध्यान में रखते हुए अपने बेटे और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को फटकार लगाई थी ताकि जनता के बीच यह संदेश दिया जा सके कि सरकार का चेहरा भले ही अखिलेश यादव हैं लेकिन उसकी वास्तविक नियंत्रण उनके हाथों में हैं. 

मुलायम सिंह यादव ने इस एक बयान से राज्य सरकार की विफलता की जवाबदेही से अखिलेश यादव को मुक्त कर दिया. उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था को लेकर सपा सरकार चौतरफा घिरी हुई है. 

हालांकि तब भी इस बात से इनकार नहीं किया गया कि पार्टी और सरकार पर नियंत्रण को लेकर मुलायम कुनबे में सब कुछ ठीक चल रहा है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले शिवपाल ने अपनी रणनीति के तहत माफिया से नेता बने मुख्तार अंसार की पार्टी कौमी एकता दल का समाजवादी पार्टी में विलय कराया. लेकिन जैसे ही अखिलेश यादव को इस विलय की जानकारी हुई उन्होंने इसमें अहम भूमिका निभाने वाले शिवपाल के करीबी और सपा सरकार में मंत्री बलराम यादव को बर्खास्त कर दिया. 

पार्टी चलाने के तरीकों को लेकर शिवपाल और अखिलेश यादव के बीच यह पहली लड़ाई थी जिसमें शिवपाल के हाथ कुछ नहीं लगा. साथ ही कौमी एकता दल का विलय रद्द हो गया. 

अखिलेश यादव शुरू से ही पार्टी में आपराधिक पृष्ठभूमि के नेताओं को शामिल किए जाने के फैसले के खिलाफ रहे हैं. हाल ही में उन्होंने कौशांबी की एक सभा में माफिया अतीक अहमद को झिड़क दिया था.

शिवपाल की नाराजगी दूर करने के लिए बाद में मुलायम सिंह सार्वजनिक मंच पर अखिलेश को फटकार लगाकर परिवार के भीतर चल रही लड़ाई को जाहिर कर दिया. उन्होंने खुले तौर पर शिवपाल का पक्ष लिया. 

इससे पहले भी वह सार्वजनिक मंच पर अपने बेटे को कई दफे फटकार लगा चुके हैं. इसलिए किसी को ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ. घर के झ़गड़े में अभी तक मुलायम सिंह यादव की भूमिका सरपंच की थी. लेकिन अखिलेश यादव से पार्टी की कमान छीनकर अब वह खुद एक पक्ष बन गए हैं. 

कौमी एकता दल का विलय रद्द करने का फैसला पार्टी चलाने को लेकर शिवपाल और अखिलेश यादव में टकराव की पहली वजह बना.

मंगलवार को सुबह अखिलेश यादव से शिवपाल के करीबी समझे जाने वाले मुख्य सचिव दीपक सिंघल को बर्खास्त कर दिया. 

आलोक रंजन के हटने के बाद अखिलेश यादव वैसे भी दीपक सिंघल को चीफ सेक्रेटरी बनाने के पक्ष में नहीं थे. लेकिन शिवपाल से करीबी और अपनी लॉबिंग की बदौलत वह चीफ सेक्रेटरी बनने में सफल रहे.

राज्यसभा सांसद बने सुभाष चंद्रा को सपा सांसद अमर सिंह की तरफ से दी गई पार्टी में मुलायम सिंह और शिवपाल के अलावा पार्टी के अन्य नेता पहुंचे लेकिन अखिलेश यादव ने इससे दूरी बनाए रखी. 

अखिलेश यादव के पार्टी में नहीं जाने के बावजूद दीपक सिंघल पार्टी में पहुंचे और वहां उन्होंने मुलायम सिंह यादव की मौजूदगी में अखिलेश के बारे में टिप्पणी कर दी जो उनके समर्थकों ने उन्हें बता दिया.

इसके फौरन बाद अखिलेश यादव ने सिंघल की छुट्टी कर दी. सरकार के आधिकारिक प्रवक्ता ने कहा, 'सिंघल को प्रतीक्षा सूची में डाला गया है. साथ ही राहुल भटनागर को राज्य का मुख्य सचिव बनाया गया है.' सिंघल इससे पहले शिवपाल के तहत आने वाले सिंचाई विभाग में सचिव थे.

सिंघल की बर्खास्तगी से एक दिन पहले ही अखिलेश यादव ने सपा सरकार के दो मंत्रियों को बर्खास्त किया था. खनन मंत्री गायत्री प्रजापति और पंचायती राज मंत्री राज किशोर सिंह को बर्खास्त कर दिया.

खनन घोटाले में सीबीआई जांच नहीं कराए जाने की राज्य सरकार की याचिका खारिज होने के बाद गायत्री प्रजापति को बर्खास्त किया गया तो जमीन घोटाले का आरोप लगने के कारण अखिलेश ने राज किशोर सिंह की छुट्टी कर दी. यह महज संयोग नहीं था कि दोनों ही मंत्री शिवपाल के करीबी थे.

सिंघल की बर्खास्तगी का फैसला शिवपाल सिंह यादव के जरिये मुलायम सिंह यादव को ठीक नहीं लगा और उन्होंने सरकार और पार्टी के बीच फर्क बनाते हुए अखिलेश यादव से पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी छीनते हुए उस पर भाई शिवपाल को बिठा दिया. 

परिवार के भीतर चल रही लड़ाई में मुलायम सिंह ने पहली बार फैसला लिया और वह सार्वजनिक तौर पर अखिलेश यादव के खिलाफ गया. मुलायम के चचेरे भाई और सपा के महासचिव राम गोपाल यादव ने शिवपाल को लिखा, 'समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने आपको उत्तर प्रदेश सपा का अध्यक्ष बनाया है. उम्मीद की जाती है कि आप कड़ी मेहनत से पार्टी को मजबूत बनाएंगे.'

शिवपाल पार्टी को मजबूत बनाने की दिशा में काम करना शुरू करते उससे पहले ही अखिलेश यादव ने जवाबी कार्रवाई करते हुए सरकार में उनके पर कतर दिए. 

पार्टी अध्यक्ष से हटाए जाने के तत्काल बाद अखिलेश यादव ने शिवपाल यादव से कई अहम मंत्रालय छीन लिए. अखिलेश ने शिवपाल यादव से लोक निर्माण विभाग, सिंचाई और राजस्व जैसे अहम विभाग छीन लिए हैं. अब उनके पास महज समाज कल्याण विभाग की ही जिम्मेदारी है.

नेताओं और अधिकारियों की बर्खास्तगी दरअसल पार्टी और सरकार पर नियंत्रण को लेकर चल रही लड़ाई का नतीजा है. मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को पार्टी अध्यक्ष से हटाकर सरकार और पार्टी को अलग करने की कोशिश की. 

अखिलेश यादव ने पहले दो मंत्रियों और फिर मुख्य सचिव को बर्खास्त करने के बाद अब शिवपाल के अहम मंत्रालय को छीनकर सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है.

अखिलेश यादव के बारे में कहा जाता है कि वह बेहतर प्रशासन देने में सक्षम हैं लेकिन सपा के पारिवारिक दखल की वजह से वह कई बार अपनी मर्जी के फैसले नहीं ले पाते हैं. सिंघल की नियुक्ति इस बात की पुष्टि करती है. लेकिन अब उन्होंने अपने आप को मजबूती से रखना शुरू कर दिया है.

इस बीच खबर है कि अखिलेश यादव ने राज्यपाल से मिलने का समय मांगा है. इसे लेकर भी तमाम अटकलें लगाई जा रही हैं. कहा जा रहा है कि शायद वो राज्यपाल से मिलकर विधानसभा भंग करने की सिफारिश कर सकते हैं. दूसरी तरफ शिवपाल यादव ने अखिलेश पर निशाना साधते हुए कहा है कि उनके साथ काम करना ब संभव नहीं है. वो अब सरकार में किसी भी भूमिका से मुक्त होना चाहते हैं. आज वे अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप सकते हैं.

परिवार आधारित पार्टी में नियंत्रण और उत्तराधिकार को लेकर लड़ाई होती है. समाजवादी पार्टी में भी मुलायम सिंह की विरासत की लड़ाई होनी है लेकिन आम तौर पर इस तरह की लड़ाई पार्टी के चुनाव हारने के बाद होती है. लेकिन सपा में यह लड़ाई बेहद अहम माने जाने वाले 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले ही शुरू हो गई है. जिसमें शिवपाल यादव कमजोर पड़ते नजर आ रहे हैं. सरकार में कद छोटा किए जाने के बाद अब उनके पास इस्तीफे के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता. 

अखिलेश के इस फैसले के बाद अब सबकी नजर मुलायम सिंह यादव पर टिकी हुई हैं.

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First published: 14 September 2016, 1:49 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

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