Home » इंडिया » Catch Hindi: filmmaker shyam benegal interview with catch news on censor board
 

ऐसी कोई सरकार नहीं होती जिसका अपना एजेंडा न होः श्याम बेनेगल

सौम्या शंकर | Updated on: 6 January 2016, 12:15 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने सेंसर बोर्ड में सुधार के सुझाव देने के लिये एक समिति का गठन किया है. फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल समिति के चेयरमैन हैं. उनके अलावा राकेश ओमप्रकाश मेहरा, पियूष पांडे, भावना सोमैया और नीना लाठ गुप्ता इसके सदस्य हैं.
  • श्याम बेनेगल मानते हैं कि देश में किसी की अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश नहीं लगाया गया है. सेंसर को वो एक जटिल मुद्दा मानते हैं जिसपर सामाजिक प्रतिमानों का ध्यान रखते हुए विचार करना चाहिए.

साल 2015 में अभिव्यक्ति की आज़ादी राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रही. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड(सेंसर बोर्ड) के कई फ़ैसले विवादों में रहे. बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी अपने बयानों और फ़ैसलों के कारण सुर्खियां में आते रहे. जिसकी वजह से अब जाकर सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सेंसर बोर्ड में सुधार के सुझाव देने के लिये एक समिति का गठन किया है.

इसका चेयरमैन फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल को बनाया गया है. बेनेगल के अलावा राकेश ओमप्रकाश मेहरा, पियूष पांडे, भावना सोमैया और नीना लाठ गुप्ता इस समिति के सदस्य हैं. अंकुर, निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों के निर्देशक बेनेगल से कैच न्यूज़ ने विस्तार से बातचीत की.

बातचीत के अंशः

सेंसरशिप के मुद्दे पर आपकी क्या राय है? सेंसरशिप होनी चाहिए या नहीं?


मैं कभी सेंसरशिप के पक्ष में नहीं रहा हूं. हर कलाकार को ख़ुद को अभिव्यक्त करने की आज़ादी होनी चाहिए. लेकिन कई बार कुछ ऐसे हालात और मजबूरी होती है कि किसी कलाकार की किसी अभिव्यक्ति पर रोक लगानी पड़ती है. ये हालात समाजिक प्रतिमानों से तय होते हैं. भारत जैसे सांस्कृतिक बहुलता वाले देश में ये स्थिति और जटिल होती है.

टीवी और फिल्म जनसंचार के माध्यम हैं. ऐसे में कई बार ऐसे हालात सामने आ जाते हैं. आपको पसंद आए या न आए भारत में विविध समुदाय हैं जो किसी भी चीज़ का अपने हिसाब से अर्थ निकाल सकते हैं. ऐसे माहौल में कुछ चीज़ों के साथ आपको एहतियात बरतना पड़ता है. मसलन, हिंसा के मसले पर आपको बहुत सावधान रहना होगा. हमें लोगों की संवेदनशीलता और समझदारी का ध्यान रखना होगा.

मेरे हिसाब से समाज में सेंसरशिप की कोई जगह नहीं है. हम जिसे सेंसर बोर्ड कहते हैं वो सेंसर करने वाला बोर्ड नहीं है वो सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ फिल्म सर्टिफिकेशन है. इसे यही होना भी चाहिए. इसके तहत आप किसी फिल्म को उसके लिए उचित आयु वर्ग और दर्शक वर्ग के हिसाब से प्रमाणपत्र देते हैं.

बोर्ड का असली काम क्या है? क्या इससे किसी फ़िल्म के क्रिएटिव उद्देश्य को नुकसान पहुंचता है? इन सभी बातों पर विचार  करना होगा और इसकी समय समय पर समीक्षा करनी होगी.


ये तो बहुत ही सापेक्षिक मुद्दा हो गया. आखिर संवेदनशीलता और समझदारी की सीमा कौन तय करेगा. ये कैसे तय होगा कि किसका कितना ख्याल रखा जाएगा?


ये सही है कि ये एक सापेक्षिक मुद्दा है लेकिन कुछ विषयों पर वस्तुनिष्ठ भी हुआ जा सकता है. मसलन, अगर दर्शकों में नाबालिग बच्चे हैं तो आप खुद-ब-खुद समझ जाते हैं क्या होना चाहिए. सामाजिक प्रतिमान उस समाज की धार्मिक और सामाजिक पद्धतियों, पृष्ठभूमि और शिक्षा इत्यादि से तय होता है.

जरूरी नहीं है कि दो समाजों के प्रतिमान आपस में टकराएं लेकिन जब ऐसी स्थिति आए तो हमेशा सतर्क रहना चाहिए. अगर कोई चीज़ दिखाने से सचमुच हिंसा होती है तो हमें उस पर संयम बरतना चाहिए.

लेकिन हमारे यहां तो लगभग हर बात पर लोग आहत होने लगे हैं?


ये एक जटिल विषय है. इस पर फौरी राय नहीं दी जा सकती. विभिन्न धर्मों और जातियों के बीच गतिरोध को हल करने के लिए आपको सेंसर की जरूरत नहीं होती. आप मानें या न मानें जनता ख़ुद अपने अनुभव का विवेकवान ढंग से प्रयोग करती है.

यानी आपको दर्शकों के विवेक पर यकीन है?


हां,  न केवल दर्शकों के बल्कि फिल्म निर्माताओं के विवेक पर भी मुझे भरोसा है. हो सकता है कि कुछ बिगड़ैल लोग हों लेकिन ज्यादातर लोग ऐसे नहीं हैं. सवाल बस ये है कि 'समाज के एक खास तबके के लिए क्या उचित नहीं है?'

मौजूदा माहौल में बहुत से समाज का ध्रुवीकरण हो रहा है, ऐसा लगता है कि असामाजिक भावनाओं को भड़काना अब ज्यादा आसान हो गया है?


इन मुद्दों पर गहराई से सोचने की जरूरत है. आज जो राजनीकि रूप से सही है, हो सकता है कि वो कल गलत माना जाने लगे. ये स्थायी मुद्दे नहीं हैं. हम ऐसे सामाजिक प्रतिमानों की बात कर रहे हैं, समय से परे हैं.

सेंसर बोर्ड के साथ आपका निजी अनुभव क्या रहा है?


मैं सेंसरशिप का विरोधी रहा हूं. मेरी फिल्में सेंसर की कैंची का शिकार बन चुकी हैं. निशांत और मंथन दोनों को ये झेलना पड़ा. मुझे बेतुके और निरर्थक तरीके से चीजें हटानी पड़ीं.

मेरी फिल्म भूमिका को 'वयस्क' वर्ग में प्रमाणपत्र दिया गया. इसे पुरुषों से ज्यादा महिलाओं की रुचि वाली फिल्म बताया गया. उन दिनों किसी फिल्म को 'वयस्क' प्रमाणित कर देने का मतलब था कि लोग अपनी पत्नियों को लेकर फिल्म देखने नहीं जाएंगे. यानी जिस फिल्म को महिलाओं की रुचि वाली फिल्म माना गया उससे एक तरह से वही दूर हो गयीं.

क्या आप सांस्कृतिक और कला संस्थानों पर एक खास विचारधारा वालों का कब्जा होने को लेकर आशंकित हैं?


देखिए, ऐसी कोई सरकार नहीं होती जिसका अपना एजेंडा न हो. वो अपने एजेंडे के हिसाब से ही काम करती है. लेकिन ये इसका असर तभी होगा जब ये सामाजिक मूल्यों और स्वीकार्यता के अनुरूप होगा. नहीं तो जनता स्वाभाविक रूप से इसका विरोध करेगी.

क्या ये एजेंडा सामाजिक रूप से मूल्यवान और स्वीकार्य है?


फिल्म और कला के मामले में वैचारिक एजेंडे का परोक्ष प्रभाव पड़ता है. लेकिन मैं इससे बहुत परेशान नहीं हूं. ऐसा नहीं है कि हम फासिस्ट राज्य में रह रहे हैं. किन्हीं कारणों से आप कह सकते हैं कि हम फासिस्ट राज्य में जी रहे  हैं लेकिन ऐसा नहीं है. मीडिया में विभिन्न तरह के विचार सामने आते रहे हैं. अब तक किसी ने उनपर प्रतिबंध नहीं लगाया.

हो सकता है कि सरकार ने कुछ चीजों पर कार्रवाई न की हो लेकिन ऐसा भी नहीं है कि किसी को वो जो करना चाहता है उससे रोका गया हो.

भविष्य में क्या होगा, मैं कह नहीं सकता. मुझे नहीं समझा आता कि जो चीज़ अभी हुई नहीं है उसे लेकर परेशान क्यों होना चाहिए. हमारा एक संविधान है और मुझे नहीं लगता कि कोई उसकी अनदेखी कर रहा है.

हर सरकार अपने तरीके से काम करने की कोशिश करती है. अगर समाज पर इसका नकारात्मक असर पड़ता है तो उसका विरोध होगा.

आखिरकार भारत एक लोकतंत्र है जहां विभिन्न तरह की विचारधाराएं एक साथ मौजूद रहती हैं. सरकार बदलने के साथ विचारधाराएं बदलती रहती हैं. हर किसी को अपने सोच के हिसाब से काम करना चाहिए. हम भी हमेशा वही करते हैं.

पिछले साल गजेंद्र चौहान को एफटीआईआई का चेयरमैन बनाए जाने के बाद विवाद हुआ. फिल्म जगत के कई लोगों ने छात्रों का  समर्थन किया, लेकिन आप उनके साथ नहीं खड़े हुए?


उस मुद्दे पर मेरी राय अलग थी. मैं चाहता था कि गजेंद्र चौहान छात्रों से जाकर मिलें और पता करें को वो किस बात से नाराज हैं.

दूसरी बातों के अलावा उनकी कलात्मक योग्यता पर भी सवाल खड़े हुए?


वो अलग मामला है. मंत्रालय कभी छात्रों से नहीं पूछता कि किसे चेयरमैन बनाया जाना चाहिए. हो सकता है कि उन्हें लगा हो कि उनकी कोई खास राजनीतिक विचारधारा है या वो इस पद के योग्य नहीं हैं. लेकिन इसका सबसे सरल समाधान ये होता कि वो मिलकर बात करते तो समाधान खोजा जा सकता था.

छात्रों ने उनकी विश्वदृष्टि और सिनेमा की जानकारी पर भी सवाल उठाया था?


छात्रों को उनसे सीधे सवाल करना चाहिए था. इसीलिए संवाद जरूरी है. मुझे अफ़सोस हुआ कि चौहान ने छात्रों से मिलने की पहल नहीं की.

आप खुद दो बार एफटीआईआई के चेयरमैन रहे हैं. आपने वहां पढ़ाते भी रहे हैं. आप भारत एक खोज और संविधान जैसे धारावाहिक भी बना चुके हैं जो संस्थागत मदद के बिना संभव नहीं होते?


देखिए, संविधान राज्य सभा के लिए बनाया गया था और भारत एक खोज दूरदर्शन के लिए. मैं ईमानदारी से बता दूं कि दोनों में कई विवादास्पद बातें थीं लेकिन सरकार ने उनपर आपत्ति नहीं की. पता नहीं ये कैसे हुआ लेकिन कई ऐसी बातें थीं जो उन्हें बुरी लग सकती थीं लेकिन नहीं लगीं.

आप अपनी फिल्मों में सामाजिक मुद्दे से जुड़े कड़े सवाल उठाते रहे हैं. क्या पिछले कुछ सालों में आपका लहजा नरम पड़ा है?


ऐसा नहीं है. सवाल ये है कि आप विरोध का कौन सा तरीका चुनते हैं. इसके कई तरीके हो सकते हैं. आप सीधी मुठभेड़ भी कर सकते हैं लेकिन कई बार आपको लगता है कि आपने ऐसा नहीं किया होता तो बेहतर होता. अगर आप बहुत उग्र तरीका अपनाते हैं तो आपकी कोई नहीं सुनता.

क्या आपकी हमेशा से यही राय रही है?


जब आप जवान होते हैं तो आप ज्यादा आक्रोश महसूस करते हैं. लेकिन कई बार आपको लगता है कि अपनी बात कहने के लिए आक्रोश जरूरी नहीं है. ये मुद्दे स्याह-सफेद में नहीं बांटे जा सकते. ये जटिल निर्णय होता है. जब आप जवान होते हैं तो आपको चीजें अलग नजर आती हैं.

सेंसर बोर्ड में सुधार के लिए बनायी गई इस समिति का उद्देश्य क्या है?


आम चिंताओं के अलावा सबसे प्रमुख है ये देखना कि सिनेमा का कारोबारी पक्ष ज्यादा हावी होता जा रहा है. ये एक बहुत जटिल विषय है. मसलन, कोई निर्देशक अपनी फिल्म में फुल फ्रंटल न्यूडिटी दिखाना चाहता है. वो इसके लिए तर्क भी पेश करता है. ऐसे में हमें सामाजिक प्रतिमानों पर विचार करना होगा और सबसे पहले ये सवाल पूछना होगा कि क्या हमें इस तरह न्यूडिटी नहीं दिखानी चाहिए? क्या उस निर्देशक की कलात्मक दिक्कत को किसी और तरीके से हल नहीं किया जा सकता?

कई साल पहले एक इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में एक स्वीडिश फिल्म दिखायी गई. उसमें तीन सेकेंड का सेक्स सीन था. लेकिन हाल के बाहर भगदड़ मच गया था क्योंकि हर कोई वो सीन देखना चाहता था. जबकि वो फिल्म मामूली थी और वो सीन हास्यास्पद.

आज हम ऐसे विषयों पर दो बार सोचते हैं. आज कई फिल्मों में सनसनी परोसी जा रही है जिसे किसी भी तरह कला के तर्क से जायज नहीं ठहराया जा सकता. खजुराहो में भी संभोग के दृश्य हैं ये कहकर आप इसे सही नहीं ठहरा सकते. उसके पीछे एक दर्शन एक इतिहास है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.

सनसनी की बात करें तो आज तो बोलचाल के शब्दों को भी सेंसर किया जा रहा है?


ये एब्सर्ड है.

जेम्स बांड सिरीज की नई फिल्म 'स्पेक्टर' में एक लंबे किसिंग सीन पर सेंसर की कैंची चल गई. वहीं ग्रैंड मस्ती जैसी फिल्में के फूहड़, द्विअर्थी और स्त्री विरोधी संवाद और दृश्यों को इजाज़त मिल जाती है. आप इसे दोहरा मापदंड नहीं मानते?


हां, हम सब इसे जानते हैं. इसीलिए ये काम बहुत जटिल है. सवाल ये है कि, क्या आप सच कह रहे हैं? क्या आप खुद के प्रति ईमानदार हैं? क्या आप दूसरों को धोखा देना चाहते हैं?

आखिरकार हम सापेक्षिक मूल्यांकन के आधार पर काम नहीं कर सकते. हमें बहुत सारे सवाल ख़ुद से पूछने होंगे. अभी मुझे मंत्रालय से इस बाबत केवल पत्र मिला है. मैं मंत्री से मिला नहीं हूं. अभी बहुत काम बाक़ी है.

First published: 6 January 2016, 12:15 IST
 
सौम्या शंकर @shankarmya

A correspondent with Catch, Soumya covers politics, social issues, education, art, culture and cinema. A lamenter and celebrator of the human condition, she hopes to live long enough to witness the next big leap in human evolution or the ultimate alien takeover of the world.

पिछली कहानी
अगली कहानी