Home » इंडिया » first encounter between Bela Bhatia and Naxal Operation's DG Durgesh Awasthi
 

बेला भाटिया और नक्सल ऑपरेशन के डीजी दुर्गेश अवस्थी के बीच सीधा 'एनकाउंटर'

शिरीष खरे | Updated on: 7 October 2016, 7:35 IST
QUICK PILL
  • बस्तर में ऐसा मौक़ा बमुश्किल आता है जब आदिवासियों के लिए काम करने मानवाधिकार कार्यकर्ता और नक्सलियों के विरुद्ध ऑपरेशन चलाने वाले अफ़सर आमने-सामने हों.
  • मगर हाल ही में रायपुर में राजस्थान पत्रिका के आइडिया फेस्ट \'की-नोट\' में मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता बेला भाटिया और नक्सल ऑपरेशन के डीजी दुर्गेश अवस्थी आमने-सामने हुए. 

बेला भाटिया: 'बस्तर में संविधान की बात करना मतलब नक्सली हो जाना'

बस्तर में माओवाद 1980 में पनपा और 2005 से संघर्ष ने बहुत ज्यादा जोर पकड़ लिया. पहले 'सलमा जुडूम' फिर 'ग्रीन हंट' और अब हिंसा का तीसरा वीभत्स दौर चल रहा है. बीते एक दशक में बस्तर के लोगों ने जितना अत्याचार झेला, वह रक्तरंजित इतिहास की दास्तान है.

मगर बड़े दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि सरकार ने अब तक के तजुर्बों से कुछ नहीं सीखा. आज बस्तर में हर 40 लोगों पर एक सुरक्षाबल तैनात है. कश्मीर से भी ज्यादा सैनिक यहां हैं. अंदरुनी क्षेत्रों में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर नाके और सैनिक दिखेंगे, आपको सुरक्षा के नाम पर एक नहीं बार-बार रोका जाएगा.

सरकार को लगता है कि इसी तरह हम माओवाद पर लगाम कस लेंगे. 'सलमा जुडूम' को लेकर लंबे समय तक सुप्रीम कोर्ट में केस चला, तब 500 से ज्यादा लोग मारे गए और 99 महिलाओं के साथ अनाचारों के प्रकरण सामने आए. हजारों घर जले और सालों तक लोग अपने इलाके से बाहर रहे.

2009 में जब धीरे-धीरे लोग लौटने लगे, डरे-सहमे अपनी खेती करने लगे और अपने उजड़े घरों को फिर बनाने लगे तो फिर सरकार ने ऑपरेशन शुरू कर दिया. इसके पहले 'सलमा जुडूम' की सरकारी रणनीति अगर कामयाब थी तो क्या उससे माओवादी हिंसा कम हुई? उसने तो हिंसा को और ज्यादा बढ़ा दिया? सुकमा आज संवेदनशील जिला कहा जाता है, उस दौर में वहां कोई माओवादी आंदोलन नहीं था.

सरकार ने शांति के टापू पर माओवादी आंदोलन के विस्तार का मौका दिया. 'सलमा जुडूम' के बाद में नए नामों से तरह-तरह के समूह बनाए गए, जैसे कि अभी एक है, 'डीआरजी.' इसमें आधे तो समर्पण करने वाले माओवादी होते हैं, जिन्हें शांति के रास्ते पर चलने की बजाय हथियार थमाकर माओवादियों के खिलाफ ही लड़ाया जाता है.

जो जनता डर के मारे चुप बैठी थी, वो हजारों की संख्या में बाहर आकर थाने घेरने लगी. इस दौरान कई हत्याएं हुईं और इनकी जिम्मेदारी डीआरजी में तैनात आदिवासियों पर ही डाल दी गई, जबकि इनकी संख्या बहुत कम है. 'सलमा जुडूम' के समय भी सिर्फ आदिवासियों को बदनाम किया गया था.

सरकार ने अब सीआरपीएफ का नया बटॉलियन शुरू किया है- 'बस्तर बटॉलियन.' इसमें भी आदिवासी लोग ही होंगे. इसमें गैर-आदिवासी क्यों नहीं? स्टिंग ऑपरेशन में 'सामाजिक एकता मंच' की सच्चाई बाहर आई. उन्हें यह कहते हुए पाया गया कि हम 'सलमा जुडूम' नहीं बनाएंगे, अब हम हर जिले में समूह बनाएंगे. इसमें उन्होंने पत्रकार, मानवाधिकार कार्यकर्ता और वकीलों को माओवादी बताकर बस्तर से बाहर निकालने की बात कही.

इस स्टिंग के बाद लोगों के विरोध को देखते हुए 'सामाजिक एकता मंच' ने खुद को समाप्त करने की घोषणा की. इसके बाद 'अग्नि' नाम से नया संगठन खड़ा हो गया. यदि सारे समूह संविधान के साथ हैं तो सुरक्षाबलों द्वारा आदिवासी महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ क्यों नहीं बोला जा रहा है?

हम एक-दूसरे को 'एंटी' बोलने की बजाय संवैधानिक अधिकारों के समर्थन में क्यों नहीं आ सकते? सभी समूहों को आजादी बचाने के लिए लड़ना चाहिए. हम भारत के कानूनों का पालन करने को कह रहे हैं तो हमें ही कहा जा रहा है कि तुम नक्सली हो. हालत यह है कि आज हमें बोलने की आजादी नहीं है. बस्तर में आतंक है, हमने तय किया है कि हम अपनी आजादी के लिए लड़ते रहेंगे. जहां सच्चाई की इज्जत नहीं होती, वहां न्याय कैसे मिलेगा?

बेला भाटिया, मानवाधिकार कार्यकर्ता

दुर्गेश माधव अवस्थी: 'मैं बेला भाटिया और बस्तर के आदिवासियों में फर्क़ बताता हूं'

बस्तर के माओवाद पर एक लंबी चार्टशीट अभी आपने सुनी. बेलाजी इतना अच्छा बोल सकती हैं, इतनी अच्छी चाईशीट प्रस्तुत कर सकती हैं, उन्होंने वही किया और मैं अक्सर उनकी योग्यता का ख्याल रखता हूं. और ये टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में प्रोफेसर भी रही हैं, यही फर्क हैं बेलाजी और बस्तर के हमारे आदिवासियों में.

जिस दिन वे भी इतने शिक्षित हो जाएंगे, बस्तर में नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा. सवाल शिक्षा का है, आदिवासी को मुख्यधारा में लाने का है, उस जगह जो भौगोलिक तौर पर अस्त-वयस्त है, जहां पर डॉक्टर, पुलिस और वन-कर्मचारी नहीं पहुंच पाते हैं.

जो भी व्यक्ति कानून का विरोधी है, जो भी भारत के संविधान में भरोसा नहीं रखता, जो भी किसी भी तरह से गैर-कानूनी काम करता है, चाहे कोई माओवादी हो, चाहे कोई पुलिसवाला, मैं दोनों को न तो पसंद करता हूं और न ही उनको बढ़ावा देता हूं. विश्वसनीय शासन व्यवस्था ही माओवाद का एकमात्र उपाय है और दूसरा कोई विकल्प नहीं.

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पहली पुलिस भर्ती अजीत जोगी के मुख्यमंत्रीत्व काल में हुई, अब दंतेवाड़ा में नवीं बटॉलियन के लिए 200 सिपाहियों की भर्ती हुई, जिसमें 6 हजार से ज्यादा आवेदन आए.

यह आवश्यकता थी और राज्य की मौजूदा सरकार भी इसी दिशा में काम कर रही है. बीते 16 साल में सभी सरकारों ने बस्तर को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया. शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं देने का काम किया. एक बात बड़ी संजीदगी से कहना चाहता हूं कि स्कूल, नालियों को उड़ा देना, यह माओवाद है.

जो आंदोलन भूमि सुधार के नाम पर शुरू हुआ, इस दिशा में बढ़ गया. मैं मानता हूं कि सरकार ने विकास की दिशा में कम काम किया, लेकिन जो स्कूल-डाकघर बन गए, उन्हें भी तोडऩा, जलाना किस काम का माओवाद.

यह समस्या पुलिस विभाग के द्वारा तैयार नहीं की गई है. श्रीनगर जैसे ठंडे प्रदेश के जवान को बस्तर जैसे गर्म स्थान पर रहने का कोई शौक नहीं है, लेकिन वे देश की शासन व्यवस्था को बनाए रखने के लिए यहां हैं, जब बस्तर में शांति आ जाएगी तो उनको रवाना कर दिया जाएगा. कौन नहीं चाहता कि माओवाद खत्म हो जाए.

पुलिस विकल्प नहीं है, बस एक ऐसा उपाय है जो मलेरिया को मिटाने के लिए क्लोरोकीन की तरह इस्तेमाल में लाया जा रहा है. मच्छर खत्म नहीं होगा तो मलेरिया कैसे खत्म होगा? मलेरिया खत्म नहीं होगा तो क्लोरोकीन इस्तेमाल में लाना ही होगा. बस्तर को विकास की दरकार है. विकास का मतलब सिर्फ स्कूल और सड़क और भर नहीं हैं. विकास का असली मतलब शिक्षा है. जैसे-जैसे बस्तर में शिक्षा फैलेगी, माओवाद का हल भी निकलेगा.

2000 में कौन सोच सकता था कि एक दिन सुकमा भी जिला बनेगा और वहां कलक्टर बैठेगा. बस्तर संभाग को 7 इलाकों में सरकार ने बांटा, वहां अच्छे अफसर सेवाएं दे रहे हैं. सारे अफसर-कर्मचारी खराब नहीं हैं. बस्तर में बिल्कुल भय नहीं है. मैं भी आजादी मांगता हूं कि यह देश तमाम माओवादी बंधनों से मुक्त हो, उसके लिए हम सबको नेक इरादों के साथ काम करना होगा.

दुर्गेश माधव अवस्थी, डीजी, नक्सल ऑपरेशन छत्तीसगढ़

First published: 7 October 2016, 7:35 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

पिछली कहानी
अगली कहानी