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हाथ पर प्लास्टर होने के बाद भी मेजर शर्मा ने दुश्मनों से बचाया था कश्मीर, मिला था देश का पहला परमवीर चक्र

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 January 2020, 16:10 IST

Param Vir Chakra awardee Major Somnath Sharma: सेना का सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र, यह सबसे पहले उस पराक्रमी को दिया गया जिन्होंने एक हाथ में प्लास्टर होने के बाद भी कश्मीर को दुश्मनों से बचाया था. इस पराक्रमी का नाम था मेजर सोमनाथ शर्मा. आज उस वीर शहीद सैनिक की जन्म जयंती है.

साल 1950 में देश में पहली बार सर्वोच्च सैनिक सम्मान परमवीर चक्र की शुरुआत हुई. तब भारतीय सेना ने इस सबसे बड़े सम्मान के लिए मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम चुना था. मेजर शर्मा को 21 जून 1950 को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया था.

मेजर शर्मा को परमवीर चक्र ऐसे ही नहीं दे दिया गया. अगर आप इस इस वीर जवान के जांबाजी के किस्से सुनेंगे तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे. साल 1947 के भारत-पाक युद्ध में इन्होंने अपनी जिस वीरता का परिचय दिया था, आज भी पूरा देश उस वीरता का कायल है. 

 

पाकिस्तान ने कर दिया था हमला

साल 1947 में पाकिस्तान ने कश्मीर को हथियाने के लिए जंग छेड़ दी थी. बंटवारे के बाद कबिलाई घुसपैठियों की आड़ में पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर पर हमला बोल दिया था. इसके बाद भारतीय सेना ने 27 अक्टूबर 1947 को एक टुकड़ी कश्मीर घाटी की सुरक्षा के लिए भेजी. तब मेजर शर्मा कुमाऊं बटालियन की डी कंपनी में तैनात थे.

सेना ने उनकी कंपनी को भी कश्मीर में तैनाती का आदेश जारी किया. उस समय मेजर शर्मा के दाहिने हाथ पर प्लास्टर था. हॉकी खेलने के दौरान उनका हाथ चोटिल हो गया था. हाथ की इंजरी को देखते हुए सेना ने उन्हें इस ऑपरेशन से दूर रहने की सलाह दी थी. लेकिन मेजर शर्मा नहीं माने. मेजर शर्मा जंग के मैदान में हाथ से नहीं अपने हौसले से जौहर दिखाना चाहते थे.

स्थानीय लोगों ने डी कंपनी पर कर दिया था हमला

उन्हें बडगाम में डी कंपनी के साथ भेजा गया. उन्हें उत्तर की तरफ से बढ़ने वाले पाक सैनिकों को श्रीनगर पहुंचने से रोकना था. इस दौरान डी कंपनी के जवानों पर स्थानीय घरों से फायरिंग शुरू हो गई. सैनिकों ने जवाबी कार्रवाई नहीं की, क्योंकि वह स्थानीय लोगों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती थी.

700 आतंकियों और पाक सैनिकों की टुकड़ी तभी बडगाम की तरफ बढ़ी. मेजर शर्मा की टीम दुश्मनों से घिर गई थी. उनपर मोर्टार से हमला हुआ. लेकिन मेजर शर्मा की सैन्य टुकड़ी ने बहादुरी से मुकाबला किया. हाथ पर प्लास्टर चढ़े होने के बावजूद मेजर शर्मा तीन सैन्य टुकड़ियों का संचालन कर रहे थे.

वो कभी एक पोस्ट पर जाते तो कभी दूसरे पोस्ट पर जाते. इस दौरान वो तीन सैन्य टुकड़ियों बीच भागदौड़ कर रहे थे. आंतकियों और पाकिस्तानी सेना को रोके रखना जरूरी था. खुद मेजर शर्मा भाग-भागकर सैनिकों के बीच हथियार तथा गोला-बारूद सप्लाई कर रहे थे. 

इस दौरान आतंकियों का एक मोर्टार जखीरे पर गिरा और भयानक विस्फोट हुआ. भयानक हमले में मेजर शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे. उन्होंने शहीद होने से पहले अपने हेडक्वॉर्टर को एक संदेश भेजा था. इसमें लिखा था, "दुश्मन हमसे सिर्फ 50 यार्ड्स की दूरी पर हैं. हमारी संख्या काफी कम है. हम भयानक हमले की जद में हैं. लेकिन हमने एक इंच जमीन नहीं छोड़ी है. हम अपने आखिरी सैनिक और आखिरी सांस तक लड़ेंगे."

जंग के मैदान में भारत के एक सैनिक की तुलना में पाक सैनिकों की संख्या 7 थी. इसके बाद भी मेजर शर्मा की कंपनी ने 200 आतंकियों को ढेर कर दिया था. मुठभेड़ में मेजर शर्मा समेत 20 जवान शहीद हुए थे. मेजर शर्मा की बॉडी तीन दिन बाद मिली. मेजर के शव को उनके पिस्टल के होल्डर और सीने से चिपके भगवत गीता से पहचाना जा सका. इसके बाद जब सेना के पहले सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र का ऐलान हुआ तो पहले नाम के तौर पर मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम चुना गया.

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First published: 31 January 2020, 16:10 IST
 
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