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सर्जिकल स्ट्राइक के बीच शौर्य स्मारक, विश्वयुद्ध के बाद पहला वॉर मेमोरियल

शैलेंद्र तिवारी | Updated on: 12 October 2016, 7:26 IST
QUICK PILL
  • आठ साल पहले मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वीरगति को प्राप्त भारतीय सैनिकों की याद में वॉर मेमोरियल बनाने का ऐलान किया था.
  • 41 करोड़ की लागत से अब यह मेमोरियल बनकर तैयार है. 14 अक्टूबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका उद्धघाटन करेंगे.

आठ साल पहले की बात है. 10 जुलाई, 2008 के दिन. यह भारतीय सेना के कर्नल मुशरान की जयंती पर आयोजित होने वाली संगोष्ठी का अवसर था. दिल्ली के इंडिया हैबिटेट सेंटर में. इस मौके पर तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल दीपक कपूर भी मौजूद थे. विषय बहुत वाजिब था, 'युवा भारतीय सेना के प्रति आकर्षित क्यों नहीं होते?'

इस सवाल का जवाब देने के लिए जनरल दीपक कपूर मंच पर आते हैं. और जवाब से पहले वो एक सवाल वहां मौजूद लोगों से करते हैं. आज आप लोग बताइए कि सेना को आम आदमी और युवाओं के बीच आकर्षण का मुद्दा बनाए रखने के लिए हम सबने किया ही क्या है?

सेना प्रमुख यहीं नहीं रुके. उनके सवालों का सिलसिला लंबा होता गया. जांबाज सैनिकों की शौर्य गाथाएं शहादत के वक्त तो याद रहती हैं, उसके बाद उन्हें कितने लोग याद रखते हैं? क्यों नहीं सेना और उनके जवानों के कामों को आम आदमी के बीच में लाया जाता है? क्यों नहीं उनकी शहादत को अमर करने का प्रयास होता है? क्यों नहीं दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अब तक हम एक भी वॉर मेमोरियल बना पाए?

इन सवालों के बाद सभागार में सन्नाटा पसर गया, तब सेनाध्यक्ष के सवालों का जवाब देने के लिए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खड़े होते हैं. उन्होंने वहीं पर खड़े-खड़े ऐलान किया कि मध्यप्रदेश अपने जांबाज सैनिकों की याद में वॉर मेमोरियल (शौर्य स्मारक) जरूर बनाएगा. ऐलान हो गया और तालियां भी बज गईं. मुख्यमंत्री लौटकर भोपाल आ गए, एक औऱ चुनाव जीतकर सत्ता में फिर से आ गए. लेकिन वार मेमोरियल का सवाल बना रहा.

मोदी राष्ट्र को समर्पित करेंगे यह मेमोरियल

जवाब खोजने का काम किया, मुख्यमंत्री के तत्कालीन अघोषित कानूनी सलाहकार और वर्तमान में कांग्रेस के सांसद विवेक तन्खा ने. उन्होंने सलाह दी कि क्यों नहीं बन सकता, हम अपने प्रदेश के शहीदों की याद में वॉर मेमोरियल बनाएंगे. यह सवाल इसलिए बड़ा बना हुआ था, क्योंकि सेना ने केंद्र सरकार से वॉर मेमोरियल के लिए जगह की मांग की हुई थी. यह बात और है कि मध्यप्रदेश का वॉर मेमोरियल बनकर तैयार है और 14 अक्टूबर को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसे राष्ट्र को समर्पित करने वाले हैं.

लेकिन सेना का मेमोरियल अब तक खाके से बाहर नहीं आ सका है. इस बीच मौजूं बात यह भी है कि जो वॉर मेमोरियल तीन साल से राष्ट्रपति की तारीख नहीं मिल पाने के कारण अटका हुआ था, वह अब सर्जिकल स्ट्राइक के शोर में देश के सामने आने जा रहा है.

संयोग या राजनीति?

शौर्य स्मारक को बनने में आठ साल से ज्यादा का वक्त लगा. 41 करोड़ से ज्यादा रुपया खर्च हुआ और मंत्रालय एवं विधानसभा के बगल में उसे जगह दी गई. लेकिन यह संयोग की बात है कि मध्यप्रदेश का शौर्य स्मारक देश को उस समय समर्पित हो रहा है, जब पूरे देश में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राजनीतिक नफा-नुकसान की बातें हो रही हैं.

हर राजनीतिक दल उसे अपने फायदे-नुकसान के हिसाब से भुना रहा है. लेकिन मध्यप्रदेश में शौर्य स्मारक के उद्घाटन की तारीख तय करते वक्त तक सर्जिकल स्ट्राइक जैसी बातें जेहन में भी नहीं थी. इसे महज एक संयोग भर माना जाए कि शौर्य स्मारक के शुभारंभ की तारीख तय होने के बाद सर्जिकल स्ट्राइक की घटना हुई.

हालांकि अटकलें लोग इस पर भी लगा रहे हैं कि क्या यह सब कुछ पहले से तय था? यह सवाल इसलिए भी खड़ा होता है कि आखिर जब पूरे देश में सेना की इस कार्रवाई के नफा-नुकसान की बात हो रही है. ऐसे में भोपाल में वॉर मेमोरियल का उद्धाटन. सेना के पूर्व जवानों और उनके परिजनों की रैली को प्रधानमंत्री का संबोधन. इतना ही नहीं, रैली में इस बात की भी कोशिशें हो रही हैं कि कैसे भी उरी आतंकी हमले के शहीद परिवारों को भी लाया जाए. मतलब, सवाल खुद-ब-खुद ही खड़े हो रहे हैं.

शौर्य स्मारक में क्या है?

राजनीतिक चश्मे से अलग हटकर देखें तो शौर्य स्मारक वाकई में अद्भुत है. 12.67 एकड़ में फैले इस स्मारक की कारीगरी से लेकर 62 फीट का शौर्य स्तंभ कारीगरी और शिल्प का संगम है.

कांच की परतों पर मध्यप्रदेश के जांबाज शहीदों के नाम उकेरे गए हैं. स्मारक की बनावट में जिंदगी, युद्ध, मौत और मौत पर विजय को भी प्रदर्शित किया गया है. पत्थरों को चौकोर अथवा सार्वजनिक वर्ग के रूप में देखकर जीवन की संतति को समझते हैं. जीवन के भीतर का उतार-चढ़ाव एंफीथियेटर की सीढ़ियों जैसे आकार में दिखाई देता है.

एक वृत्ताकार आंगन को युद्ध की विभीषिका से आहत धरती को दिखाने की कोशिश की गई है. युद्ध की निष्ठुरता से हुए विनाश एवं हानि के कारण मानवता कैसे व्यथित हो उठती है, इसे बखूबी असमतल धरती तथा तराशे हुए स्थानीय पत्थरों से बताने की कोशिश की गई है. इसमें बरबस ही दुख और अवसाद की अनूभूति होती है.

उम्मीद की किरण

मृत्यु की भयावहता और खोई हुई आशाओं को दर्शाने के लिये एक छोटा वर्गाकार क्षेत्र पूरी तौर पर अंधकारमय एवं काला निर्मित किया गया है. यह दर्शाता है कि किस तरह से एक मौत अचानक से जीवन को अंधेरे में धकेल देती है. दीपक की एक छोटी सी लौ जरूर यहां पर मृत्यु पर विजय की आशा जगाती हुई नजर आएगी.

गीता के मूल मंत्र को यहां पर अंगीकार करने की कोशिश की गई है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अजर-अमर. जीवन के इस अलौकिक और शाश्वत सत्य की अनुभूति को जीवंत बनाने के लिये स्मारक परिसर में 2 से 3 मीटर ऊंची धातु की छड़ों को सेना की टुकडिय़ों की तरह सुव्यवस्थित रूप से स्थापित किया है. इन छड़ों के ऊपरी सिरों पर फाइबर ऑप्टिक्स लाइट्स के प्रकाश-पुंज रात के अंधेरे में जगमगायेंगे. धातु की छड़ों के तल पर बिछी जल की चादर, शांति तथा पवित्रता का प्रतीक होगी.

First published: 12 October 2016, 7:26 IST
 
शैलेंद्र तिवारी @catchhindi

लेखक पत्रिका मध्यप्रदेश के स्टेट ब्यूरो चीफ हैं.

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