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लोकप्रिय की बजाय दूरदर्शिता से भरा बजट

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 14 February 2017, 7:05 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

संसद में बुधवार को वर्ष 2017-18 का आम बजट पेश कर दिया गया. बजट से दो बड़े पहलुओं पर सरकार की प्रतिबद्धता का पता चलता है. बजट में कई क्षेत्रों में ज्यादा आवंटन किया गया है जिस पर तुरन्त ही ध्यान दिए जाने की जरूरत है. बजट में कड़े राजकोषीय समेकन के रास्ते पर चलना भी जारी रखा गया है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने किसी भी बड़ी योजना (जैसा कि यूनीवर्सल बेनीफिट स्कीम की चर्चाएं थी) की घोषणा तो नहीं की है लेकिन बजट से यह झलकता है कि वित्त मंत्री ने लोकप्रिय बजट पेश करने के स्थान पर दूरदर्शिता और सावधानीपन को अपनाया है. 

ऐसा पता चलता है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने नोटबंदी के असर को सही तरीके से मैनेज कर लिया है. व्यक्तिगत लोगों के लिए करों की दरें घटाई गईं हैं और कॉरपोरेट करों को कम कर माइक्रो स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज (एमएसएमई) को बढ़ावा दिया गया है. इन उपायों से तकलीफों से कुछ राहत तो मिलेगी ही. 

दूसरी ओर, सस्ते घरों का दायरा बढ़ाया गया है. अफोर्डेबल हाउसिंग की परिभाषा बदली गई है जिससे नगदी की कमी से जूझ रहे सबसे बड़े निर्माण क्षेत्र को लाभ पहुंचेगा. हालांकि, उन्होंने वर्ष 2017-18 में राजकोषीय़ घाटा 3.2 फीसदी रखने के लक्ष्य का अनुमान लगाया है. उनका यह अनुमान दो बड़े बुनियादी आधारों कर संग्रह बढ़ाकर और सरकारी कम्पनियों में अपनी हिस्सेदारी बेचने की योग्यता पर निर्भर करेगा. 

वर्ष 2016-17 के बजट में कुल विनिवेश लक्ष्य 56,500 करोड़ रुपए का था और संशोधित अनुमान 45,500 करोड़ पर आ गया था. हालांकि, 2017-18 के बजट में लक्ष्य 72,500 करोड़ रुपए का रखा गया है. यह संशोधित अनुमानों की तुलना में 59 फीसदी ज्यादा है. करों से ज्यादा राजस्व संग्रह के लिए वित्त मंत्री ने बेहतर कर संग्रह क्रियान्वयन और करों का आधार बढ़ाने पर भरोसा किया है.   

व्यक्तिगत करदाता

व्यक्तिगत कर की सीमा स्लैब में भी बदलाव किया गया है. अब 5 लाख रुपए तक की सालाना आय वाले सभी लोगों को 10 फीसदी की जगह 5 फीसदी ही कर देना होगा. 3 लाख तक की आय पर कर से राहत दी गई है जबकि 50 लाख से 01 करोड़ रुपए के बीच की आय पर 10 फीसदी सरचार्ज देना होगा. इस आय वर्ग में आने वालों पर अतिरिक्त कर दायित्व 2.77 लाख रुपए का होगा जो अंतिम होगा. 

शिक्षा, कौशल और नौकरी

बजट में रोजगार और रोजगार के साधनों के सभी पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान केन्द्रित करने की कोशिश की गई है. वित्त मंत्री ने सेकेण्डरी स्कूल के स्तर से ही एक ऐसी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव किया है जिसके चलते पढ़ाई के दौरान ही स्थानीय नवाचार कंटेट के जरिए क्रिएटिविटी को बढ़ावा दिया जा सके. यूजीसी के मानकों में भी सुधार का प्रस्ताव किया गया है. 

इससे गुणवत्ता वाले संस्थान प्रशासनिक और अकादमिक स्वायत्ता को हासिल करने में समर्थ और सक्षम हो सकेंगे. ऑनलाइन कोर्सेज को कॉलेज डिग्री की तरह मानने का भी प्रस्ताव किया गया है. इसके लिए स्वयं नाम से ऑनलाइन प्लेटफार्म लांच किए जाने का प्रस्ताव किया गया है. 

इसके तहत छात्र कम से कम 350 से ज्यादा कोर्सों की पढ़ाई वर्चुअली कर सकेंगे. उन्हें बेतर संकाय उपलब्ध होंगे, पढ़ने के उच्च स्तरीय संसाधन उपलब्ध हो सकेंगे, वे विचार-विमर्श में भाग ले सकेंगे और इन कोर्सेस के जरिए अकादिमक ग्रेड हासिल कर सकेंगे. 

कौशल विकास पर अरुण जेटली ने प्रधानमंत्री कौशल विकास केन्द्रों का दायरा बढ़ा दिया है. अभी वर्तमान में 60 केन्द्र हैं. अब ये केन्द्र पूरे देश के 600 जिलों से ज्यादा को कवर करेंगे. वित्त मंत्री ने पूरे देश में 100 इंडिया इंटरनेशनल स्किल्स सेंटर भी स्थापित किए जाने की घोषणा की है. 

उन्होंने 4,000 करोड़ रुपए की लागत से एक कार्यक्रम संकल्प (स्किल एक्विजीशन एंड नॉलेज अवेयरनेस फॉर लिवलीहुड प्रमोशन प्रोग्राम) भी लांच किए जाने की घोषणा की है. संकल्प के जरिए 3.5 करोड़ युवाओं को बाजार आधारित प्रशिक्षण मिल सकेगा. 

भारत की सबसे बड़ी गरीबी उन्मूलन योजना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम अथवा मनरेगा में अब तक का सबसे बड़ा बजट आवंटन किय़ा गया है. बजट में मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपए का आवंटन किया गया है. नोटबंदी के चलते जिन गरीब ग्रामीणों को रोजगार नहीं मिल पाया है, इस बढ़े हुए आवंटन से उनकी क्षतिपूर्ति करने में मदद मिलेगी. 

डिजिटल अर्थव्यवस्था

डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा देने से व्यवस्था में साफ-सफाई होगी, भ्रष्टाचार और कालेधन से निपटने में मदद मिलेगी. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को अपने बजट भाषण में यह भी कहा कि सरकार जल्द ही आधार आधारित भुगतान व्यवस्था को लागू करने जा रही है जिससे तटवर्ती क्षेत्रों और सुदूर गांवों में रहने वाले लोग डिजिटल लेनदेन कर सकेंगे. वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि यह य़ोजना विशेषकर उन लोगों के लिए लाभकारी होगी जिनके पास डेबिट कार्ड नहीं हैं, मोबाइल फोन नहीं हैं, मोबाइल वॉलेट्स नहीं हैं.  

जेटली ने यह भी कहा कि क्रेडिट पर लागत कम हो जाने से देश में निजी विनिवेश को भी बढ़ावा मिलेगा. भारत अब बड़े पैमाने पर डिजिटल क्रांति की ओर अग्रसर है. आम आदमी के डिजिटल प्लेटफार्म की ओर मुड़ जाने से बड़े लाभ होंगे. 

वित्त मंत्री ने आगे यह भी कहा कि 2017-18 में यूपीआई, यूएसएसडी, आधार भुगतान, आईएमपीएस और डेबिट कार्ड के जरिए 2,500 करोड़ डिजिटल लेनदेन के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए एक मिशन भी स्थापित किया जाएगा. बैंकों ने भी मार्च 2017 तक अतिरिक्त 10 लाख प्वाइंट ऑफ सेल टर्मिनल चाली करने का लक्ष्य तय किया हुआ है.   

दूसरी ओर, सरकार ने कैशलैस लेनदेन की प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाली डिवाइसेस (सेल्स मशीन, फिंगर प्रिंट रीडर्स आदि) पर से सभी तरह की ड्यूटी हटा ली है. वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि कैशलैस लेनदेन को बढ़ावा देने के लिए मैं बीएसडी (बेसिक कस्टम ड्यूटीज), एक्साइज ड्यूटी, सीवीडी (काउंटरवेलिंग ड्यूटीज) सैड (स्पेशल एडीशनल ड्यूटी) को मुक्त करने का प्रस्ताव करता हूं. 

आधार आधारित भुगतान व्यवस्था लागू होने से सुदूर गांवों के लोग भी आसानी से डिजिटल लेनदेन कर सकेंगे.

महिलाओं और बच्चों के कल्याण के लिए बजट आवंटन बढ़ाया गया है. वर्ष 2016-17 में यह आवंटन 1,56,528 करोड़ रुपए था जिसे 2017-18 में बढ़ाकर 1,84,632 करोड़ रुपए किया गया है. गांवों में महिला शक्ति केन्द्र भी स्थापित किए जाने का प्रस्ताव किया गया है. 

इसके लिए 14 लाख आईसीडीएस आंगनवाड़ी केन्द्रों में 500 करोड़ का आवंटन किया गया है. वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि इन केन्द्रों से महिलाओं को कौशल विकास, रोजगार, डिजिटल साक्षरता, स्वास्थ्य और न्यूट्रीशन की सेवाओं के अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे जिससे उनका सशक्तिकरण होगा.   

राजकोषिय घाटा

कुल खर्च में 8 फीसदी की वृद्धि के बावजूद राजकोषीय घाटा 2017-18 के लिए जीडीपी का 3.2 फीसदी रखा गया है और अगले साल 2018-19 के लिए यह घाटा 3 फीसदी रहने का अनुमान लगाया गया है. वर्ष 2017-18 के लिए कुल व्यय 21.47 लाख करोड़ रखा गया है. 2016-17 में बजट अनुमान 19.87 लाख करोड़ रुपए था. 

हालांकि, जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह खर्च कमी की ओर दर्शाता है. सरकार के कुल खर्च का अनुमान जीडीपी का 12.7 फीसदी है जबकि 2016-17 के संशोधित अनुमानों में यह 13.4 फीसदी था. 

कहना न होगा कि मितव्ययता पूर्ण खर्च का यह भी परिणाम निकलेगा कि बाजार से उधार लेने में कमी आएगी. बजट दस्तावेजों के अनुसार सरकार वर्ष 2016-17 के 4.25 लाख करोड़ की तुलना में अगले साल बाजार से 3.48 लाख करोड़ रुपए उधार लेगी. सरकार द्वारा कम उधार लेने का दोहरा असर होगा. इससे बैंक निजी क्षेत्र को ज्यादा कर्ज दे सकेंगे और सरकार के लिए ब्याज भुगतान में भी कमी आएगी. 

First published: 14 February 2017, 7:05 IST
 
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