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इन 6 वजहों से स्मृति ईरानी नहीं बन पाएंगी यूपी की सीएम उम्मीदवार

अतुल चौरसिया | Updated on: 24 May 2016, 17:47 IST
(कैच न्यूज़)

गुरूवार को पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के साथ ही दिल्ली में एक सुगबुगाहट तेजी से फैली कि स्मृति ईरानी को मानव संसाधन विकास मंत्रालय से हटाकर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों की कमान दी जा सकती है. अगले कैबिनेट पुनर्गठन में इस काम को अंजाम दे दिया जाएगा. शनिवार तक यह अफवाह लगातार मजबूत होती गई. लिहाजा पत्रकारों में भी इस सुगबुगाहट की थाह लेेने की होड़ लग गई.

गौरतलब है कि स्मृति ईरानी ने उत्तर प्रदेश की अमेठी लोकसभा सीट से राहुल गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ा था पर हार गई थीं. गाहे-बगाहे वो अब भी अमेठी हो आती हैं. पार्टी के सूत्र बताते हैं कि आलाकमान ने उन्हें अमेठी में लगातार काम करते रहने को कहा है. क्या इसके पीछे उन्हें उत्तर प्रदेश जैसे सूबे की कमान देने की योजना भाजपा की है? इसे समझने के लिए उत्तर प्रदेश की सियासी हकीक़त और उसमें स्मृति ईरानी किस हद तक फिट बैठती हैं यह समझना जरूरी होगा.

उत्तर प्रदेश जितना बड़ा और महत्वपूर्ण है, उतना ही जटिल है लिहाजा यहां दिल्ली, हरियाणा, महाराष्ट्र या झारखंड की तर्ज पर किसी नेता को केंद्रीय नेतृत्व द्वारा थोपने की कोशिश शायद ही हो. इसके अलावा उत्तर प्रदेश भाजपा के मसले सिर्फ भाजपा तय नहीं करती, उसमें संघ के विचारों और निर्देशों की पर्याप्त मिलावट भी होती है. हम यहां ऐसे पांच कारणों का जिक्र करने जा रहे हैं जिनकी वजह से स्मृति ईरानी के उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनने की खबर शायद अगले चुनावों में सच न हो सके.

स्वयंसेवक

उत्तर प्रदेश किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले संघ के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है. उसकी राजनीति के तमाम ध्रुव मसलन अयोध्या, मथुरा, काशी जैसे उसके हृदय के करीब रहने वाले मुद्दे उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखते हैं. उत्तर प्रदेश में संघ के सबसे बड़े पोस्टर ब्वाय रहेे कल्याण सिंह, बाबरी मस्जिद विध्वंस के दौरान उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे.

इसके बाद भी जब-जब भाजपा को सत्ता में आने का मौका मिला तब कमान राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह जैसे समर्पित स्वंयसेवकों को दी गई. राजनाथ सिंह का संघ से गहरा रिश्ता जगजाहिर है.

हम स्मृति ईरानी को देखें तो संघ से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है. यह कमी उनके आड़े आएगी

इस नजरिए से हम स्मृति ईरानी को देखें तो संघ से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं रहा है. यह कमी उनके आड़े आएगी. संघ के सूत्रों की मानें तो वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश की कमान नहीं सौंपने देगा जिसका उससे सीधा और गहरा जुड़ाव न हो. संघ के एक शीर्ष पदाधिकारी इसकी ताकीद करते हैं, 'उत्तर प्रदेश की राजनीति किसी एक फैक्टर से तय नहीं होती. यहां जातियां है, इलाके हैं और सबसे ऊपर संघ की विचारधारा है. स्मृति ईरानी इनमें से किसी खांचे में फिट नहीं बैठतीं.'

स्मृति से संघ को एक और शिकायत है. उनका मानव संसाधन मंत्रालय में अब तक का प्रदर्शन संघ को रास नहीं आया है. संघ के वही पदाधिकारी बताते हैं, 'जिस तरह का प्रदर्शन उन्होंने अब तक मानव संसाधन मंत्रालय में किया है उससे संघ में कोई खास खुशी या भरोसा उन पर नहीं है. भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश का महज राजनैतिक महत्व हो सकता है लेकिन हमारे लिए यह विचारधारा का प्रश्न है.'

यह बात साफ है कि उत्तर प्रदेश के मामले में संघ की बात अंतिम होगी और यह बात स्मृति के पक्ष में शायद नहीं जाएगी.

भितरघात

2014 के लोकसभा चुनाव चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश भाजपा के बारे में एक बात कही जाती थी कि यहां बर्तन तो बहुत हैं पर गिरवी रखने लायक एक भी नहीं हैं. यह बात प्रदेश इकाई में मौजूद बड़ी संख्या में नेताओं की फेहरिश्त को लेकर कही जाती थी. लगातार तीन चुनावों से भाजपा तीसरे स्थान पर आ रही है. कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह जैसे बड़े कद वाले नेताओं को छोड़ भी दिया जाय तो पूर्व प्रदेश अध्यक्षों और पूर्व मंत्रियों की बड़ी कतार राज्य में है. फिर भी चुनाव दर चुनाव भाजपा की हालत खराब होती गई. लेकिन लोकसभा चुनावों में चली मोदी की लहर ने इस खामी पर परदा डाल दिया.

यहां मुख्यमंत्री पद की दौड़ में खुद को सबसे आगे रखने वाले योगी आदित्यनाथ भी हैं. उनकी अपनी हिंदू युवा वाहिनी भी है जिसके बैनर तले वो लोगों को चुनाव भी लड़ा चुके हैं. लेकिन पार्टी उनकी अतिशय महत्वाकांक्षा के कारण कभी भी उन्हें एक हद से ज्यादा मौका नहीं देती. तीन बार से सांसद होने के बाद भी पार्टी ने उन्हें केंद्र में एक मंत्री पद तक नहीं दिया है जबकि उनसे काफी नए नवेले लोग पार्टी में बहुत आगे निकल गए हैं.

नेताओं की लंबी-चौड़ी लिस्ट में लक्ष्मीकांत वाजपेयी, रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा, ओमप्रकाश सिंह, सूर्य प्रताप शाही आदि तमाम नेता हैं.

मोदी आज भाजपा में सर्वव्यापी हैं. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की तर्ज पर बाहर से किसी नेता को थोपने की कीमत उन्हें भितरघात के रूप में चुकानी होगी. ऐसा करने की स्थिति में पार्टी के भीतर एक स्वाभाविक विरोध पैदा होगा. यह स्थिति भाजपा के लिए अच्छी नहीं होगी. विशेषकर तब जब मोदी की लहर में गिरावट दिख रही है.

भाजपा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस से भी कुछ न कुछ सीख जरूर लेगी. गौरतलब है कि कांग्रेस यूपी में लगभग चौथाई सदी से हाशिए पर है. संगठन का नामोनिशान नहीं है. लगातार पार्टी चौथे स्थान पर रहती आई है. इसके बावजूद जब से कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश में प्रशांत किशोर की सेवाएं ली हैं, पुराने कांग्रेसी असहयोग का सुर छेड़े हुए हैं. प्रशांत का अब तक कई बैठकों में खुलेआम विरोध हो चुका है. यहां तक खबरें आई कि प्रशांत कांग्रेस के अभियान से खुद को अलग भी कर सकते हैं. किसी बाहरी को थोपने की स्थिति में भाजपा को भी इस स्थिति से दो-चार होना पड़ सकता है.

जाति

जाति के सीमकरण को साधे बिना उत्तर प्रदेश में कोई पार्टी कदम आगे नहीं बढ़ाती. भाजपा भी उनसे अलग नहीं है. भाजपा की अब तक जो रणनीति रही है उसमें दलितों और पिछड़ों के एक वर्ग को अपने साथ लेकर आगे बढ़ने की मंशा दिखती है. जबकि अगड़ी जातियों को उसका स्वाभाविक साझीदार माना जाता है. इसी रणनीति के तहत पार्टी ने एक अति पिछड़ी जाति के नेता केशव मौर्या को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है.

स्मृति ईरानी में ऐसा कोई फैक्टर नहीं है जो प्रदेश की किसी बड़ी जाति को अपनी तरफ खींच सके

लेकिन उत्तर प्रदेश की जातियों के किसी समीकरण में स्मृति फिट नहीं बैठती हैं. जातियों में बुरी तरह से बंटे सूबे में ज्यादातर पार्टियां अपने चेहरों के जरिए किसी खास वोटबैंक को संदेश देने की कोशिश करती हैं. लेकिन स्मृति ईरानी में ऐसा कोई फैक्टर नहीं है जो प्रदेश की किसी बड़ी जाति को अपनी तरफ खींच सके. लिहाजा भाजपा भी उन्हें चेहरा बनाने का खतरा शायद ही मोल ले.

बाहरी

जातियों, समूहों और पहचानों को लेकर बंटे हुए राज्य में बाहरी-भीतरी की राजनीति होना कोई बड़ी बात नहीं है. उत्तर प्रदेश इकाई के एक भाजपा नेता इसे घुमाकर इस तरह से कहते हैं, 'पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी ने उमा भारती को मध्य प्रदेश से यहां लाकर सियासत करने की कोशिश की थी, लेकिन जो हुआ वह सबको पता है. भाजपा 48 सीटों पर सिमट गई. उमा की तुलना में स्मृति कहां ठहरती हैं.'

भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी इस तथ्य को लेकर चौकन्ना है क्योंकि उसे उत्तर प्रदेश से लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश मिला है. 73 सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों को जीत हासिल हुई थी. इस पहाड़ सरीखी जीत को दोहराने का दबाव भी मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर है. लिहाजा वो ऐसे किसी भी तथ्य की अनदेखी शायद ही करें जो उनके उत्तर प्रदेश अभियान की हवा निकाल दे.

राजनीतिक पार्टियां स्मृति को चेहरा बनाने की सूरत में उनके बाहरी होने के मुद्दे को हाथों-हाथ लपक लेंगी. 

दलित

हालांकि स्मृति ईरानी ने संसद में खुद को मां की ममता से भरा-पुरा बताया था लेकिन उनकी और उनके मंत्रालय की छवि रोहित वेमुला आत्महत्या के मामले में बहुत दागदार हुई है. हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला ने खुद को रस्टिकेट किए जाने के बाद आत्महत्या कर ली थी. बाद में यह बात सामने आई कि रोहित के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विश्वविद्यालय के वीसी को मानव संसाधन मंत्रालय ने थोड़े-थोड़े अंतराल पर कई पत्र लिखे थे. ऐसा उनके मंत्रालय ने एक अन्य केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय की शिकायत पर किया था. यह आत्महत्या राष्ट्रीय स्तर पर विवाद का मुद्दा बन गया. रोहित एक दलित छात्र था.

भाजपा ने बीते कुछ समय के दौरान खुद को दलितों का हितैषी साबित करने वाले तमाम काम किए हैं. उत्तर प्रदेश में सुहेलदेव की यात्रा से लेकर रविदास जयंती और आंबेडकर जन्मदिवस जैसे कार्यक्रम बड़े पैमाने पर आयोजित कर पार्टी ने दलितों को लुभाने की हरचंद कोशिश की है.

उत्तर प्रदेश में दलितों की बड़ी आबादी को दखते हुए भाजपा की यह रणनीति दूरगामी जान पड़ती है, लेकिन स्मृति को उत्तर प्रदेश की कमान थमाने की सूरत में इस रणनीति की हवा निकल सकती है. यहां दलितों की सबसे बड़ी पार्टी बसपा और सबसे बड़ी नेता बहन मायावती से भाजपा का सामना है. ऐसे में अगर कथित दलित विरोधी स्मृति ईरानी को भाजपा कमान देती है तो यह उसके लिए राजनीतिक भूल सिद्ध हो सकती है. जैसा कि भाजपा के एक नेता कहते भी हैं, 'स्मृति के आने की सूरत में बहन मायावती को बड़ा हथियार मिल जाएगा. वो हर हाल में रोहित के मुद्दे को चुनाव में उछालेंगी. इससे दलित उनके पक्ष में लामबंद हो सकते हैं.'

भाजपा इतना बड़ा खतरा शायद ही मोल ले. 

विवादप्रिय व्यक्तित्व

विवाद स्मृति ईरानी के आगे-आगे चलते हैं. आलम ये है कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद से उनके और उनके मंत्रालय के साथ सबसे ज्यादा विवाद जुड़े हैं. उनकी डिग्री का विवाद, रोहित वेमुला की आत्महत्या, यूजीसी नेट विवाद के अलावा पिछले साल गोवा में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक के दौरान एक कपड़े की दुकान में हिडेन कैमरा होने जैसे गैर राजनीतिक विवाद भी उनके साथ जुड़ते रहे हैं. उनकी इस छवि से संघ के भीतर उनके प्रति यह सोच भी व्याप्त है कि वो गैरजरूरी आकर्षण का विषय बनती रहती हैं. इसके अलावा पार्टी के भीतर भी एक तबका उनकी प्रधानमंत्री से नजदीकी के चलते उनका पत्ता काटने की फिराक में रहता है.

बावजूद इसके उत्तर प्रदेश के आगामी चुनावों में ईरानी की एक अहम भूमिका जरूर रहेगी. इसकी वजह उत्तर प्रदेश का सियासी परिदृश्य है. आगामी चुनाव में कांग्रेस की तरफ से सोनिया गांधी के साथ प्रियंका के भी कैंपेन करने की प्रबल संभावना है. दूसरी तरफ बसपा और मायावती होंगी. इन महिला चेहरों के मुकाबले में भाजपा स्मृति का इस्तेमाल एक स्टार कैंपेनर के तौर पर जरूर करेगी. सुषमा स्वराज के खराब स्वास्थ्य को देखते हुए एक अदद फायरब्रांड महिला नेता की जरूरत भाजपा को पड़ेगी.

इतने भर से स्मृति मान जाएंगी?

First published: 24 May 2016, 17:47 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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