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मनरेगा आने के बाद ग्रामीणों के जीवन में आए 5 बड़े बदलाव

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • अपने अस्तित्व के 10 सालों के भीतर मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में 2,000 करोड़ दिनों का कार्य पैदा किया. 
  • इस योजना केे तहत 10 सालों में हुए सामाजिक परिवर्तनों के रिकॉर्ड को नकारा नहीं जा सकता और इसमें इस बदलाव को आगे ले जाने की भी अपार क्षमता है.

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम या मनरेगा कोई छोटा-मोटा कानून नहीं है. इसने 2009 में यूपीए सरकार को वापस सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. नरेंद्र मोदी सरकार को एक वर्ष के भीतर ही इस कानून की आलोचना वापस लेनी पड़ी और अब सरकार इसे "राष्ट्रीय गौरव" के रूप में स्वीकार कर रही है.

अपने अस्तित्व के 10 सालों के भीतर मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में 2,000 करोड़ दिनों का कार्य पैदा किया. भारत की आबादी का लगभग 70 फीसदी इन्हीं गांवों में निवास करता है और आमतौर पर यहां से लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं. इन ग्रामीण लोगों के जीवन यापन का सबसे बड़ा आधार वर्षा से सिंचित खेती है जिसमें मुनाफा कम होता जा रहा है. 

इस वित्त वर्ष में लगभग 25,000 करोड़ रुपये का मजदूरी के रूप में भुगतान किया गया है

मनरेगा की वेबसाइट के मुताबिक आज देश भर के तमाम कार्यक्षेत्रों में करीब एक करोड़ श्रमिकों की उपस्थिति होती है. 

यह सच है कि इस संख्या को और ज्यादा होना चाहिए था और इन सभी श्रमिकों को आधिकारिक सीमा यानी 15 दिनों में भुगतान किया जाना चाहिए. यह योजना यूपीए-दो सरकार के बाद से ही धन की कमी के चलते कमजोर होती गई है. विशेषकर सूखा प्रभावित क्षेत्रों में इसने उम्मीद के अनुरूप काम नहीं किया. इसके साथ भ्रष्टाचार ने भी इस योजना को पटरी से उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

लेकिन इस रोजगार योजना केे कारण 10 सालों में हुए सामाजिक परिवर्तनों को नकारा नहीं जा सकता और इसमें इस बदलाव को आगे ले जाने की अपार क्षमता है. 

यहां हम ऐसे पांच बदलावों का जिक्र करने जा रहे हैं जिसने ग्रामीणों के जीवन को बेहतर कियाः

लिंग

यह संभवत: इस योजना की सबसे बड़ी उपलब्धि है. शुरुआत से ही मनरेगा कर्मचारियों की संख्या में एक बड़ा हिस्सा महिलाओं का रहा है. चालू वित्त वर्ष 2015-16 में भी इसके कुल श्रमिकों में 51.60 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं की है. यह योजना लागू होने के बाद से अब तक की सर्वाधिक संख्या है. 

मजदूर किसान शक्ति संगठन के निखिल डे कहते हैं, "यह योजना महिलाओं के लिए काफी संवेदनशील रही है. वास्तव में यह महिलाओं की योजना की तरह ही है." कुछ साल पहले इसके नियमों में परिवर्तन कर भुगतान की रकम संयुक्त परिवार के खातों की बजाय श्रमिकों के खातों में भेजने की अनुमति देने से काफी बदलाव आया है.

डे कहते हैं, "इस योजना ने श्रमिकों के रूप में उन्हें मान्यता दे दी और उन्हें बैंक खातों के साथ परचेसिंग पावर भी दी. इसने ग्रामीणों को गांवों में ही रहने और पलायन नहीं करने के लिए प्रोत्साहित किया है."

खाद्य सुरक्षा

मनरेगा ने दो तरह से खाद्य सुरक्षा की स्थिति को सुधारने में मदद की है. सबसे पहले बांध के निर्माण, जांच और कुओं की खुदाई जैसे सिंचाई में सहूलियत पहुंचाने वाले मनरेगा के कार्यों से खाद्य उत्पादन में सुधार हुआ.

राइट टू फूड कैंपेन के सचिन जैन कहते हैं, "उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश में अन्य सिंचाई और स्थानीय जल निकायों के अलावा 15 लाख खुले कुएं बनाए गए. इसने विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए खाद्य उत्पादन में सुधार लाने में महत्वपूर्ण योगदान किया." जैन कहते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में इसके योगदान को नकारा नहीं जा सकता है. 

इस योजना का दूसरा महत्वपूर्ण योगदान यह रहा कि गरीबों और श्रमिकों को इसने पौष्टिक और भरपेट भोजन खरीदने की क्षमता प्रदान की. दिसंबर 2013 में प्रकाशित मनरेगा के एक अध्ययन में पाया गया कि इस रोजगार योजना ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान और पश्चिम बंगाल समेत आठ राज्यों में घरेलू खपत को बढ़ा दिया था. 

वंचित समूह

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों की हिस्सेदारी भी बढ़ गई. इस साल कुल श्रमिकों की 40 फीसदी संख्या इन समूहों से थी. अनुसूचित जाति से 22.80 और अनुसूचित जनजाति से 18.50 फीसदी श्रमिकों को इसमें काम मिला. इस योजना में इन समूहों के लिए विशेष पंजीकरण अभियान चलाया गया. 

नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च द्वारा हाल ही में किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि इन वंचित समूहों के सदस्यों को योजना से जोड़ने में चुनौतियों का सामना करना पड़ा. जबकि इस समूह के लोग मनरेगा में प्रमुख रूप से शामिल थे और अन्य की तुलना में इन समूहों के लोगों में गरीबी भी काफी कम हुई.

सर्वेक्षण में पता चला कि मनरेगा के चलते दलितों में 37 फीसदी जबकि आदिवासियों के बीच में 27 फीसदी गरीबी कम करने में मदद मिली. 

ग्रामीण बुनियादी ढांचा

मनरेगा ने बांधों, कुओं, सड़कों के रूप में ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. गरीब और सीमांत किसानों की भूमि पर काम करने की अनुमति के नए नियम सेे भी जरूरी बुनियादी ढांचे के निर्माण में मदद मिली. जिसने इस योजना के "पहले गड्ढा खोदो और फिर उसे भरो" का मिथक तोड़ा है.  

सरकारी आंकड़ों के अनुसार मनरेगा के तहत हुए कार्यों का करीब 50 फीसदी हिस्सा जल संरक्षण ढांचों के निर्माण के लिए जबकि सड़कों और भूमि विकास के कार्यों के लिए 15-15 फीसदी का हिस्सा है.

वास्तव में मनरेगा के तहत निर्मित बुनियादी ढांचे की उपयोगिता के बारे में महाराष्ट्र में कराए गए एक सर्वेक्षण में 90 फीसदी उत्तरदाताओं ने इसे "बहुत उपयोगी" या "कुछ हद तक उपयोगी" बताया. जबकि सिर्फ 8 फीसदी उत्तरदाताओं ने ही उन्हें बेकार पाया.

ग्रामीण अर्थव्यवस्था

उत्पादक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर जोर देने के अलावा मनरेगा ने इन क्षेत्रों में क्रय शक्ति में सुधार के द्वारा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया है. इस वित्त वर्ष में लगभग 25,000 करोड़ रुपये का मजदूरी के रूप में भुगतान किया गया है. कई अनुमानों के अनुसार मनरेगा से दी जाने वाली मजदूरी का ग्रामीण परिवार की औसत आय में एक तिहाई योगदान है. इसे खपत, स्वास्थ्य और संपत्ति की खरीद पर खर्च किया जाता है. 

वास्तव में सरकार की वस्त्र समिति द्वारा एक अध्ययन ने पाया कि मनरेगा लाभार्थियों द्वारा गैर लाभार्थियों की तुलना में वस्त्रों पर अधिक खर्च किया जाता है. उनकी खरीदारी औसतन 5 फीसदी प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है.

First published: 2 February 2016, 4:24 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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