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नोटबंदी से निकली नसबंदी की राह: पश्चिम से लेकर पूरब तक नसबंदी की बाढ़

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 November 2016, 9:34 IST

भारत में नसबंदी परिवार नियोजन का कारगर जरिया बना हो या नहीं लेकिन यह कारगर राजनीतिक औजार जरूर रहा है. देश में आपातकाल के दिनों में नसबंदी शब्द किसी खलनायक की तरह हर जुबान पर चढ़ गया था. आज चालीस साल बाद नसबंदी एक बार फिर से नोटबंदी के रास्‍ते लोगों के जेहन में उतर रहा है. उत्‍तर प्रदेश के गोरखपुर में मोदी सरकार द्वारा नोटबंदी के फैसले के बाद नसबंदी की बढ़ आ गई है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश की खबरों को समर्पित दिल्ली से निकलने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका पूर्वा पोस्ट ने एक वीडियो जारी कर गोरखपुर में नोटंबदी के चलते बढ़ रही नसबंदी के मामले को सामने रखा है. खबर और वीडियो के मुताबिक पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के गोरखपुर में 8 नवंबर को घोषित नोटबंदी के बाद बेरोज़गार हुए दिहाड़ी मज़दूर पेट भरने के लिए तेजी से नसबंदी करवा रहे हैं.

ख़बर में एक निजी क्‍लीनिक के हवाले से कहा गया है कि जिन मजदूरों को पहले राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन के तहत नसबंदी करवाने के लिए राज़ी करने में काफी मशक्‍कत करनी पड़ती थी वे 8 नवंबर के बाद से खुद ही इसके लिए निजी क्‍लीनिकों में चलकर आ रहे हैं. सरकारी योजना के तहत उत्तर प्रदेश में सरकारी अस्पतालों में नसबंदी करवाने के बदले व्‍यक्ति को 2000 और निजी प्रतिष्‍ठान में 1000 रुपये दिए जाने का प्रावधान है. कुछ गरीब मजदूर इस मानदेय के लालच में नसबंदी की ओर उन्मुख हुए हैं.

मज़दूरों को आसानी से मिलने वाला हजार दो हजार रुपया अपनी ओर खींच रहा है. ख़बर है कि गोरखपुर में 8 नवंबर के बाद 38 दिहाड़ी मजदूरों ने नसबंदी करवाई है. वहां के एक निजी क्‍लीनिक के टीम लीडर के हवाले से बताया गया है कि नोटबंदी के फैसले के बाद उनके यहां नसबंदी के लिए आने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई है. खाली बैठे मजदूरों के पास फिलहाल आय का कोई साधन शेष नहीं बचा है. लिहाजा नसबंदी उनके लिए मजबूरी में इजी मनी बनाने का जरिया बन गई है.

अगर 20 दिनों के भीतर करीब 38 मजदूरों ने एक क्‍लीनिक में नसबंदी कराई है तो एक आकलन यह भी है कि गोरखपुर जिले के बाकी सरकारी और गैर सरकारी चिकित्‍सा केंद्रों को मिलाकर यह संख्या कितनी बड़ी हो सकती है.

पूरब से पश्चिम तक एक ही कहानी

ऐसा लगता है कि इस तरह की घटनाएं पूरे देश में हो रही हैं. अलीगढ़ में रहने वाले पूरन शर्मा की कहानी बीते दो दिनों से चर्चा के केंद्र में है. नकदी के अभाव में मजबूरन पूरन ने अपनी नसबंदी करा ली. पूरन की पत्नी विकलांग हैं, इसीलिए वह ऐसा नहीं करवा सकती थी. पूरन ने मीडिया के सामने स्वीकार किया है कि नसबंदी के बदले में मिलने वाले 2,000 रुपए के लिए उन्होंने यह फैसला लिया न की किसी जागरुकता अभियान के कारण.

नसबंदी कराने वाले पुरुष को 2,000 रुपये और महिलाओं को 1,400 रुपये देने का सरकारी नियम है. पूरन के मुताबिक उसके पास खाने के लिए एक भी पैसा नहीं था.

नसबंदी कराने वाले पुरुष को 2,000 रुपये और महिलाओं को 1,400 रुपये देने का सरकारी नियम है

पूरन अकेले शख्स नहीं हैं. इस तरह की कुछ मीडिया रिपोर्टें आई हैं जिनमें अलीगढ़ और आगरा जिलों में नवंबर महीने में नसबंदी करवाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ने का जिक्र है. माना जा रहा है कि 8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा होने के बाद नसबंदी के मामलों में इतनी तेजी आई है. यानी पूरब से लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक नोटबंदी से बचाव का जरिया लोग नसबंदी में ढूंढ़ रहे हैं.

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक अलीगढ़ में पिछले महीनों के मुकाबले नवंबर में दोगुनी संख्या में लोगों ने नसबंदी करवाई. पिछले साल नवंबर में जहां कुल 92 लोगों ने नसबंदी कराई थी, वहीं इस नवंबर में अबतक 176 लोग नसबंदी करवा चुके हैं. यह महीना खत्म होने में अभी भी कुछ दिन बाकी है. कुछ इसी तरह के आंकड़े आगरा से भी मिले हैं. वहां पिछले साल नवंबर में जहां 450 लोगों ने नसबंदी करवाई थी, वहीं इस साल नवंबर में अब तक यहां 913 लोग नसबंदी करवा चुके हैं. इनमें महिला पुरुष दोनों शामिल हैं.

पूरन शर्मा का कहना है कि उन्हें एक आशा कर्मचारी से पता चला था कि नसबंदी कराने के बदले सरकार कुछ पैसे देती है. दिहाड़ी मजदूरी करने वाले पूरन अपने परिवार में वह अकेले कमाऊ सदस्य हैं. उनका कहना है कि पिछले 3 हफ्ते से उन्हें काम नहीं मिल रहा है.

आगरा के परिवार नियोजन विभाग के मुताबिक इस साल कुल 2,272 लोगों ने नसबंदी करवाई है, जिनमें से 913 मामले केवल नवंबर के हैं. उन्होंने यह भी बताया कि सर्दी के दौरान नसबंदी के मामलों में हल्की तेजी देखी जाती है क्योंकि लोग सोचते हैं कि ठंड में संक्रमण का खतरा कम हो जाता है.

केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट

नसबंदी के बारे में केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य एवं परिवार कल्‍याण मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट क्या कहती है. रिपोर्ट के एनेक्‍सचर-2 में परिवार नियोजन के 2014-15 के पूरे देश के आंकड़े दिए हुए हैं. इसमें उत्‍तर प्रदेश में एक साल में 9798 पुरुषों की नसबंदी का आंकड़ा दिया हुआ है. स्थिति की भयावहता को सामान्‍य गणित से समझा जा सकता है. अगर इसे राज्‍य के 75 जिलों में बांट दिया जाए तो इससे यह निकलता है कि राज्‍य के एक जिले में औसतन 131 नसबंदी के ऑपरेशन साल भर में किए गए. एक दिन का आंकड़ा निकालने के लिए इस संख्‍या को 365 से भाग दे दिया जाए तो यह समझ में आता है कि एक जिले में 2015-16 के दौरान तीन दिनों में एक नसबंदी का ऑपरेशन हुआ यानी एक दिन में करीब 0.35.

आठ नवंबर को लागू नोटबंदी के बाद बीते 20 दिनों में एक जिले से नसबंदी का अगर 38 मामला आ रहा है यानी एक दिन में दो केस, तो 2014-15 के राज्‍यवार नसबंदी के सरकारी अनुपात से यह छह गुना ज्‍यादा है. इसी तरह के भयावह आंकड़े अलीगढ़ और आगरा जिलों के भी.

विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री इसे देशसेवा का सबसे सुनहरा अवसर बताकर लोगों से महायज्ञ में आहूति देने की अपील कर रहे हैं और जो लोग नसबंदी के रूप में अपनी आहूति दे रहे हैं वो कहीं खबर ही नहीं हैं. इंदिरा गांधी से लेकर नरेंद्र मोदी तक इस देश में नसबंदी की यही त्रासदी है.

First published: 29 November 2016, 9:34 IST
 
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