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राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षाः भटके हुए रास्तों की मंजिल

श्रिया मोहन | Updated on: 20 June 2016, 8:17 IST

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 में लागू किया गया था. इस नियम का पालन किस प्रकार किया जा रहा है, यह जानने के लिए अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज़ और रितिका खेड़ा ने जून माह के पहले दस दिन भारत के छह गरीब राज्यों बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदे, उड़ीसा तथा पश्चिम बंगाल में एक सर्वे किया.

सर्वेकर्ता छात्र इन छह राज्यों में प्रत्येक दो जिलों में फौरी तौर पर चुने गए गांवों में घर-घर गए और ग्रामीण परिवारों से रान कार्ड तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली से खरीद संबंधी दस्तावेजों के बारे में पूछताछ की. झारखंड के गुमला जिले में कैच टीम द्रेज़ और खेड़ा से मिली. उस वक्त यह लोग जन सुनवाई की तैयारी कर रहे थे.

उन्होंने बताया कि एनएफएसए अधिनियम ने कैसे खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया है. झारखंड और बिहार इस मामले में कैसे पीछे रह गए और भारत को छत्तीसगढ़ और उड़ीसा से क्या सबक लेने की जरूरत है.

बातचीत से निकले महत्वपूर्ण निष्कर्ष:

आपने बहुत ही जरूरी और अच्छा सर्वे किया है. आपके सर्वेक्षण में कौन सी बातें मुख्य रूप से सामने आईं?

द्रेज़: सर्वे में दे भर के विश्वविद्यालयों के वालियर छात्रों ने अपनी सेवाएं दीं. हमने छह राज्यों के छह गांवों को चुना. छात्रों ने ग्रामीण परिवारों से पूछा क्या उनके पास रान कार्ड है. उन्हें उचित मूल्य की दुकान पर क्या मिलता है? उस अनाज की गुणवत्ता कैसी होती है आदि.

खेड़ाः कहानी बहुत लंबी है, इसे थोड़ा छोटा करते हुए बताती हूं. एक बड़ी बात जो सामने आई, वह यह कि इनमें से चार राज्यों छत्तीसगढ़, मध्य प्रदे, उड़ीसा र पश्चिम बंगाल में खाद्य वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने की दिशा में काफी प्रगति हुई है और लगता है यहां खाद्य सुरक्षा में इस अधिनियम का महत्वपूर्ण योगदान है. हालांकि अब भी कुछ छोटी-मोटी खामियां हैं लेकिन लगता है कि पूरा तंत्र अपेक्षाकृत अधिक कुलता से कार्य कर रहा है. ज्यादा से ज्यादा ग्रामीणों को इसका फायदा मिल रहा है, जैसी उम्मीद थी.

बिहार और झारखंड में हालात ऐसे नहीं हैं. बीते दस सालों की तुलना में यहां काफी सुधार देखा गया है लेकिन दूसरे राज्यों के समान लक्ष्य हासिल करने में यहां अभी वक्त लगेगा.

चूंकि झारखंड को सूखा प्रभावित प्रदे घोषित किया गया है. क्या एनएफएसए यहां प्रभावित लोगों को मूलभूत खाद्य सुरक्षा प्रदान कर सका है?

खेड़ाः निश्चित तौर पर, ऐसा लगता है कि एनएसएफए की वजह से यहां लोग भूखों नहीं मरे. पहले जब भी सूखा पड़ा, आप ने भुखमरी से झारखंड, मध्य प्रदे और उड़ीसा में हुई मौतों की खबरें सुनी होंगी. परन्तु अभी जब सूखे के गंभीर हालात हैं, उसमें केवल उत्तर प्रदे के बुंदेलखंड से भूख से मौतों की खबरें आई हैं. वह भी इसलिए कि वहां अभी एनएफएसए पूरी तरह लागू नहीं हुआ है. इसलिए मैं कह सकती हूं कि हमारे सामने ऐसे साक्ष्य हैं जिनसे लगता है कि एनएफएसए भुखमरी और भूख से लड़ने की दिशा में सहायक सिद्ध हुआ है.

सर्वे के मुताबिक इन छह राज्यों में से झारखंड और बिहार में हालात सबसे अधिक चिंताजनक हैं; ऐसा क्यों?

द्रेजः एक तो वास्तव में जरूरतमंद परिवारों को चिन्हित करना मुश्किल है क्योंकि यह वर्ष 2011 की सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना पर आधारित है, जिसमें काफी खामियां हैं और यह विश्वसनीय भी नहीं है. इसलिए अब भी कई लोग खाद्य सुरक्षा के दायरे से अछूते हैं जबकि नियमानुसार कम से कम 85 फीसदी लोगों को तो इसका लाभ मिलना ही चाहिए. जिनके पास रान कार्ड है, उसमें भी पाया गया कि औसतन एक सदस्य तो गायब ही है. यानी काफी लोगों को इसमें शामिल किया जाना बाकी है, लेकिन किया नहीं जा रहा.

यानी पहली समस्या चिन्हित करने की है, दूसरी भ्रष्टाचार की, यद्यपि समय के साथ इसमें अपेक्षाकृत कमी आई है. दस साल पहले ऐसा होता था कि रान का नब्बे फीसदी अनाज चोरबाजारी में चला जाता था. अब ऐसा नहीं है. लेकिन लोगों को उनके हक से कम मिल रहा है और उन्हें वाजिब से अधिक कीमत देनी पड़ रही है. बिहार में आपूर्ति चेन प्रबंधन आज भी लोगों की परेशानी का सबब बना हुआ है. उन्हें अब भी कई महीनों में एक बार ही रान मिल रहा है.

खेड़ाः बिहार में सार्वजनिक वितरण प्रणाली सबसे खराब हुआ करती थी. 2000 के दक में लीकेज दर करीब 90 प्रतित थी. हालांकि 2010-11 में कुछ बदलाव आने लगे. 2013 तक लीकेज पर 30 प्रतित तक काबू पाया जा चुका है. इस सर्वे से उम्मीद जगी है कि बिहार प्रगति के पथ पर है. परन्तु लग रहा है कि सत्ता में आने के बाद सरकार ने आंखें मूंद ली हैं.

एनएफएसए की वजह से 64 से 83 प्रतित की भरपाई हुई है. इससे वास्तव में आपूर्ति बढ़ाने और त्रुटियों से पार पाने में सहायता मिली है. जब दायरा बढ़ा तो उन्हें इसकी समुचित व्यवस्था करनी पड़ी. वे समयबद्ध रूप में ग्रामीण इलाकों में अनाज की आपूर्ति करने में सक्षम नहीं थे. उदाहरण के लिए जब हम गया में लोगों से बात कर रहे थे तो उन्होंने बताया कि खाद्यान्न आपूर्ति तो कई सप्ताह से आ रही है लेकिन डीलर जनता के समक्ष इससे इनकार करते आ रहे हैं. इसलिए जब तक आप एक स्पष्ट समयबद्ध रूपरेखा नहीं बना लेते और इसका पालन नहीं करते, आप लोगों को धोखाधड़ी करने से नहीं रोक पाएंगे.

क्या हम छत्तीसगढ़ से कोई सबक ले सकते है?

खेड़ाः हां. न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि उड़ीसा से भी. दिसंबर में यह कानून लागू होने के बाद से उड़ीसा जैसे राज्य में भी एक निर्धारित कार्यक्रम की पालना की जा रही है. भ्रष्टाचार रोकने की दिशा में यह पहला महत्वपूर्ण और सरल उपाय है.

द्रेजः कोई भी राज्य अगर चाहे तो अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली सुधार सकता है. छत्तीसगढ़ में हालात खराब तो नहीं लेकिन बुरे जरूर हैं. दस साल पहले हर्ष मंर छत्तीसगढ़ में जिला कलेक्टर थे और उन्होंने कहा था कि यहां हालात कभी नहीं सुधरेंगे. हालात तभी सुधर सकते हैं जब उच्च स्तर पर कोई राजनीतिक निर्णय लिया जाए.

एक बात इन राज्यों में समान रूप से दिखाई देती है, विधानसभा चुनावों के दिनों में राजनेता इस मुद्दे पर ज्यादा ध्यान देते हैं, जो कि अभी छत्तीसगढ़ में काफी समय बाद होंगे. इस साल पश्चिम बंगाल में ऐसा हुआ. उम्मीद है अगले वर्ष उत्तर प्रदे में ऐसा होगा. बिहार में चुनाव के बाद खालीपन सा आ गया है.

कुछ मूलभूत सुधार होने अभी बाकी हैं. ज्यादातर रान की दुकानों में सूचनापट्ट तक नहीं हैं. आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि लोग अपने अधिकारों की रक्षा स्वयं कर लेंगे जबकि लोगों को अपने अधिकारों के बारे में पता ही नहीं है.

खेड़ाः बिहार को छोड़ कर सभी राज्यों के चिन्हित परिवारों की सूची एमआईएस पर उपलब्ध है. बिहार एनएफएसए लागू करने में अग्रणी राज्यों मे से एक था और आज तक यह सार्वजनिक तौर पर इसे लागू करने में नाकाम रहेराज्य इसके लिए आवश्यक योग्यता निर्धारित करने के लिए बीपीएल सूची से लेकर स्व घोषणा तक अलग-अलग तरीके अपनाते हैं.

क्या सामाजिक,आर्थिक और जातिगत जनगणना के आधार पर खाद्य सुरक्षा निर्धारण सर्वाधिक उपयुक्त तरीका है?

द्रेज: मेरा मानना है कि एसईसीसी अपनाते हुए सरल निष्कासन प्रक्रिया पहला अच्छा कदम है. बेक उसके बाद आपको दूसरा कदम भी उठाना है, जो उन लोगों को अपील करने का मौका देगा, जो सूची में शामिल होने से छूट गए थे. उड़ीसा में लोग स्व घोषणा का तरीका अपनाते हैं. परन्तु बिहार में यह तरीका नहीं चला सकते. इसके लिए विश्वसनीय प्रशासनिक तंत्र का होना जरूरी है. बिहार में तो हरेक आदमी आकर दावा कर देगा कि वह खाद्य सुरक्षा पाने का हकदार है.

First published: 20 June 2016, 8:17 IST
 
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