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भूटिया के लिए मुश्किल साबित हो रहा है चुनावी मैच

प्रियता ब्रजबासी | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST
QUICK PILL
  • राजनीतिक टिप्पणीकार पार्थ प्रीतम बिश्वास कहते हैं कि अशोक भट्टाचार्य जैसे अनुभवी नेता के सामने भाइचुंग भूटिया \r\nको चुनाव लड़ाना गलत है.
  • वहीं नार्थ बंगाल यूनिवर्सिटी के छात्र श्याम रॉय मानते हैं कि सिलीगुड़ी को भूटिया जैसे विधायक की जरूरत है. रॉय कहते हैं कि भूटिया की जीत से सिलीगुड़ी खेल का भी बड़ा केंद्र बन सकता है.

फुटबॉल खिलाड़ी भाइचुंग भूटिया पश्चिम बंगाल की सिलीगुड़ी विधानसभा से चुनाव लड़ रहे हैं. राज्य में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने उन्हें सीपीएम के वरिष्ठ नेता अशोक भट्टाचार्य के खिलाफ उतारा है. भट्टाचार्य इस सीट से चार बार विधायक रह चुके हैं. फिलहाल वो सिलीगुड़ी के मेयर हैं.

सिक्किम मूल के भूटिया पश्चिम बंगाल में दूसरी बार चुनाव लड़ रहे हैं. 2014 के लोक सभा चुनाव में वो राज्य की दार्जिलिंग सीट से चुनाव लड़े थे. वो बीजेपी के एसएस अहलुवालिया से 196,795 वोटों से हार गए थे.

फुटबॉल प्रेमी बंगाल में भूटिया की लोकप्रियता पर शायद ही किसी को शक हो लेकिन इसका चुनावी गणित पर कितना असर पड़ेगा ये कहना मुश्किल है.

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सिलीगुड़ी में कैच से बातचीत में भूटिया ने कहा, "चूंकि मैं टीएमसी में हूं तो मैं पार्टी प्रमुख की बात सुनता हूं. पार्टी की नेता ही फैसला करती हैं कि कि कौन किस सीट से लड़ेगा. फुटबॉल में भी कोच ही तय करते थे कि मुझे कहां से खेलना है, या मैं खेलने के लिए फिट हूं भी या नहीं. दीदी चाहती थीं कि मैं सिलीगुड़ी से लडूं."

कई राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता के इस फैसले से इस सीट पर सीपीएम की जीत लगभग तय हो गयी है. राजनीतिक टिप्पणीकार पार्थ प्रीतम बिश्वास कहते हैं कि ममता का फैसला गलत है. बिश्वास कहते हैं, "अशोक भट्टाचार्य जैसे अनुभवी नेता के सामने भूटिया को नहीं लड़ना चाहिए था. उन्हें किसी नए प्रत्याशी के खिलाफ खड़ा होना चाहिए था."

भट्टाचार्य भी अपनी जीत को लेकर बहुत आश्वस्त हैं. सिलीगुड़ी में कैच से बातचीत में उन्होंने कहा, "भूटिया बहुत अच्छे फुटबॉलर है लेकिन वो अच्छे नेता नहीं हैं. वो सिलीगुड़ी और यहां के लोगों को जानते नहीं हैं, न ही वो उन्हें जानते हैं. अगर ये मुकाबला दो फुटबॉलरों के बीच होता तो वो जीत जाते. लेकिन ये राजनीतिक लड़ाई है और मुझे नहीं लगता कि उन्हें इसका कोई खास अनुभव है."

अशोक भट्टाचार्य का मानना है कि भूटिया बहुत अच्छे फुटबॉलर है लेकिन वो अच्छे नेता नहीं हैं

पिछले विधान सभा चुनाव में अशोक भट्टाचार्य टीएमसी के रुद्र नाथ भट्टाचार्य से हार गए थे. अशोक भट्टाचार्य कहते हैं, "उस समय टीएमसी की लहर थी. इसलिए मैं हार गया. लेकिन ममता का फासीवादी शासन और भ्रष्टाचार देखने के बाद लोगों को लेफ्ट बेहतर विकल्प लगेगा."

भूटिया की ताकत

नार्थ बंगाल यूनिवर्सिटी के छात्र श्याम रॉय मानते हैं कि सिलीगुड़ी को भूटिया जैसे विधायक की जरूरत है.

रॉय कहते हैं. "सिलीगुड़ी में राज्य और देश का प्रमुख कारोबारी शहर बनने की क्षमता है. ये खेल का भी बड़ा केंद्र बन सकता है. इसे नए और आधुनिक विचारों वाले नेता की जरूरत है. भूटिया ऐसा कर सकते हैं. उन्हें एक मौका मिलना चाहिए."

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चुनाव में भूटिया के सिक्किम का होने का मुद्दा भी उठ सकता है. इसपर भूटिया कहते हैं, "जब मैं 15 साल का था तब मैंने सिक्किम छोड़ दिया था. पिछले 25 सालों से मैं कोलकाता में रह रहा हूं. मैं यहां के क्लबों के खेलता हूं. यहां के लोग मुझे अपना चुके हैं. इसलिए जब ममता बनर्जी ने 2014 में मझे दार्जीलिंग से लोक सभा चुनाव लड़ने का मौका दिया तो मैंने उसे स्वीकार किया."

चुनाव में भूटिया के सिक्किम का होने का मुद्दा भी उठ सकता है

भूटिया कहते हैं कि उनका टीएमसी से जुड़ना महज संयोग है. वो कहते हैं, "मुझे हमेशा राजनीति पसंद थी. जब मैं खेलता था तब भी. जब ममता बनर्जी ने मुझसे संपर्क किया तो मैं हैरान रह गया लेकिन मैंने उस चुनौती के रूप में स्वीकार किया."

भूटिया कहते हैं कि अगर किसी और पार्टी ने उनसे संपर्क किया होता तो शायद वो उससे जुड़ गए होते.

गोरखालैंड सिलीगुड़ी विधानसभा सीट दार्जिलिंग जिले के अंतगर्त आती है. यहां पर गोरखालैंड के रूप में अलग राज्य की मांग उठती रही है. सिलीगुड़ी में 40 फीसदी आबादी गोरखाओं की है.

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भूटिया कहते हैं कि गोरखालैंड बनता है तो उन्हें खुशी होगी लेकिन ममता बनर्जी ने साफ कर दिया है कि वो राज्य का बंटवारा नहीं होने देंगी.

भूटिया कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि पहाड़ी इलाके के टीएमसी प्रत्याशी गोरखालैंड के खिलाफ हैं. उन्होंने इसके लिए कुर्बानियां दी हैं. लेकिन वो इस बात को समझ चुके हैं कि बंटवारे से ज्यादा जरूरी है इलाके का विकास."

भूटिया बीजेपी पर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लगाते हैं. वो कहते हैं, "लोग समझ चुके हैं कि बीजेपी ऐसा नहीं चाहती. दार्जिलिंग के बीजेपी सांसद इस मुद्द को संसद में उठाया तक नहीं जबकि वो गोरखालैंड के गठन की मांग करके ही चुनाव जीते थे."

पूर्व गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) नेता और मौजूदा विधायक हरख बहादुर छेत्री टीएमसी में शामिल हो चुके हैं. जिसकी वजह से जीजेएम सीपीएम के करीब जा रहा है. पिछले महीने अशोक भट्टाचार्य ने घोषणा की थी सीपीएम दार्जिलिंग, कालिमपोंग और कुर्सियांग विधानसभा से प्रत्याशी नहीं उतारेगी.

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कैच से बातचीत में भट्टाचार्य ने कहा, "हम जीजेएम को समर्थन नहीं दे रहे, न ही हम उनसे समर्थन ले रहे हैं. लेकिन दोनों का मुकाबला टीएमसी से है. हमारा पहाड़ी इलाके में जनाधार कमजोर है. हम नहीं चाहते कि पहाड़ी इलाके में टीएमसी विरोधी वोट बंटे."

सीपीएम द्वारा आधिकारिक समर्थन न दिए जाने के बावजूद पार्टी के नेता पहाड़ी इलाकों में वोटरों से जीजेएम को वोट देने की अपील कर रहे हैं. इससे पहाड़ी इलाकों में बीजेपी और सीपीएम एक ही पाले में नजर आ रहे हैं क्योंकि जीजेएम का बीजेपी का साथ गठबंधन है.

चुनावी समर कितना मुश्किल है ये पूछने पर भटिया कहते हैं, "क्या आपको लगता है कि फुटबॉल में मेरे लिए सफलता पाना आसान था? जिंदगी में कुछ भी आसानी से नहीं मिलता. ये सच है कि अशोक भट्टाचार्य चार बार विधायक रहे हैं. वो राज्य में मंत्री भी रहे हैं. इसलिए मुकाबला कड़ा होगा. लेकिन मैं पिछली बार से ज्यादा तैयार हूं. इसलिए मेरी संभावनाएं मजबूत हैं."

First published: 10 April 2016, 10:00 IST
 
प्रियता ब्रजबासी @priyatab

फोटो जर्नलिस्ट, कैच न्यूज

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