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गोवा सरकार ने भूमि अधिग्रहण के लिए बदला पुर्तगाली दौर का कानून

निहार गोखले | Updated on: 22 December 2016, 8:31 IST

भूमि अधिग्रहण के लिए ब्रिटिश काल में बने 1894 के कानूनों की जगह केन्द्र सरकार, भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम- 2013 लाई थी. यह कानून सालों तक चले विचार-विमर्श के बाद बनाया गया था. इस अधिनियम को सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत की जाने वाली निजी भूमि के संदर्भ में सरकार के निष्पक्ष प्रयास और उसकी जिम्मेदारी के रूप में देखा गया था.

इस कानून के जरिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित किसानों के हितों की रक्षा संबंधी प्रावधान और मजबूत बनाए गए थे, लेकिन नए कानूनों ने राज्यों के लिए भूमि अधिग्रण को असम्भव बना दिया या जैसा कि भाजपा की अगुवाई वाली गोवा सरकार दावा करती है. आईआईटी गोवा परिसर के लिए जरूरी जमीन के अधिग्रहण के लिए (सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत मिली जानकारी) जो कागजी कार्रवाई हुई है, वह कुछ इसी तरह की कहानी बयां करती है.

असल में ये नियम इतने कड़े हैं कि राज्य सरकार को जब आईआईटी परिसर के लिए परेशानी हुई तो उसने यूनिक और सदियों पुरानी भूमि प्रबंधन व्यवस्था को छोड़ने के साथ कानून को बाइपास करने का रास्ता तलाश लिया.

फरवरी 2016 में लक्ष्मीकांत पारसेकर की अगुवाई वाली भाजपा सरकार ने कम्युनिटी लैंड लॉ में मामूली संशोधन करने की ओर कदम बढ़ाए. इसे कोड ऑफ कम्युनिडेड्स यानी ग्राम संस्था संहिता का नाम दिया गया. यह संस्था गोवा में पुर्तगालियों के आने से पहले से अस्तित्व में थी. कम्युनिडेड्स एक पुर्तगाली शब्द है. इसका मकसद यह था कि आईआईटी परिसर के लिए दक्षिणी गोवा के गांव में 300 एकड़ चारागाह और कृषि भूमि अधिग्रहीत की जा सके.

ग्राम संस्था व्यवस्था गांवों की सामुदायिक भूमि, जिसमें चारागाह, कृषि भूमि, वेटलैंड, जंगल आदि शामिल है, की देखभाल और उस पर नियंत्रण के लिए प्रभावकारी और विशिष्ट व्यवस्था थी. कई सदियों से यह व्यवस्था चली आ रही है और इसे गोवा की विरासत के रूप में देखा जाता है. फाइलों में तो सरकार ने अपने संशोधन को यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की है कि वर्ष 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के चलते गोवा सरकार के लिए परियोजनाएं स्थापित करने के वास्ते भूमि को अधिग्रहण करना असंभव हो गया था.

वैसे तो ग्राम संस्था के संचालन के लिए नियमों में बहुत नाम मात्र का संशोधन किया गया है, पर विशेषज्ञों का कहना है कि ये संशोधन ऐसे समय में किए गए हैं जब ग्रामसंस्था की भूमि पहले से ही अतिक्रमण और अधोगति की शिकार है.

भूमि अधिग्रहण विलाप

एनडीए सरकार ने सत्ता में आने के सिर्फ तीन माह बाद ही 2014 में गोवा में आईआईटी का प्रस्ताव पास किया था. यह संशोधन आईआईटी के लिए भूमि हासिल करने के लिए हो रही परेशानियों से जुड़ा हुआ है. प्रक्रिया के तहत राज्य सरकार को भूमि का चयन करना था, आईआईटी को चयन की गई भूमि पसन्द आनी थी और यह भूमि आईआईटी को सौंप दी जानी थी.

पहली भूमि उत्तरी गोवा के धारगलिम में देखी गई. यह दिसम्बर 2014 की बात है. इस भूमि को लेकर बात नहीं बन सकी. वजह यह रही इस भूमि से सटी लगभग 200 एकड़ भूमि निजी खातेधारी की थी और राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर थी. फरवरी 2015 में आईआईटी साइट सिलेक्शन कमेटी ने अपनी राय दी कि यह भूमि उसके लिए उपयुक्त है बशर्ते यह 200 एकड़ भूमि भी मिल जाए तो और बेहतर होगा.

इसके बाद परियोजना में रुकावट आ गई. यह साइट पेरनेम में थी. यह साइट उस चुनावी क्षेत्र का हिस्सा हैं जिस पर 2007 से ही भाजपा काबिज रही है. वर्तमान में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व मंत्री राजेन्द्र अरलेकर कर रहे हैं. यह क्षेत्र मुख्यमंत्री के चुनावी क्षेत्र मंद्रेम से सटा हुआ है.

फाइलों से पता चलता है कि आईआईटी की यह सलाह कि निजी भूमि का अधिग्रहण कर लिया जाए, राज्य सरकार कई माह तक पूरी तरह चुप्पी साधे रही. मानव संसाधन मंत्रालय को भी इस बारे में मालुम था और उसे औपचारिक रूप से बता भी दिया था. तत्कालीन एचआरडी मंत्री स्मृति ईरानी ने इस संदर्भ में अप्रैल और जून में पारसेकर को पत्र भी लिखे थे, पर वे पत्र अनुत्तरित ही रहे.

अगस्त में पारसेकर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई जिसमें धारगलिम के स्थान पर नई भूमि तलाशे जाने का निर्णय लिया गया.

पारसेकर की अध्यक्षता में एक अन्य बैठक नवम्बर 2015 में हुई थी जिसमें दक्षिणी गोवा के लोलियम नामक स्थान की 300 एकड़ भूमि को उपयुक्त पाया गया था. राज्य कैबिनेट ने दिसम्बर में इसे स्वीकृति भी दे दी थी. तब से एक साल से ज्यादा हो गया है. इसका उद्घाटन 2015-16 में करने की योजना थी.

ग्राम संस्था की जमीन पर नजर

लोलियम गांव में जिस जमीन का चयन किया गया था, वह निजी खातेधारी की नहीं बल्कि ग्राम संस्था की थी. गोवा में, गांवों की सामुदायिक भूमि-कृषि, चारागाह, वेटलैंड ग्रामसंस्था की होती है और ग्राम संस्थाएं ही इसकी देखभाल करती है. यह स्वायत्तशासी संस्था होती है जिसके सदस्य पूर्वजों के समय से रहने वाले अधिवासियों के वंशज होते हैं.

सदियों से यहां भूमि की अपनी व्यवस्था रही है, जिसे गांवकरी व्यवस्था कहते हैं. इस व्यवस्था को पुर्तगालियों ने सूचीबद्ध किया. गोवा में पुर्तगालियों का शासन 16वीं सदी से लेकर 1961 तक रहा. बाद में यह भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया. यहां के भूमि नियमों को कोड ऑफ कम्युनिडेड्स के नाम से जाता है. इसका सबसे नया वर्जन 1961 में गोवा मुक्ति के कुछ ही दिन पहले ही दिया गया था.

2016-17 में आईआईटी के सत्र को शुरू करने के लिए सरकार ने इस संहिता को संशोधित करने का निश्चय किया. इसकी वजह यह थी कि कोड में कोई प्रावधान ही नहीं था कि राज्य सरकार इतने बड़े आकार की भूमि अधिग्रहीत कर सकती. इस कोड में संशोधन के लिए आधिकारिक नोट बहुत कुछ कह जाता है:

विकास के लिए

5 फरवरी, 2016 को इस नोट को राजस्व विभाग ने यह कहते हुए आगे बढ़ाया कि भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास और पुनर्स्थापना अधिनियम- 2013, 01/01/2014 से अस्तित्व में आ गया है.

इसमें आगे कहा गया है कि नया भूमि अधिग्रहण अधिनियम आने के बाद से गोवा में अधिग्रहण प्रक्रिया में अवरोध आ गया है. नए अधिनियम के तहत एक जनवरी 2014 से आज की तारीख तक एक भी भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सका है.

यह भी कहा गया कि परियोजनाओं के लिए उपयुक्त भूमि की अनुपलब्धता के कारण सरकार की कई परियोजनाएं लेट हो गई हैं अथवा उन्हें बंद कर देना पड़ा है.

यह भी कहा गया कि संशोधन का उद्देश्य सरकार को इतना समर्थ बनाना है कि वह खुद के द्वारा, केन्द्र सरकार के स्तर की उच्चतर शिक्षण संस्थान बना सके.

बाद में यह संशोधन गोवा विधानसभा में मार्च 2016 में पारित कर दिया गया. एक माह बाद राज्यपाल ने इसे अपनी मंजूरी भी दे दी.

समुदाय की भूमि को खतरा

गोवा जैसे छोटे राज्य में बड़ी परियोजनाओं के लिए पहले से ही कमी है. हाल में भूमि अधिग्रहण में संषर्ष के कारण कई बड़ी परियोजनाएं खत्म कर दी गईं हैं. आईआईटी और मोपा में बनने वाला राज्य का दूसरा हवाईअड्डा भी सवालों के घेरे में है.

ग्रामसंस्था नियमों में संशोधन को समुदाय की भूमि को हड़पने की कार्रवाई के तौर पर देखा जा रहा है. कुछ लोगों का कहना है कि यह गोवा के भौगोलिक आकार का आधे से ज्यादा हिस्सा है.

1985 में ग्राम संस्था के नियमों में आखिरी बार संशोधन किया गया था जब सरकार ने चैरिटेबिल संस्थाओं, लघु आकार के उद्योगों के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों के लिए घर और भूमिहीनों के लिए आवासीय योजनाएं चलाने की अनुमति दी थी. पहले इन उद्देश्यों के लिए दी जाने वाली भूमि सीमित थी, बाद में इसे 400 वर्ग मीटर कर दिया गया. वर्तमान के संशोधन में इसकी कोई सीमा नहीं है.

हालांकि, भाजपा सरकार के संशोधन में यह है कि भूमि केवल ग्राम संस्था की अनुमति से ही ली जा सकती है, पर इसमें कई अन्य तथ्यों का उल्लेख नहीं हैं. जैसे कि आईआईटी के मामले को लें. ग्राम संस्था ने जनरल बॉडी की बैठक में मौजूद 98 सदस्यों की सहमति से भूमि लेने की अनुमति तो दे दी, पर इस परिसर का अन्य ग्रामीणों ने विरोध किया है. दो गांव सभा के लगभग 500 लोगों ने इसके विरोध में वोट किया है.

ग्राम संस्था जब इसकी अनुमति दे रही थी, तब अधिकांश ग्रामीणों को भी इस बारे में नहीं मालुम था. कुछ लोगों को बाद में पता चला.

लोलियम ग्राम संस्था द्वारा दी गई सहमति पर अपनी टिप्पणी में आईआईटी के प्रो. सी रोपेसो कहते हैं कि लोगों को अच्छी क्षतिपूर्ति राशि मिल रही है. ग्राम संस्था फाइनल अथॉरिटी है जो भूमि दे सकती है. उधर, एक सामाजिक कार्यकर्ता अन्द्रे पेरेरिया कहते हैं कि ग्राम संस्था द्वारा दी गई अनुमति अवैध है. ग्राम संस्था संहिता को भी सरकार द्वारा संशोधित नहीं किया जा सकता है. इसे कोर्ट में चुनौती दी जाएगी.

First published: 22 December 2016, 8:31 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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