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एफॉरेस्टेशन बिल 2015 में बदलाव चाहती है कांग्रेस

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
QUICK PILL
  • पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड बिल 2015 के प्रावधानों को संशोधित किए जाने का प्रस्ताव दिया है.
  • रमेश ने इसके लिए सीपीएम, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तृणमूल कांग्रेस और जेडीयू से समर्थन मांगा है. 245 सदस्यों वाले लोकसभा में इन दलों के 108 सांसद हैं.

लोकसभा में 3 मई को पास किए गए अहम विधेयक में कांग्रेस महत्वपूर्ण बदलाव करना चाहती है. पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने कंपनसेटरी एफॉरेस्टेशन फंड बिल 2015 में बदलाव का प्रस्ताव रखा था. रमेश ने 10 मई को इस बदलाव के प्रस्ताव को राज्यसभा को सौंप दिया था.

क्या होंगे बदलाव?

जब किसी इंडस्ट्री को जंगल की जमीन दी जाती है तो उस इंडस्ट्री को जंगल की मौद्रिक कीमत के बराबर रकम का भुगतान करना पड़ता है. इसके साथ ही उन्हें उतनी ही संख्या में पेड़ों को लगाने की लागत की भी भरपाई करनी होती है. यह लागत मुआवजे के तौर पर गिनी जाती है. यह फॉरेस्ट एक्ट 1980 में शामिल है.

अभी तक इस मामले में सरकार के पास 42,000 करोड़ रुपये की रकम जमा हो चुकी है लेकिन किसी कानूनी मशीनरी का अभाव होने की वजह से इस रकम का इस्तेमाल नहीं हो पाया है. नए बिल में इसी फंड के इस्तेमाल की रणनीति बनाई गई थी.

संशोधन इसलिए पेश किया गया था ताकि इस तरह की परियोजनाओं में आदिवासियों और जंगल में रह रहे अन्य समुदाय के लोगों को उनका पक्ष रखने का मौका मिले. इसमें दो प्रावधान को बतौर अनिवार्य प्रावधान शामिल किए जाने की बात कही गई है.

  • वन लगाने की किसी भी परियोजना के 5 किलोमीटर के भीतर आने वाले सभी ग्राम सभाओं से लिखित में सहमति ली जाए. ग्राम सभाओं में 50 फीसदी कोरम का होना अनिवार्य है. सहमति में यह लिखा होना चाहिए कि वन अधिकार नियम 2006 के सभी नियमों को लागू कर दिया गया है.
  • अगर वनों को लगाने की परियोजना के दौरान वन अधिकार कानून 2015 का इस्तेमााल किया जा चुका है तो इसके लिए ग्राम सभा की मंजूरी जरूरी होगी. ग्राम सभा को पेड़ों के चयन तक का अधिकार होगा.

रमेश ने पुष्टि करते हुए कहा कि उन्होंने संशोधन प्रस्ताव सौंप दिया है. कैच से बातचीत में उन्होंने कहा, 'मैंने संशोधन प्रस्ताव सौंप दिया है. बिल केे पेश किए जाने के बाद इस प्रस्ताव को सांसदों को दे दिया जाएगा.'

रमेश ने बिल के समर्थन के लिए सीपीएम, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तृणमूल कांग्रेस और जेडीयू से समर्थन मांगा है

रमेश ने कहा कि उन्होंने इस बिल के समर्थन के लिए सीपीएम, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति, तृणमूल कांग्रेस और जेडीयू से समर्थन मांगा है. 245 सदस्यों वाले लोकसभा में इन दलों के 108 सांसद हैं.

अगर राज्यसभा संशोधन को पारित कर देती है तो चर्चा के लिए इसे लोकसभा भेज दिया जाएगा. 

वन अधिकार के लिए काम करने वाली संस्था कैंपेन फॉर सर्वाइवल एंड डिग्निटी की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि वन विभाग प्राकृतिक भूभाग में लोगों के अधिकार को जाने बगैर बड़ी संख्य में पेड़ लगा सकता है. इस दौरान स्थानीय लोगों की सहमति नहीं ली जाती है. 

प्रस्तावित संशोधन इसलिए भी अहम है क्योंकि इसकी मदद से लोगों को अपने अधिकार को संरक्षित करने का एक और मंच मिलेगा.

पहले ऐसे बिल को यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान 2008 में लोकसभा में पेश किया गया था. हालांकि इसमें वनों में रहने वाले लोगों के अधिकार का जिक्र नहीं किया गया था. लेकिन संसद की स्थायी समिति के वापस लेेने के बाद यह बिल निष्प्रभावी हो गया.

एआईडीएमके के सांसद वी मैत्रेयन की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा था कि वन अधिनियम 1980 में ही बदलाव किया जाना चाहिए जिसमें अनिवार्य तौर पर मुआवजे की बात की गई है. बिल में ग्राम सभा को नजरअंदाज किए जाने का जिक्र करते हुए समिति ने ग्राम सभा को इस मामले में मुख्य निकाय बनाए जाने की सिफारिश की थी.

First published: 12 May 2016, 8:06 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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