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फारबिसगंज गोलीकांड: जदयू-भाजपा की तकरार में फंसा पीएमओ का अधिकारी!

निहारिका कुमारी | Updated on: 5 April 2016, 23:46 IST

बिहार में राजनैतिक तूफान लाने वाले फारबिसगंज गोलीकांड की जांच के लिए गठित जस्टिस माधवेंद्र कुमार की एक सदस्यीय जांच आयोग ने फारबिसगंज में हुई पुलिस फायरिंग को उचित ठहराया है. आयोग की रिपोर्ट एक नया राजनैतिक बवेला खड़ा कर सकती है. इस आयोग ने सीधे तौर पर भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के वरिष्ठ अधिकारी एम सरवनन को दोषी ठहराया है. फिलहाल 45 वर्षीय एम सरवनन पीएमओ में तैनात हैं.

बिहार सरकार ने सोमवार को विधानमंडल में बजट सत्र के आखिरी दिन आयोग की रिपोर्ट को दोनों सदनों में पेश किया. इस रिपोर्ट के साथ-साथ राज्य सरकार ने एक्शन टेकन रिपोर्ट को भी पेश किया, जिसके तहत सरवनन और एक थानेदार पर कार्रवाई की बात कही गई है.

तीन जून, 2011 को अररिया जिले के फारबिसगंज तहसील में पुलिस की फायरिंग में चार लोगों की जान चली गई थीं. मामला फारबिसगंज के एक गांव भजनपुर से गुजरने वाली पगडंडी का था. गांव के लोग इस पगडंडी के रास्ते में बन रही एक फैक्ट्री का विरोध कर रहे थे. यह फैक्ट्री के मालिकों में एक स्थानीय भाजपा नेता अशोक गुप्ता भी थे.

फारबिसगंज गोलीकांड में तत्कालीन डीएम सरवनन के खिलाफ कार्रवाई की मांग की गई है

पगडंडी इकलौता रास्ता थी जो गांव को पड़ोस से गुजरने वाली स्टेट हाइवे से जोड़ती थी. फैक्ट्री के निर्माण के बाद वह पगडंडी बंद हो गई थी, गांववालों का स्टेट हाइवे से संपर्क खत्म हो गया था. इसी के विरोध में गांववालों ने तीन जून, 2011 की दोपहर को फैक्ट्री के बाहर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था.

ग्रामीणों का प्रदर्शन हिंसक हो गया. मौके पर मौजूद अधिकारियों के मुताबिक हिंसक भीड़ को काबू करने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी जिसमें चार लोगों की जान चली गई. मरने वालों में एक गर्भवती महिला और एक 10 महीने का बच्चा भी था.

फारबिसगंज की घटना राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हुई क्योंकि इस घटना से जुड़ी कुछ तस्वीरें और वीडियो सामने आया था जिसमें पुलिस का एक जवान घटना में मारे गए लोगों की मृत देह पर चढ़ कर कूद रहा था.

सरवनन फिलहाल पीएमओ में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के निजी सचिव के रूप में तैनात हैं

इसके बाद नीतीश कुमार और उनकी सरकार की जबर्दस्त आलोचना हुई. जल्द ही इस घटना ने राजनीतिक मोड़ ले लिया. फैक्ट्री में भाजपा के स्थानीय नेता अशोक गुप्ता की हिस्सेदारी की बात सामने आने के बाद सरकार की मुसीबतें बढ़ गईं क्योंकि तब भाजपा नीतीश कुमार के साथ गठबंधन का हिस्सा थी.

घटना में मारे गए लोग अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े थे. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिना समय गंवाए तुरंत न्यायिक जांच के आदेश दे दिए. घटना के करीब पांच साल के बाद आई जांच आयोग कि रिपोर्ट में पुलिस फायरिंग को उचित ठहराया है.

आयोग के मुताबिक पुलिस के सामने हिंसक भीड़ पर काबू करने का कोई रास्ता नहीं था. अगर फायरिंग नहीं होती, तो पुलिसकर्मियों की जान को खतरा था.

भाजपा की सरकार बनने के बाद साल 2014 में सरवनन केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली आ गए

आयोग ने इस गोलीकांड का सबसे बड़ा दोषी अररिया जिले के तत्कालीन डीएम एम सरवनन और फारबिसगंज के तत्कालीन थानाध्यक्ष को ठहराया है. रिपोर्ट के मुताबिक सरवनन ने ग्रामीणों के बार-बार अनुरोध किए जाने के बावजूद पगडंडी मामले के निराकरण में कोई रुचि नहीं दिखाई थी. आयोग के मुताबिक सरवनन ने एक तरह से मामले को तूल देने का काम किया.

रिपोर्ट के मुताबिक सरवनन ने खुद फैक्ट्री की दीवार के निर्माण के काम में तेजी लाने के लिए अपने मताहतों पर दबाव बनाया. भारतीय जनता पार्टी के सूत्रों के मुताबिक सरवनन पर अशोक गुप्ता का भी दबाव था जिसके कारण उन्होंने अपने अधीनस्थ अधिकारियों पर दबाव बनाया था.

इस मामले में हो रही राजनीति भी अब दिलचस्प मोड़ ले चुकी है. जो सरवनन भाजपा नेता के दबाव में फैक्ट्री की दीवार को बनवाए थे वे केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद साल 2014 में केंद्र की प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली आ गए. अब वे प्रधानमंत्री कार्यालय में जितेंद्र सिंह के निजी सचिव के रूप में नियुक्त हैं.

घटना के करीब पांच साल के बाद आई जांच आयोग कि रिपोर्ट में पुलिस फायरिंग को उचित ठहराया है

अब बिहार सरकार का भाजपा से छत्तीस का आंकड़ा है. लिहाजा राज्य सरकार ने आयोग की रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए सामान्य प्रशासन विभाग से सरवनन के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने को कहा है. इसके तहत सबसे पहले उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया जाएगा. साथ ही, दोषी पाए जाने पर राज्य सरकार प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग कर सकती है. यह पीएमओ के लिए शर्मनाक स्थिति होगी.

फिलहाल सरवनन पीएमओ में बतौर राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह के निजी सचिव के रूप में काम कर रहे हैं. भाजपा के बिहार इकाई के नेता बताते हैं कि सरवनन की कई भाजपा नेताओं के साथ करीबी रही है. साल 2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनने के कुछ ही दिनों के भीतर सरवनन का नई दिल्ली से बुलावा आ गया था. बिहार के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''वैसे तो बिहार के अधिकारियों की केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना पड़ता है, लेकिन उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई.''

जाहिर है सरवनन ने फारबिसगंज में रहते हुए भाजपा नेता को लाभ पहुंचाने के लिए फायरिंग का आदेश दिया और अब उनकी भाजपा से नजदीकी के चलते बिहार सरकार उन्हें बख्शना नहीं चाहती.

First published: 5 April 2016, 23:46 IST
 
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