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आशीष नंदी: बीजेपी में वैचारिक कुनबे से बाहर प्रतिभा तलाशने की हिम्मत नहीं है

श्रिया मोहन | Updated on: 26 June 2016, 12:38 IST

रघुराम राजन को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में दूसरा कार्यकाल सिर्फ इसलिये नहीं दिया गया क्याोंकि उन्होंने खुलकर अपने मन की बात कहने में संकोच नहीं किया. उड़ता पंजाब को 89 कट का सामना करना पड़ता लेकिन कोर्ट के हस्तक्षेप ने उसे बचा लिया. छत्तीसगढ़ में सच सामने लाने वाले पत्रकारों को भी प्रताड़ित किया जा रहा है. 

समाजशास्त्री आशीष नंदी को 2008 में गुजरात सरकार की आलोचना करने वाला एक लेख लिखने के लिये माफी मांगने पर मजबूर किया गया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में हैं और इसे साबित करने के लिये शायद ये उदाहरण काफी हैं. यह माहौल इस देश के लिये कितना खतरनाक हो सकता है यह आज ही की 25 जून 1975 को स्पष्ट हो गया था जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था.

कैच ने आशीष नंदी से विस्तार से भारतीय सरकार की दिक्कतों के बारे में बात की और साथ ही जानने का प्रयास किया कि आखिर क्यों यह सरकार विशेष रूप से अभिव्यक्ति और बोलने की स्वतंत्रता के प्रति कठोर रवैया अपना रही है. प्रस्तुत हैं बातचीत के कुछ चुनिंदा अंशः

क्या वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में है?

स्थितियां बहुत हद तक समान ही हैं. लोग अब इस बात को लेकर अधिक सतर्क हो गए हैं कि वे क्या कह रहे हैं या क्या कर रहे हैं. इस बात को लेकर कोई संदेह नहीं है.

दो महीने पहले आपको 2008 में सरकार के विरोध में लिखे एक लेख को लेकर सार्वजनिक माफी मांगने पर मजबूर किया गया. इसके अलावा वर्ष 2013 में भी एससी/एसटी ट्रिब्युनल ने आपको जयपुर लिट फेस्टिवल में पिछड़ी जातियों के मध्य भ्रष्टाचार में हो रही वृद्धि के बारे में बोलने के चलते आरोप लगाए थे. तब भी आपको माफी मांगने पर मजबूर किया गया था. आपने माफी क्यों मांगी?

मैंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि सुप्रीम कोर्ट मेरे मुकदमों को वापस राज्यों के पास भेज रहा था. उम्र के इस पड़ाव पर मैं यही सोचकर काफी घबरा गया कि मुझे दोबारा गुजरात के सत्र न्यायालय में जाकर इस पूरी लड़ाई को नए सिरे से सुप्रीम कोर्ट तक लाने के लिए जाना होगा.

वे मुझसे अपनी शर्तो पर माफी चाहते थे. उन्होंने माफी का मसौदा तैयार कर रखा था. अदालत ने हमारे मसौदे को स्वीकार कर लिया.

व्यक्तिगत रूप से भी ऐसा करना मेरे लिये काफी कठिन था क्योंकि मैंने कभी भी अपनी कही किसी बात के लिये माफी नहीं मांगी थी. यह मेरे परिवार के लिये भी काफी कठिन था. मेरे कुछ करीबी दोस्तों ने भी मुझे पहले ही दिन से माफी मांगने की सलाह देते हुए इस मामले से बाहर निकलने और भविष्य की लड़ाई के लिये खुद को तैयार करने की सलाह दी.

बहरहाल जो भी हो, जिस दिन मैंने लिटरेरी फेस्ट में अपनी बात रखी थी उसी दिन मैंने कह दिया था कि अगर मेरी कही बातों से अनजाने में किसी की भावनाओं को चोट लगती है तो मैं उसके लिये माफी मांगता हूं. वास्तविकता यह है कि जो कुछ मैंने कहा वह तो मैंने कहा ही था लेकिन मुझे कई ऐसी बात कहने का भी अपराधी बताया गया जो मैंने कभी कही ही नहीं. लेकिन इससे पहले कि पूरा वक्तव्य प्रकाशित होता या सही बात लोगों तक पहुंचती, कुछ लोगों ने मेरे खिलाफ कार्रवाई की मांग प्रारंभ कर दी. आरोप लगने में कोई समय नहीं लगा.

अगर मैंने माफीनामा जारी नहीं किया होता तो हो सकता है कि वे पांच साल या दस साल या फिर शायद मेरे मरने तक मेरा पीछा नहीं छोड़ते. यह उत्पीड़न करना है. मेरे पास उच्चतम न्यायालय में मुकदमों को लड़ने और वकीलों को देने के लिये पैसे नहीं हैं. मैं कपिल सिब्बल, राजीव धवन, सोली सोराबजी, अमन लेखी और प्रशांत भूषण जैसे दोस्तों का बहुत आभारी हूं जिन्होंने मुझे कानूनी राय दी और मेरे पक्ष में अदालत में पेश हुए.

अब माफी मांगने के बाद क्या आप अपने कहे और लिखे को लेकर अधिक सावधान रहने लगे हैं?

नहीं, बिल्कुल नहीं. मुझे जो ठीक लगता है मैं वहीं बोलता हूं. मैं बिल्कुल भी चिंतित नहीं हूं. यहां तक कि मैंने टीवी पर भी अपनी बात का समर्थन किया है.

इस सरकार के बारे में आपकी क्या राय है जो न सिर्फ रघुराम राजन जैसे काबिल लोगों को सिर्फ इसलिये महत्वपूर्ण पदों से हटा रही है क्योंकि इन्होंने अपनी असहमति को खुलकर सामने रखा बल्कि एनआईएफटी, आईआईएफटी और सेंसर बोर्ड जैसे सांस्कृतिक निकायों में अयोग्य लोगों को नियुक्त कर रही है?

(हंसते हुए) आपने बिल्कुल ठीक बात कही. लेकिन मैं इसे दूसरे दूसरे शब्दों में कहना चाहूंगा. यह सरकार जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रतिभा की कमी झेल रही है. असल दिक्कत यह है कि उन्हें ज्ञान के क्षेत्र में अपनी विचारधारा के लोग नहीं मिल पा रहे हैं. यहीं बात वामपंथी दलों के लिये भी सटीक बैठती है लेकिन वे मौन नहीं हैं. संस्कृत मंत्री महेश शर्मा य गजेंद्र चैहान को ही देखिये. वे लगातार बेसिर पैर की बातें बोलकर खुद को ही मूर्ख साबित कर रहे हैं. बीजेपी के पास इतना भी साहस या उदारता नहीं है कि वे अपने वैचारिक दायरे से बाहर निकलकर प्रतिभाओं को तलाश सकें. यही वजह है कि वैचारिक दल भारतीय राजनीति जीवन के लिये अप्रासंगिक होते जा रहे हैं.

क्या यह भी एक प्रकार की असहिष्णुता नहीं है?

जी हां, बिल्कुल. साथ ही यह साहस की कमी और असुरक्षा के भाव से जुड़ा मसला भी है. भारतीय राजनीति असुरक्षा से भरी हुई है. असुरक्षा की सही भावना बड़े नेताओं को उनके परिजनों की ओर खींचती है. यहां भी अगर हम वंशवाद की राजनीति की बात करें तो यह परिवार की असुरक्षा की भावना ही है जो उन्हें एक दूसरे की ओर खींचती है. यहां तक कि ममता बनर्जी, जिनका अपना ऐसा परिजन नहीं है, भी पता नहीं कहां से अपना एक भतीजा सामने ले आई हैं (हंसते हैं).

तो आप यह कहना चाहते हैं कि इस वर्चस्व और असहिष्णुता का मुख्य कारण सिर्फ यह असुरक्षा है?

वास्तव में! इन्हें हिंदुत्व की दो कौड़ी की परवाह नहीं है.

आपको क्या लगता है कि अगर हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का का दावा करें तो क्या हमारा संविधान हमें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान करता है?

नहीं. क्योंकि आज के सोशल मीडिया के युग में किसी भी जानकारी की तथ्यात्मक सच्चाई की परख होने से पहले ही वह ‘वायरल’ हो जाती है. ऐसा ही मेरे साथ भी हुआ. यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी मेरा बचाव यही था कि लोग उन बातों को लेकर उद्वेलित हो रहे हैं जो मैंने कभी कहीं ही नहीं. मेरे खिलाफ हुई एफआईआर पूरी तरह ये एक फर्जीवाड़ा थी जिसे अदालत द्वारा सिरे से खारिज कर दिया जाना चाहिये था. लेकिन इस प्रकार की एक एफआईआर के दम पर किसी पर भी मुकदमा चलाया जा सकता है.

तो ऐसे में नागरिकों को अधिक सुरक्षा प्रदान करने की एवज में आप संविधान में क्या परिवर्तन होते हुए देखना चाहेंगे?

मुझे लगता है कि हमारे संविधान का विस्तार किया जाना चाहिये और यह और अधिक विस्तृत होना चाहिये. अगर आप बोलने की आजादी पर भी पहरा बिठाकर रखना चाहते हैं तो कुछ निश्चित कामों की छूट मिलनी चाहिये.

यहां पर लोग बीते 100 सालों से क्रांति की बात कर रहे हैं और कोई इस ओर ध्यान भी नहीं दे रहा है. वामदलों ने हमेशा खूनी हिंसा की बात की है. रूसी या फ्रेंच क्रांतियों को मुक्ति आंदोलनों की तरह देखा जाता है. लेकिन ऐसा पहली बार है कि ऐसी बातों को भी राष्ट्र-विरोधी माना जा रहा है. क्रांति की बात तो भूल जाओ, आज के समय में तो इस शब्द को बोलने के लिये भी स्थान नहीं है.

हिदुत्व को एक ऐसे धर्म के रूप में देखा जाता है जो सहिष्णुता और खुलकर अपनी बात बोलने की आजादी देने के साथ बहस या वाद-विवाद की संस्कृति को भी बढ़ावा देता है. इस सरकार के शीर्ष नेतृत्व को पुरातन शास्त्रों से क्या सीखना चाहिये?

सबसे पहली चीज तो यह है कि इन्हें बहुलता के साथ जीना सीखना होगा. अगर आप विविधता या बहुलता के साथ जीने को तैयार नहीं हैं वह भी तब जब विविधता आपकी विचारधारा के खिलाफ जाती है- राष्ट्रवाद से लेकर नारीवाद, हिंदुत्व से लेकर इस्लाम की खिलाफत- आप भारतीय सभ्यता के सबसे बड़े विरोधी और गद्दार हो जाते हैं.

महाभारत के शांति पर्व में, कुरुक्षेत्र की लड़ाई जीत लेने के बाद इस महाकाव्य के नायकों को अपराध की भावना का अहसास होता है. इसका सबसे बड़ा सबक यह है कि जब आप हिंसा के रास्ते से जीतते हैं तो कोई भी सुखी जीवन नहीं जी सकता. कोई भी हत्यारा खुशी का जीवन नहीं जी सकता.

First published: 26 June 2016, 12:38 IST
 
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