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हजारों बेशकीमती चीजें देश के बाहर, सिर्फ कोहिनूर ही जरूरी क्यों?

सत्यब्रत पॉल | Updated on: 26 April 2016, 8:29 IST

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष करीब 59,000 मुकदमे लंबित हैं. ऐसे में यह चौंकाने वाली बात है कि इनमें से एक जनहित याचिका जो कोहिनूर हीरे की वापसी से जुड़ी है, उसे कोर्ट ने इसलिए संज्ञान में लिया क्‍योंकि मीडिया में आई रिपोर्टों के मुताबिक अगर उसने मामले को खारिज कर दिया होता तो ब्रिटिश सरकार इस फैसले का हवाला देते हुए कोहिनूर पर भारत के ''वैध दावे'' से इनकार कर बैठती.

यह बात एक आम आदमी की समझ से बाहर की है. पिछली तीन सदियों के दौरान ब्रिटेन और बाकी यूरोप में भारत में असंख्‍या वस्‍तुएं गई हैं. कोहिनूर उनमें से केवल एक है. विक्‍टोरिया और अलबर्ट संग्रहालय में ही भारत की 40,000 वस्‍तुएं हैं. ब्रिटिश संग्रहालय में भी तकरीबन इतनी ही भारतीय चीज़ें हैं. 

तथ्‍यों के लिहाज से देखें तो ब्रिटेन में पड़े कोहिनूर का भारत की विरासत से बहुत लेना-देना नहीं है

इसके अलावा अन्‍य संग्रहालयों और शाही इमारतों में भी भारत का सामान भरा पड़ा है, जिनमें एक खास इमारत पोविस कैसल है जिसे क्‍लाइव ने भारत से चुराए सामान से पाट दिया था. इनमें से तकरीबन सभी वस्‍तुएं कोहिनूर के मुकाबले कहीं ज्‍यादा सांस्‍कृतिक और कुछ मामलों में धार्मिक अहमियत रखती हैं.

इसमें से कुछ भी तोहफ़ा नहीं था. सब लूट कर ले जाया गया था. भारत का इन सब पर वैध दावा बनता है. ब्रिटेन के संग्रहालयों और निजी संग्रहों में भारतीय पुरातन वस्‍तुओं की जो इतनी बड़ी खेप है, वह यहां के पुरातात्विक स्‍थलों से ले जायी गई थी.

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लूटे गए खज़ानों और हराए गए भारतीय शासकों के यहां से जवाहरात और अन्‍य बेशकीमती सामान लूट लिए गए. जैसा कि नेहरू ने 'भारत एक खोज' में व्‍यंग्‍यपूर्ण ढंग से कहा है, यह आश्‍चर्य की बात नहीं है कि हिंदुस्‍तानी से अंग्रेज़ी में गए सबसे शुरुआती शब्‍दों में एक ''लूट'' था.

सवाल उठता है कि कोहिनूर हीरा जनहित में इतना अहम आखिर क्‍यों है कि उसे वापस लाने के लिए भारत सरकार से मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीश की अध्‍यक्षता वाली खण्‍डपीठ को करनी पड़े?

बाकी चीज़ों को अंग्रेज़ों ने या तो उनके स्‍थलों से चुराया या फिर उनके मालिकों से लूटा था और इस चोरी या लूट को कुछ और दिखाने की कोशिश भी नहीं की थी. कोहिनूर के बारे में विशिष्‍ट बात यह है कि इसे वे मालिकाने के औपचारिक हस्‍तांतरण के माध्‍यम से लेकर गए थे. यह हस्‍तांतरण मार्च 1849 की लाहौर संधि के अंतर्गत हुआ था जिसमें महाराजा दलीप सिंह ने सदैव के लिए अपने साम्राज्‍य पर अपने दावे को भी त्‍याग दिया था.

कोहिनूर की तरह तमाम हीरे अलग-अलग भारतीय राजाओं की संपत्ति का हिस्‍सा हुआ करते थे जो आज दूसरे देशों में हैं

भारत सरकार अगर यह दलील देती है कि दलीप सिंह ने बलप्रयोग के चलते अपना साम्राज्‍य नहीं, केवल हीरा दे दिया था तो यह बात हास्‍यास्‍पद हो जाएगी. भारत सरकार समूची संधि को ही अस्‍वीकार कर सकती है, लेकिन यदि उसने ऐसा किया तो इसका मतलब यह होगा कि रंजीत सिंह का साम्राज्‍य अब भी मौजूद है. इसके कई निहितार्थ होंगे, जिसमें सबसे अहम यह होगा कि गुलाब सिंह का कश्‍मीर तब वह रजवाड़ा नहीं रह जाएगा जिसका भारत में विलय हुआ था. इस तरह की कई खतरनाक स्थितियां पैदा हो सकती हैं.

अंतरराष्‍ट्रीय कानून के लिहाज से देखें तो भारत सरकार अदालत को केवल इतना कह सकती है कि 1970 का कन्‍वेंशन ऑन दि मीन्‍स ऑफ प्रॉहिबिटिंग एंड प्रिवेंटिंग दि इल्लिसिट इम्‍पोर्ट, एक्‍सपोर्ट एंड ट्रांसफर ऑफ ओनरशिप ऑफ कल्‍चरल प्रॉपर्टी, जिसका पक्षकार भारत भी है, वह पिछली तारीख से लागू नहीं होता है.

यह संकल्‍प अपने प्रभाव में आने से पहले की तारीख में ली गई सांस्‍कृतिक संपदा की वापसी के लिए पक्षकार राज्‍यों को ''आपस में विशेष समझौते करने'' से नहीं रोकता है, लेकिन ब्रिटेन ने इस पर 2002 में ही दस्‍तखत किए हैं यानी यह रास्‍ता पहले हमारे लिए नहीं खुला था.

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भारत अगर वास्‍तव में अपनी सांस्‍कृतिक संपदा की वापसी के लिए ब्रिटेन के साथ कोई समझौता करने का प्रयास करता है, तब मामला कोहिनूर तक ही सीमित क्‍यों हो? फिर तो हज़ारों वस्‍तुएं हैं जिन पर बेहतर दावा किया जा सकता है और ज़ाहिर है, तब सुप्रीम कोर्ट में उतनी ही जनहित याचिकाएं इस संबंध में लगानी होंगी.

चीन और पाकिस्‍तान से उलट भारत 1995 के युनिड्रॉइट कन्‍वेंशन ऑन स्‍टोलेन ऑर इल्‍लीगली एक्‍सपोर्टेड कल्‍चरल ऑब्‍जेक्‍ट्स का पक्षकार नहीं है, न ही ब्रिटेन है. सुप्रीम कोर्ट इस संबंध में भारत को शायद ही कोई दिशानिर्देश जारी कर सकता है. इसके लिए उसे कार्यपालिका के अधिकारों का अतिक्रमण करना पड़ेगा. वैसे भी, भारत यदि इस पर दस्‍तखत कर भी देता है तो कोई फर्क नहीं पड़ने वाला जब तक ब्रिटेन इस संकल्‍प का हिस्‍सा नहीं बन जाता.

क्‍या वास्‍तव में कोहिनूर ऐसा मसला है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को अपना वक्‍त ज़ाया करना चाहिए?

भारत ने यदि कोहिनूर की मांग की और अपनी घोषित नीति से पीछे हटते हुए यदि ब्रिटेन ने इस अनुरोध को स्‍वीकार भी कर लिया, तो इसके तीन और दावेदार बनते हैं. हुमायूं ने इसे निर्वासन के दौरान अपनी मदद के लिए शाह तहमास्‍प को दिया था और बाद में तोहफ़े के रूप में उसे वापस हासिल कर लिया, लेकिन नादिर शाह दिल्‍ली से लूटे गए तमाम सामान के साथ कोहिनूर को लेकर फारस चला गया था.

अहमद शाह दुर्रानी इसे अपने साथ काबुल लेकर गया और उसके पौत्र शूजा-अल-मुल्‍क को गद्दी दिलाने में मदद के एवज में भुगतान के तौर पर रणजीत सिंह ने हीरा वापस हासिल किया. इसीलिए ईरान और अफगानिस्‍तान दोनों ने ही कोहिनूर पर अपना दावा ठोका है. पाकिस्‍तान ने भी इस बिनाह पर अपना दावा ठोका है कि ब्रिटेन ले जाए जाने से पहले तक यह हीरा लाहौर में था. ब्रिटिश सरकार के लिए यह वरदान के जैसा है. 

पढ़ें: अब पाकिस्तान ने भी ठोका 'कोहिनूर' पर अपना दावा

जैसा कि हैदराबाद के निज़ाम के ब्रिटेन स्थित खातों के साथ हुआ था जिस पर भारत के दावे को पाकिस्‍तान ने चुनौती दी थी, ब्रिटेन बड़ी आसानी से कोहिनूर पर दावा कर रहे चारों देशों से कहेगा कि पहले वे अपने बीच दावेदारी की जंग को निपटा लें, उसके बाद उसके पास आएं. ध्‍यान रहे कि आज 2016 में भी निज़ाम की संपत्ति पर ब्रिटेन की अदालत में मुकदमा जारी है. सवाल ये है कि कोहिनूर के मसले पर उसके चारों दावेदारों के बीच मध्‍यस्‍थता का काम कौन करेगा?

इसीलिए किसी भी भारतीय या अंतरराष्‍ट्रीय कानून के होने का कोई मतलब नहीं रह जाता या फिर ऐसे किसी भी कानून का, जिस पर सुप्रीम कोर्ट कुछ भी कह सकने की स्थिति में हो. अगर किसी चमत्‍कार के चलते हीरा वापस भारत आ ही गया, तब जगन्‍नाथ पुरी मंदिर के ट्रस्‍टी कोर्ट को अवश्‍य यह याद दिलाएंगे कि महाराजा रणजीत सिंह ने अपने वसीयतनामे में हीरे को मंदिर के नाम लिखा था, दलीप सिंह के नाम नहीं और इसीलिए दलीप सिंह के पास उसे अंग्रज़ों को सौंपने का कोई कानूनी अधिकार नहीं था. लिहाजा वापस आने के बाद कोहिनूर को वहीं जाना चाहिए जहां उसकी जगह है- देवता के गर्भगृह में. मामला यहीं खत्‍म हो जाएगा.

1953 में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय की ताजपोशी के समय कोहिनूर हीरे को उनके ताज में जोड़ा गया

तथ्‍यों के लिहाज से देखें तो ब्रिटेन में पड़े कोहिनूर का भारत की विरासत से बहुत लेना-देना नहीं है. अव्‍वल तो, बाबरनामा कहता है कि ग्‍वालियर के राजा के परिवार से हुमायूं ने जो हीरा प्राप्‍त किया था, वह ''वही मशहूर हीरा था जो अलाउद्दीन ने खरीदा रहा होगा'.' मलिक काफूर जो कच्‍चा हीरा अलाउद्दीन खिलजी के लिए दक्‍कन से वापस ले आया था, कहते हैं कि उसका वज़न 793 कैरट था. जो हीरा बाबर ने देखा, वह ''आठ मिस्‍कल'' यानी करीब 290 कैरट का था.

शाहजहां ने इसे फिर तराशा और ऐसा तराशा कि इसका वज़न घटकर 186 कैरट रह गया. अंत में विक्‍टोरियाई आदेश पर इसे जब तराशा गया तो इसका आखिरी वज़न 106 कैरट रह गया. यह एक विकृत और विकलांग कोहिनूर है, बाबर वाला वह हीरा नहीं जिसके बारे में उसने लिखा था कि जो पूरी दुनिया का ढाई दिन तक पेट भर सकता है.

पढ़ें: 'कोहिनूर' मसले पर केंद्र सरकार का यू टर्न

इस जैसे तमाम बेशकीमती हीरे गोलकुंडा की खदानों से निकल चुके हैं और सभी कोहिनूर जैसे ही हैं. ऐसे तमाम हीरे अलग-अलग भारतीय राजाओं की संपत्ति का हिस्‍सा हुआ करते थे जो आज दूसरे देशों में हैं. लूट का यह सारा माल कोई भी लौटाने नहीं वाला. जैसा कि डेविड कैमरून ने सपाट शब्‍दों में कहा था, एक बार अगर एक रियायत दे दी गई तो बाद में और ज्‍यादा मांग उठेगी और तार्किक तौर पर हम उन्‍हें फिर ठुकरा नहीं पाएंगे.

एक चिंता की बात यह भी है कि ऐसी तमाम बेशकीमती चीज़ें जो विदेशों के संग्रहालयों में इतने करीने से रखी गई हैं, अगर भारत वापस आ गईं तो भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के रहमो-करम पर उनका क्‍या हाल होगा.

क्‍या वास्‍तव में यह कोई ऐसा मसला है जिस पर सुप्रीम कोर्ट को या फिर उसके निर्देश पर केंद्र सरकार को अपना वक्‍त ज़ाया करना चाहिए? कोर्ट में लंबित 59,000 मामलों में हर एक की अहमियत बराबर है. वैसे भी जिस देश के 40 फीसदी बच्‍चे कुपोषित हों, जहां अब भी दुनिया में सबसे ज्‍यादा गरीबी मौजूद हो, वहां की सरकार के पास एक राजा के आभूषण के लिए व्‍यर्थ गिड़गिड़ाने के मुकाबले करने को कहीं बेहतर दूसरे काम हैं.

First published: 26 April 2016, 8:29 IST
 
सत्यब्रत पॉल @Catchhindi

लेखक पाकिस्तान में भारतीय उच्चायुक्त रह चुके हैं.

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