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समाज में ही नहीं ई-बे पर भी भेदभाव की शिकार हैं महिलाएं

स्नेहा वखारिया | Updated on: 24 February 2016, 12:42 IST
QUICK PILL
  • एक महिला को पुरुषों के मुकाबले लगातार एक ही तरह के प्रॉडक्ट की बिक्री के लिए 20 फीसदी कम रकम मिली. गिफ्ट कार्ड्स के मामले में भी यही परिणाम रहा.
  • सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि हमें पता था कि लैंगिक भेदभाव हो रहा है लेकिन क्यों हो रहा है, इसका पता नहीं लग पाया.

42 फीसदी एप डेवलपर्स महिलाएं हैं. सात फीसदी टेक्नोलॉजी स्टार्टअप्स महिलाओं का है. इसके अलावा फेसबुक में 16 फीसदी महिलाएं टेक्नीकल पदों पर काम कर रही है. गूगल में यह आंकड़ा 17 फीसदी है जबकि ट्विटर में महिला कर्मचारियों की संख्या 10 फीसदी है.

ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर फील्ड में दो फीसदी महिलाएं हैं. इसके अलावा 11 फीसदी वेंचर कैपिटलिस्ट्स महिलाएं हैं. फॉर्च्यून 500 की सूची में पांच फीसदी महिला सीईओ हैं. 

स्थिति बेहद खराब है. लैंगिक भेदभाव संस्थागत हो चुका है. यह ऊपर से लेकर नीचे तक बना हुआ है. लेकिन उस स्थिति की कल्पना कीजिए जहां कोई संस्था नहीं होती? जब कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से इंटरनेट पर किसी डील के दौरान मिलता है? इसमें लैंगिक असमानता कहां से आती है?

हमें नहीं पता कि यह क्यों होता है लेकिन होता जरूर है.

अगर कोई पुरुष और महिला ईबे पर एक ही तरह का प्रॉडक्ट बेच रहे हैं तो महिलाओं को कम खरीदारों का रिस्पॉन्स मिलता है. उसे पुरुषों को मिलने वाले प्रति डॉलर के मुकाबले 80 सेंट की रकम मिलती है.

कैसे हुआ शोध

ईबे के पास इस बारे में पूरा आंकड़ा है. इसे आम तौर पर छिपा कर रखा जाता है लेकिन तेल अवीव विश्वविद्यालय के समाजविज्ञानी और कानून के विद्वान तमार क्रिशेल कैट्ज और इंटरडिस्प्लीनरी सेंटर हर्जेलिया के अर्थशास्त्री तली रगेव को इन आंकड़ों तक पहुंचने का मौका मिल गया.

शोध के बाद यह बात सामने आ चुकी है कि लैंगिक भेदभाव वहां भी मौजूद है जिसके बारे में हम सोच नहीं पाते. मसलन एक ही प्रॉडक्ट की कीमत महिला और पुरुष के बेचने से अलग-अलग हो जाती है.

कैट्ज और रगेव ने ईबे पर बेची जाने वाली 420 लोकप्रिय उत्पादों को चुना. 2009 से 2012 के बीच इन प्रॉडक्ट्स को लेकर 11 लाख ट्रांजैक्शंस हुए.

फिर उन्होंने यह देखना शुरू किया कि क्या इसकी बिक्री में लैंगिक भेदभाव से भी कोई फर्क पड़ा. एक महिला को पुरुषों के मुकाबले लगातार एक ही तरह के प्रॉडक्ट की बिक्री के लिए 20 फीसदी कम रकम मिली. गिफ्ट कार्ड्स के मामले में भी यही परिणाम रहा. अब आप सोचिए कि गिफ्ट कार्ड्स की खरीदारी के दौरान भी लैंगिक भेदभाव की बात सामने आई.

हालांकि चौंकाने वाली बात यह रही कि अधिकांश ईबे सेलर्स अपने लिंग के बारे में जानकारी नहीं देते हैं. तो फिर लैंगिक भेदभाव कैसे हुआ?

यहां कैट्ज और रगेव थोड़ा आगे गए. उन्होंने यह जानने की कोशिश की कि क्या हम बिना जानकारी मुहैया कराए विक्रेता के लिंग के बारे में पता लगा सकते हैं. 

उन्होंने 400 लोगों को अनुमान लगाने के लिए कहा और 56 फीसदी लोगों ने विक्रेता के लिंग के बारे में सही अनुमान लगाया जबकि 35 फीसदी लोग ऐसा नहीं कर पाए. वहीं 9 फीसदी से कम लोगों ने गलत अनुमान लगाया.

दोनों ने एक परिकल्पना की. पुरुषों ने अपने प्रॉडक्ट्स के बारे में ज्यादा सटीक जानकारी दी. उन्होंने विज्ञापनों के लिए भरे गए टाइटल और सब टाइटल का कंप्यूटर एनालिसिस किया. सबसे ज्यादा सकारात्मक सेंटीमेंट को सबसे ज्यादा प्वाइंट मिले.

और फिर यह बात सामने आई, 'पुरुष और महिला विक्रेताओं का सेंटीमेंट अलग-अलग था.' नतीजा सामने था. महिलाओं को ईबे पर कम डॉलर मिले क्योंकि उन्हें अपने प्रॉडक्ट को बाजार में सही ढंग से नहीं बेचना आया. सही है?

गलत. जब शोधकर्ताओं ने टाइटल और सब टाइटल में फेरबदल किया तब भी उन्हें यह देखने को मिला कि महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को मिले ऑफर में भारी अंतर था.

सबसे अधिक चौंकाने वाली बात यह रही कि हमें पता था कि लैंगिक भेदभाव हो रहा है लेकिन क्यों हो रहा है, इसका पता नहीं लग पाया. ऐसी क्या वजह थी जिसकी वजह से महिला विक्रेताओं को अपना प्रॉडक्ट बेचने में परेशानी हो रही थी? तो क्या किसी खरीदार को किसी महिला से खरीदारी के दौरान बहुत अधिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा था? क्या उनके प्रॉडक्ट पर गुलाबी रंग का स्टिकर लगा हुआ था?

हम वैसे किसी पूर्वाग्रह से नहीं निपट सकते जिसके बारे में हमें पता ही नहीं हो. हालांकि अच्छी खबर यह है कि हम एक नए पूर्वाग्रह से निपटने जा रहे हैं.

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First published: 24 February 2016, 12:42 IST
 
स्नेहा वखारिया @sneha_vakharia

A Beyonce-loving feminist who writes about literature and lifestyle at Catch, Sneha is a fan of limericks, sonnets, pantoums and anything that rhymes. She loves economics and music, and has found a happy profession in neither. When not being consumed by the great novels of drama and tragedy, she pays the world back with poems of nostalgia, journals of heartbreak and critiques of the comfortable.

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