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छत्तीसगढ़: 12 साल बाद कांग्रेस फिर उसी दोराहे पर, जोगी बनाएंगे अपनी पार्टी

शिरीष खरे | Updated on: 3 June 2016, 22:21 IST
(फाइल फोटो)

"मैं कोई भी बड़ा फैसला मारवाही की जनता से पूछ कर करता हूं. इसलिए अपने समर्थकों की मांग पर कांग्रेस पार्टी छोड़ने का फैसला कर रहा हूं. 6 जून को मरवाही में डेढ़ हजार समर्थनों के साथ एक नई पार्टी का नाम, झंडा, निशान और दिशा तय करुंगा. आज की कांग्रेस पहले जैसी नहीं रही. प्रदेश स्तर के नेताओं की कोई सुनने वाला नहीं है. भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव मिलकर रमन सरकार को नहीं हरा सकते हैं, इसलिए मुझे आगे आना होगा. मैं भूपेश और सिंहदेव की कांग्रेस को दस से ज्यादा सीटें नही जीतने दूंगा. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को इस बारे में मैंने सब बता दिया है, अब मैं दिल्ली नहीं जाऊंगा."

यह घोषणा तथा दावा छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजीत जोगी ने गुरूवार को रायपुर में किया. जोगी का यह भी कहना है कि उनके साथ कांग्रेस के 38 में 15 विधायक हैं, लेकिन उन्होंने किसी पर दबाव नहीं डाला है.

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जोगी की इस घोषणा के साथ ही छत्तीसगढ़ की कांग्रेसी राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है. इसके बाद प्रदेश में राजनीति के नए समीकरण क्या होंगे या इससे किसे नफा-नुकसान होगा, यह सब अभी भविष्य की गर्भ में है. हां, अजीत जोगी के अगले कदम पर सबकी नजर जरूर टिक गई है.

छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का मानना हैं कि जोगी के बाहर जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा

दिसंबर, 2015 के अंतिम दिनों में अंतागढ़ उपचुनाव सीडी कांड के बाद से ही जोगी परिवार के सितारे गर्दिश में चल रहे हैं. इस सीडी में कथित तौर पर अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी का नाम आने के बाद उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में छह वर्षों के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था. बेटे के निष्कासन के बाद अजीत जोगी के लिये कांग्रेस में 'करो या मरो' की स्थिति बन गई थी.

बताया जा रहा है कि हाल ही में जोगी ने छत्तीसगढ़ से राज्यसभा टिकट के लिए दावेदारी की थी, लेकिन टिकट मिलना तो दूर पार्टी हाईकमान ने उनसे राज्यसभा सीट पर प्रत्याशी चयन के लिए भी चर्चा नहीं की. कांग्रेस ने छाया वर्मा को यहां से राज्यसभा में भेजा है.

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नई पार्टी का आधार मजबूत करने की मंशा के चलते लंबे समय से अमित जोगी प्रदेश के कोने-कोने का दौरा कर रहे हैं. जोगी परिवार के समर्थकों को उम्मीद है कि भाजपा और अन्य दलों के उपेक्षित नेता उनके साथ आ सकते हैं.

जोगी के साथ जाने वाले संभावित नामों में भाजपा के पूर्व सांसद सोहन पोटाई की चर्चा है. उन्होंने बीते दिनों पत्रकारवार्ता के जरिए रमन सरकार पर आदिवासी विरोधी होने का आरोप लगाया था. इसके बाद प्रदेश भाजपा ने इसे पार्टी की अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें कारण बताओ नोटिस भी भेजा है.

छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत हैं तो उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी रहे हैं. पार्टी के भीतर कुछ कार्यकर्ताओं मानते हैं कि अनुसूचित जाति बहुल कुछ क्षेत्रों में जोगी के पास जनाधार है तथा समर्पित कार्यकर्ताओं की जुझारू टीम भी.

बीते एक दशक में उन्होंने अपने स्तर पर एक अलग संगठन बनाया है. जोगी की भाषण शैली लोगों को पंसद आती है. दूसरी तरफ, जोगी की जोड़-तोड़ की राजनीति अक्सर कांग्रेस पार्टी के लिए शर्मिंदगी का सबब बनती रही है.

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उनकी सरकार के तीन वर्ष के कार्यकाल को आधार बनाकर भाजपा कांग्रेस पर पलटवार करती रहती है. छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस का मानना हैं कि जोगी के बाहर जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा. अंतागढ़ सीडी कांड विवाद के दौरान पार्टी अध्यक्ष भूपेश बघेल कह चुके हैं कि पार्टी में कई लोग आते हैं और चले जाते हैं. जोगी के जाने से पार्टी को लाभ मिलेगा और छवि सुधरेगी.

बेटे के निष्कासन के बाद अजीत जोगी के लिये कांग्रेस में 'करो या मरो' की स्थिति बन गई थी

विश्लेषकों का कहना है कि प्रदेश की 90 सीटों पर चुनाव परिणाम प्रभावित नहीं होंगे, लेकिन कई सीटों पर वे कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं. इस समय प्रदेश में भाजपा की कांग्रेस से दस सीटें ज्यादा हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से महज 0.7 फीसदी ही कम है.

अजीत जोगी की नई पार्टी बनने के बाद यह फर्क घटेगा या बढ़ेगा-यह भी देखने की बात है. मगर ऐसे में करीब एक दर्जन सीटों पर ही जोगी ने वोट प्रभावित किए तो उनकी पार्टी जीते या हारे, लेकिन कांग्रेस की मुसीबतें बढ़ सकती हैं. दूसरी तरफ, यदि किसी सीट पर भाजपा के बागी नेता को जोगी की पार्टी से टिकट मिल गया तो भाजपा के समीकरण भी प्रभावित हो सकते हैं.

इससे पहले 2003 में विद्याचरण शुक्ल ने शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर कांग्रेस को छत्तीसगढ़ में तगड़ा नुकसान पहुंचाया था. तब उनके साथ बड़ी तादाद में कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बगावत की थी.

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विद्याचरण शुक्ल के नेतृत्व में इस चुनाव में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को लगभग 7 फीसदी वोट मिले थे. इससे कुछ सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी हार गए थे. इसके बाद 2008 एवं 2013 में आपसी गुटबाजी के चलते भी कांग्रेस को पराजय झेलनी पड़ी थी.

सवाल है कि जब जोगी परिवार कांग्रेस पार्टी से अलग हो रहा है तो क्या 2018 में होने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव के पहले कांग्रेस एक बार फिर 12 साल पहले की स्थिति में पहुंच गई है?

First published: 3 June 2016, 22:21 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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