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प्रधानमंंत्री संसद में बजट पर जवाब दे रहे थे या चुनावी जनसभा संबोधित कर रहे थे?

चारू कार्तिकेय | Updated on: 8 February 2017, 8:11 IST
(पीटीआई)

क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों कुछ लोगों की बातों पर उनके चुने हुए दोस्त जमकर ठहाके लगाते हैं, जबकि उनकी सर्किल से बाहर के लोग बिल्कुल प्रतिक्रिया नहीं करते? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सोमवार को लोकसभा में यही हाल था. वे राष्ट्रपति के भाषण पर धन्यवाद ज्ञापित करते हुए बोल रहे थे.

मोदी ने अपने भाषण में ना केवल प्राकृतिक आपदा का मजाक बनाते हुए सरकार का पक्ष लिया, बल्कि विपक्ष के नेताओं पर व्यक्तिगत हमले भी किए. उनके इस रवैये को प्रोत्साहन दे रहे थे, सत्ता पक्ष के ही कुछ लोग. संसद में उनकी गैरजरूरी हंसी गूंज रही थी, साथ ही वे बारबार मेजें भी थपथपा रहे थे. 

प्राकृतिक आपदा का मजाक

जिस तरह से पीएम ने अपनी बात शुरू की, उससे लगा कि वे पिछली शाम उत्तर भारत में आए भूकंप पर दुख प्रकट कर रहे हैं, पर केवल एक लाइन दुख की बोलकर मोदी ने खुलासा किया कि भूकंप का प्रसंग कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर प्रहार करने के लिए है. बहुत ही घुमा-फिराकर व्याख्या करके उन पर भूकंप का आरोप लगाते हुए मोदी ने कहा, ‘आखिर भूकंप आ ही गया, मैं सोच रहा था कि भूकंप कैसे आया. धमकी तो बहुत पहले सुनी थी, कोई तो कारण होगा कि धरती मां इतनी रूठ गई होगी.’ 

मोदी का इशारा गांधी के पिछले संसद अधिवेशन के बयान की ओर था. गांधी ने कहा था कि यदि वे बोलेंगे, तो भूकंप आ जाएगा. बेशक एक राजनेता दूसरे राजनेता के बयान पर प्रतिक्रिया कर सकता है, पर क्या यह प्रतिक्रिया प्राकृतिक आपदा की कीमत पर होनी चाहिए? और आपदा भी ऐसी, जिसने चार साल पहले की एक करुणाजनक त्रासदी की याद दिला दी, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे. यह मोदी की बहुत बड़ी भूल है. 

मोदी राहुल गांधी के हाल के बयान का भी मजाक उड़ाते रहे, जो उन्होंने उत्तर प्रदेश में चुनाव रैली के दौरान दिया था. बदले में राहुल गांधी ने किंडरगार्टन-ऐक्रनिम का मजाक उड़ाया, जिसकी मोदी ने अपनी एक रैली में रचना की थी. तब मोदी ने यूपी में भाजपा के विरोधियों को SCAM (समाजवादी, कांग्रेस, अखिलेश, मायावती) कहा था. इसके लिए गांधी ने कहा, ‘स का मतलब सर्विस फॉर द पूअर (गरीबों की सेवा). सी का मतलब करेज (साहस). ए का मतलब एबिलिटी (योग्यता) और एम का मतलब मोडेस्टी (नम्रता).’,

इस जवाबी हमले की हास्यास्पद शृंखला को मोदी ने आज लोकसभा में दोहराया, ‘जब कोई स्कैम में भी सेवा का भाव देखता है, नम्रता का भाव देखता है, तो सिर्फ मां नहीं धरती मां भी दुखी हो जाती है. तब जाकर भूकंप आता है.’ 

संसद को चुनावी अखाड़ा बनाया

दरअसल पीएम के भाषण को अध्यक्षीय भाषण पर बहस का जवाब होना चाहिए था. विपक्ष के नेताओं ने भाषण की आलोचना की थी, जैसाकि वे हर साल करते हैं. बताते हुए कि उनकी नजर में क्या कमियां हैं और उसमें सुधार होने चाहिए. इस बहस का जवाब देते हुए, सरकार का काम होता है आलोचना के कुछ खास बिंदुओं पर चर्चा करना. सरकार अपने किए काम के दावे को पुष्ट करने की अधिकारी होती है. पर उन सब पर प्रवचन करने की क्या जरूरत है, जो पिछले 60 सालों में नहीं हुआ?

इस तरह की बात तो आमतौर पर चुनावी रैलियों के लिए सुरक्षित रखी जाती हैं. पर संसदीय बहस में इन बातों पर चर्चा हुई. इस तरह मुद्दे से भटकने से गंभीर गलतियां होती हैं, शब्दों की, विचारों की, फैसलों की. पिछली सरकारों की कमियों पर लगातार ताने कसते हुए मोदी भूल गए कि उनकी सरकार के ज्यादातर काम पहले की सरकारों की प्रक्रिया और उनकी अवधारणाओं पर हुए हैं. इससे यह भी सामने आया कि मोदी की सरकार के पास नए विचारों का एकदम अकाल है.

मोदी ने कहा, ‘मैं जो भी कहता हूं, उसके लिए आप कहते हैं कि ‘हमने इसकी शुरुआत की’. कोई बात नहीं. मैंने आपके क्षेत्र में घुसने का फैसला किया है, केवल यह दिखाने के लिए आपने नीतियों को किस तरह लागू किया.’ उन्होंने अपनी बात जारी रखी कि कांग्रेस ने 1980 के दशक में बेनामी-विरोधी कानून बनाया, जिसे उन्होंने केवल नोटिफाई किया. आधार को लेकर कई संदर्भ थे कि किस तरह उनकी सरकार कई नीतियों को ठीक करने के लिए उसका उपयोग कर रही थी. क्या मोदी भूल गए कि आधार का विचार उनकी पहले वाली सरकार का था? 

व्यक्तिगत हमले

गांधी के अलावा मोदी ने व्यक्तिगत टिप्पणियों से विपक्ष के और नेताओं को घेरा. उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी से कहा, ‘कल्याणजी, आपका सीआर ठीक हो रहा है, आपका कल्याण होगा.’ उनका कहने का मतलब था कि बनर्जी को अपनी पार्टी के हाई कमान को उन पर नजर रखने के बारे में ही नहीं सोचना चाहिए.

मोदी ने संसद में कांग्रेस पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के एक बयान पर कहा, ‘हमारी परवरिश कुत्ते की तरह नहीं हुई है.’ कुछ दिन पहले खड़गे ने भाजपा से कहा था, ‘गांधीजी ने देश के लिए अपने जीवन का बलिदान किया; इंदिराजी ने भी अपने जीवन का बलिदान किया. आपके घर से कौन आया. आपके घर से एक कुत्ता भी नहीं आया.’

पीएम ने आप सांसद भगवंत मान का भी मजाक बनाया. इस चर्चा पर कि वे नशा करते हैं. मोदी ने कहा, ‘चार्वाक ने कहा था कि जब तक जियो, घी पियो, भाई भगवंत मान होते तो कुछ और पीने की बात करते.’

नोटबंदी पर खुशफहमी

मोदी के भाषण से एक बात तो साफ थी कि वे नोटबंदी के लिए कभी नहीं मानेंगे कि यह फैसला उनकी गलती थी. इकोनोमिक सर्वे और केंद्रीय बजट में इसके संकेत हैं कि नोटबंदी से कई नुकसान हुए हैं, पर मोदी एक भी नहीं मानेंगे. उन्होंने नोटबंदी का पक्ष लिया, कहते हुए कि उन्होंने उसे सही समय पर लागू किया है क्योंकि दीवाली के बाद का समय सबसे ज्यादा बिजनेस का था और इस सदमे को बर्दाश्त करने के लिए अर्थव्यवस्था काफी मजबूत थी.

उन्होंने भ्रष्टाचार पर प्रहार करने के लिए नोटबंदी को उपयोगी बताया क्योंकि पिछली सरकार बराबर पूछ रही थी, ‘कितना गया’? जबकि उनसे पूछा जाता है ‘कितना आया?’ उन्होंने नोटबंदी से प्रभावित नियमों में किए बदलाव का पक्ष लिया, कहते हुए कि पिछली सरकार ने लोगों के भले के लिए मनरेगा में 1,035 बदलाव किए थे. उन्होंने नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक की बड़ाई की कि लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि नोटबंदी को इतना गुपचुप क्यों लाया गया, पर सर्जिकल स्ट्राइक के लिए कोई ऐसा क्यों नहीं पूछता. 

मोदी अपने भाषणों में बेजा राजनीतिक प्रहार के साथ ही तथ्यात्मक गलतियों के लिए भी जाने जाते हैं, पर यह भाषण संसदीय इतिहास में निश्चित रूप से याद किया जाएगा, एक ऐसा भाषण जो असंगत और अनुचित है.

First published: 8 February 2017, 8:11 IST
 
चारू कार्तिकेय @CharuKeya

Assistant Editor at Catch, Charu enjoys covering politics and uncovering politicians. Of nine years in journalism, he spent six happily covering Parliament and parliamentarians at Lok Sabha TV and the other three as news anchor at Doordarshan News. A Royal Enfield enthusiast, he dreams of having enough time to roar away towards Ladakh, but for the moment the only miles he's covering are the 20-km stretch between home and work.

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