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मारुति विवाद: चार साल बाद भी जमानत से दूर मारुति के मजदूर

पाणिनि आनंद | Updated on: 19 July 2016, 8:24 IST
(फाइल फोटो)

पांच साल की परनीत कौर को अपने पिता की गोद में खेलने का मौका नहीं मिला. उसकी क्लास में पढ़ रहे बच्चों के पिता उन्हें स्कूल छोड़ने आते हैं, त्योहार मनाने ले जाते हैं, कहानियां सुनाते हैं, पिकनिक मनाने ले जाते हैं. वे बचपन जीते हैं और परनीत अपने पिता का इंतज़ार. उसके पिता सरबजीत गुरुग्राम जेल में बंद हैं. जब वो जेल गए थे, तब से अबतक चार वर्ष का फासला इस इंतज़ार के बीच पसरा पड़ा है.

सरबजीत के जेल जाने से अबतक गुड़गांव तब्दील होकर गुरुग्राम हो गया. प्रदेश और देश की सरकार बदल गई. मजदूरों के हक़ की दुहाई घोषणापत्रों में छापने वाले गद्दियों तक पहुंच गए. लेकिन परनीत का इंतज़ार जारी है.

इंतज़ार सरबजीत के पिता अवतार सिंह भी कर रहे हैं. डाकखाने की नौकरी से रिटायर हो चुके अवतार सिंह और उनकी पत्नी के लिए सरबजीत बुढ़ापे का सहारा है. सरबजीत की पत्नी, बहन, भाई न्याय और जमानत की आस में चार साल काट चुके हैं. इस दौरान लाखों मारुति कारें देश की सड़कों पर उतारी जा चुकी हैं लेकिन न्याय जैसे अपना रास्ता भटक गया है.

इन चार सालों के दौरान अखबारों, पत्रिकाओं और तमाम मीडिया माध्यमों में मारुति के विज्ञापन लगातार छपते रहे हैं. मारुति की छवि सुधारने का अभियान चल रहा है लेकिन जो नहीं छप रहा है वह है मारुति के मजदूरों का दर्द.

हिंसा के बाद 546 स्थायी मजदूरों और 1800 ठेका मजदूरों को बिना किसी जांच के नौकरी से निकाल दिया गया

सरबजीत मारुति कार के मानेसर प्लांट में बतौर स्थायी वर्कर कार्यरत था. 18 जुलाई, 2012 को प्लांट में हुए हादसे में एचआर मैनेजर अवनीश कुमार देव की मौत हो गई थी. इस हादसे का ठीकरा मारुति प्रबंधन ने कर्मचारियों के सिर मढ़ा और उनके विरोध प्रदर्शन को ज़िम्मेदार ठहराते हुए यह आरोप लगाया कि मजदूरों ने प्लांट में आगजनी, तोड़फोड़ की और मैनेजर की हत्या की. इसके बाद पुलिस ने सख्त कार्रवाई करते हुए मजदूरों की धरपकड़ शुरू कर दी.

बेहिसाब कर्मचारी पकड़े गए. उनके साथ बर्बरतापूर्ण व्यवहार किया गया. बुरी तरह मारपीट हुई. 150 से ज़्यादा को पुलिस ने जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया. सरबजीत उनमें से एक था. इसके अलावा 65 के ख़िलाफ़ अभी भी ग़ैर ज़मानती वारंट जारी हैं. 546 स्थायी मजदूरों और 1800 ठेका मजदूरों को बिना किसी जांच के नौकरी से निकाल दिया गया. 426 कर्मचारी तो ऐसे थे जिनके खिलाफ एसआईटी की जांच तक नहीं चल रही है लेकिन वे नौकरी से बिना किसी विभागीय या आंतरिक जांच के निकाल दिए गए हैं.

धुंधली होती आस

उस वक्त जेल में बंद किए गए 150 कर्मचारियों में से लंबे इंतज़ार के बाद पिछले साल 116 लोगों को ज़मानत दे दी गई. लेकिन 35 को नामजद अभियुक्त करार देते हुए अभी भी जेल में रखा गया है. इन चार सालों में इन डेढ़ सौ मजदूरों के घरों में बड़े बीमार पड़ते रहे, मौतें होती रहीं, बच्चे पैदा हुए और बचपन को पिता के बिना जीते हुए बड़े होते रहे. लेकिन फैसला तो दूर, ज़मानत तक की उम्मीद उनके दरवाज़े पर दस्तक देने नहीं आई.

न्याय की यह लड़ाई कितनी कठिन, अमानवीय और दुर्भाग्यपूर्ण है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस मामले की गुड़गांव कोर्ट में पहली सुनवाई लगभग एक साल बाद एक मई को मजदूर दिवस के दिन हुई. मारुति की ओर से सुप्रीम कोर्ट के वकील केटीएस तुलसी खुद कंपनी का पक्ष रखने के लिए यहां मौजूद थे. ज़मानत के लिए लड़ते मजदूरों में से कइयों को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा है. फिलहाल बंद पड़े 35 कर्मचारियों में से एक को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है और बाकी 34 अभी भी सलाखों के पीछे हैं.

18 जुलाई को अपने बेटे से जेल में मिलकर लौटे अवतार सिंह हमसे बात करते हुए फफक पड़ते हैं. “सरबजीत अन्याय और भेदभाव का शिकार है. वो अब भी जेल की सलाखों के पीछे है. हम कमज़ोर पड़ते जा रहे हैं लेकिन वो ही हमें हौसला देता है कि न्याय में विश्वास रखिए. न्याय मिलेगा. भले ही देर से मिले”.

फिलहाल जेल में बंद पड़े 35 कर्मचारियों में से एक को सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिली है

अवतार सिंह कुरुक्षेत्र के रहनेवाले हैं. अपने बेटे से मिलने गुरुग्राम आए और फिर मुलाक़ात के बाद सीधे डीसी ऑफिस पहुंच गए जहां लगभग 1000 मजदूर अपने साथियों के साथ हुए अन्याय की चौथी बरसी पर धरना दे रहे थे. इस धरने में चार मारुति प्लांटों और कारखानों की युनियनों के प्रतिनिधि शामिल हुए. उन्होंने डीसी को दिए अपने ज्ञापन में मांग की है कि जेल में बंद कर्मचारियों को रिहा किया जाए और सारे झूठे मुक़दमे वापस लिए जाएं. उन्होंने मांग की कि सभी बर्खास्त कर्मचारियों को वापस लिया जाए और इस मामले के निस्तारण के लिए त्रिपक्षीय वार्ता की शुरुआत की जाए. साथ ही कर्मचारियों ने 18 जुलाई, 2012 की घटना की निष्पक्ष न्यायिक जाँच की मांग को भी दोहराया है.

कर्मचारियों में से एक ने कहा, “जिन परिस्थितियों में एचआर मैनेजर की मौत हुई वो दुर्भाग्यपूर्ण भी है और संदिग्ध भी. मारुति कर्मचारियों की मैनेजर से अच्छी बनती थी और कोई कारण नहीं था कि उनके साथ ऐसा कृत्य कर्मचारियों द्वारा किया जाता. हम अमानवीय परिस्थितियों में लिए जा रहे काम का विरोध कर रहे थे जिसके जवाब में पुलिस का बल प्रयोग और मुक़दमे लगाकर हमें तोड़ने का प्रयास किया गया है. यह श्रम क़ानूनों की अवहेलना है, लोकतंत्र की हत्या है और अन्याय है”.

एक अन्य कर्मचारी कहते हैं, “मैनेजर की मृत्यु दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन क्या एक मौत के लिए 3000 परिवारों की ज़िंदगी से खेलना जायज़ है. क्या चार साल तक ज़मानत के बिना सलाखों के पीछे लोगों को सड़ा देना और उनके परिवारों को मरते और कमज़ोर होते देना कहीं से भी न्यायसंगत ठहराया जा सकता है. क्या सरकारें पूरी तरह से अंधी और निष्ठुर हो गई हैं. इस देश में अपराध करने वाले सिनेमा बना रहे हैं, संसद में बैठे हैं, कारोबार कर रहे हैं और श्रमिक, गरीब, मजदूर झूठे आरोपों के लिए जेल में सड़ाए जा रहे हैं.”

मारुति प्लांट में जो हादसा हुआ उसका सबसे ज़्यादा नुकसान मजदूरों को हुआ. वे पहले भी पीड़ित थे और आज भी वही पीड़ित हैं. सरकारें, मीडिया और प्रशासन उनकी ओर देखना भी नहीं चाहते. न्याय की आस में कितने ही सरबजीत जेलों में घुट रहे हैं, परिवार रोटी और सहारे की आस में पत्थर होते जा रहे हैं.लोकतंत्र के लिए यह एक दुखद खबर है. समाज के लिए भी और विकास के लिए भी.

First published: 19 July 2016, 8:24 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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