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पंजाब में चौथा मोर्चा: राजनीतिक फोरम बनते गए, पंजाब पीछे छूटता गया

राजीव खन्ना | Updated on: 11 February 2017, 5:46 IST

पंजाब में हाल के दिनों में कई राजनीतिक फोरम के आकार लेने का सुगुहगाहट हुई है. आने वाले विधानसभा चुनावों में चौथे मोर्चे के लिए पक्की सड़क बनाए जाने के लगातार प्रयास जारी हैं लेकिन अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ सका है. शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) राज्य में स्थापित राजनीतिक दल हैं लेकिन जनता के सामने समय के विपरीत सब कुछ जानते-समझते हुए भी एक चौथा विकल्प पेश किए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं. बताते चलें कि पंजाब में हाल में मशरूम की तरह कई राजनीतिक फोरम का उद्भव हुआ है.

1-आवाज-ए-पंजाब

पंजाब की राजनीतिक पिच पर चुनाव से ठीक पहले आवाज-ए-पंजाब नाम की नई गेंद उछाल दी गई है. इसमें प्रमुख लोगों में क्रिकेटर से राजनीतिक नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू, हाकी ओलम्पियन परगट सिंह और स्वतंत्र विधायक बैंस बंधु आदि हैं. ये फोरम फिलहाल यह देखने की कोशिश कर रहा है कि क्या यह राजनीतिक दल के रूप में तब्दील हो सकता है. लेकिन अभी तक इसके फोरम ही बने रहने देने का निश्चय किया गया है. फोरम ऐसे लोगों को अपने से जोडऩा चाह रहा है जो पंजाब के लिए काम करना चाहते हैं.

2-धर्मवीर गांधी का फोरम

एक अन्य फोरम की अगुवाई आप के पटियाला से निलम्बित सांसद धर्मवीर गांधी द्वारा की जा रही है. अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने के बाद भी वह आप के कटु आलोचक हैं. वह चौथा मोर्चा के आकार लेने से हताश हैं. हालांकि, उनके लिए यह स्थिति इसलिए संकटपूर्ण है कि वह अभी सांसद हैं. नई पार्टी अगर बनती है तो उन्हें उसमें शामिल होने में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है.

3-पेहलान पंजाब लोक हित अभियान

यह एक अन्य फोरम है जिसकी अगुवाई कांग्रेस के पूर्व फायरब्रांड नेता जगमीत सिंह बरार कर रहे है. उन्हें हाल ही में पार्टी से निकाल दिया गया है.

4-डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी

आम आदमी पार्टी की पंजाब विरोधी नीतियों से खफा होकर योगन्द्र यादव और प्रशान्त भूषण ने यह संगठन बनाया है. यह संगठन पंजाब के लोगों को राजनीतिक विकल्प उपलब्ध कराने को बहुत ही उत्सुक है. विशेषकर उनको, जो आम आदमी पार्टी की नीतियों से नाइत्तेफाक रखते हैं.

आप फैक्टर

इन सब खिलाडिय़ों का एक व्यापक न्यूनतम एजेण्डा है जिनका राज्य के लोगों की क्षेत्रीय अपेक्षाओं को पूरा करने का वादा है. लेकिन अकालियों का दावा है कि यह काम तो वे पहले से ही कर रहे हैं. वास्तव में देखा जाए तो धर्मवीर गांधी, उनके सहयोगी और स्वराज पार्टी के सदस्य कभी पंजाब में आप के कोर ग्रुप के कार्यकर्ता रहे हैं. अब उनमें से ही ये लोग राज्य में बाहर से नेतृत्व थोपने को लेकर आप पर हमलावर हैं. ये लोग आप के केन्द्रीय नेतृत्व पर तानाशाही होने का आरोप लगाते हैं. आवाज-ए-पंजाब क्षेत्रीय हितों को नजरअंदाज करने मुद्दे पर अकालियों और कांग्रेस पर आक्रामकता दिखाए हुए है. आश्चर्य की बात तो यह है कि सिद्धू इन दिनों आप पर नरम हो गए हैं जबकि फोरम की पहली ब्रीफिंग पर वह आप पर हमलावर की भूमिका में थे.

कांग्रेस से नाता टूटने के बाद बरार अब आप नेतृत्व से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं. उनकी गहरी इच्छा है कि वे पंजाब में चुनाव जीतने के सिलसिले में आपका हिस्सा बन जाएं. उन्होंने आवाज-ए-पंजाब को राजनीतिक पार्टी न बनाने पर सिद्धू की तारीफ भी की है. ये सभी फोरम पंजाब और पंजाबियत लेकर चर्चाएं कर रहे हैं. पर उनके इस दावे को तीनों महत्वपूर्ण खिलाडिय़ों ने नजरअंदाज कर दिया है.

पंजाबी बनाम गैर- पंजाबी

पंजाबी और गैर-पंजाबी का मुद्दा पिछले एक माह से कुछ ज्यादा समय से ही राज्य की राजनीति में चर्चा का विषय बना है, विशेषकर आप के राज्य संयोजक

सुच्चा सिंह छोटेपुर को उनके पद से हटाए जाने के बाद से. कांग्रेस की राज्य इकाई के अध्यक्ष अमरिन्दर सिंह और सअद ने इस मुद्दे को भुनाने की कोशिश की है कि किस तरह से आप के राष्ट्रीय संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने छोटपुर की 'हरियाणावी' के रूप में ब्रांडिंग की और यह भी कि वे पंजाब के लिए बाहरी हैं जिनका रवैया राज्य के हितों के प्रति सहानुभूति पूर्ण नहीं है.

देखा जाए तो राज्य में चौथे मोर्चे के आकार लेने की सम्भावना होने पर छोटेपुर एक अन्य महत्वपूर्ण फैक्टर के रूप में बने रहेंगे. आप नेतृत्व द्वारा उन्हें पद से हटा दिए जाने के बाद से उन्होंने पूरे राज्य का दौरा किया है और मतदाताओं को यह संदेश भी दे दिया है कि वे और उनके सहयोगी चुनावी रणक्षेत्र में उतरने को उत्सुक हैं. विश्लेषकों का कहना है कि यह देखे जाने की जरूरत होगी कि वह चौथे मोर्चे मे शामिल होते हैं या कांग्रेस के साथ कुछ सीटों पर तालमेल करते हैं. अमरिन्दर ङ्क्षसह से उनके पुराने रिश्ते हैं. बताते हैं कि आप के राज्य संयोजक पद से हटाए जाने के बाद उन्हें कांग्रेस से कुछ प्रस्ताव भी मिला है.

गांधी फोरम की बैठक में प्रस्ताव

आम आदमी पार्टी के निलम्बित नेता और पटियाला के सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी ने रविवार को जो सम्मलेन बुलाया, उसका परिदृश्य राउंड टेबुल कांफ्रेंस

जैसा था. इसमें छोटेपुर के निकटतम सहयोगी एच एस कींगड़ा दिखे तो परगट सिंह ने अपनी निजी हैसियत से भाग लिया. बैठक में डेमोक्रेटिक स्वराज पार्टी के वरिष्ठ नेता प्रो. मनजीत सिंह समेत पार्टी के अनेक प्रतिनिधियों ने भी इसमें शिरकत की. इस विचार-विमर्श में अमृतसर में आप से अलग हुए लोगों और अपना पंजाब पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी सहभागिता निभाई.

हालांकि, इसमें मुख्य धारा की पार्टियों सीपीआई, सीपीएम अथवा तो बसपा के किसी प्रतिनिधि ने भाग नहीं लिया. तीन-चार घंटे तक लम्बी चली कांफ्रेंस के बाद गांधी ने भाग लेने वाले प्रतिनिधियों से मिले प्रस्तावों को पढ़ा. इन प्रस्तावों में पंजाब के लम्बित पड़े मुद्दों-जैसे कि पंजाब की खुद की राजधानी, पंजाबी भाषी क्षेत्रों का विलय, नदियों के पानी समेत पंजाब के संसाधनों पर खुद का अधिकार, आदि पर काम करने वाले प्रस्ताव थे.

एक अन्य प्रस्ताव पंजाबी समाज से लिंग और जाति के भेदभाव को खत्म किए जाने वाला भी था. इस सम्मेलन में सभी तरह के मुद्दों जैसे आर्थिक, सामाजिक और अन्य तरह के मुद्दों को हल किए जाने का प्रस्ताव था तो कृषि संकट, बेरोजगारी, ड्रग, स्वास्थ्य, शिक्षा, उद्योग आदि की समस्या दूर करने के लिए वैज्ञानिक और आधुनिक तकनीकि से काम करने पर सहमति बनी. यह भी तय किया गया कि विजन डॉक्यूमेन्ट तैयार करने के लिए चुनिन्दा लोगों की एक समिति बनाई जाए। इस विजन डॉक्यूमेन्ट को सम्मेलन के बाद जारी किया जाएगा.

सिर्फ एकैडमिक एक्सरसाइज जैसा?

इस तरह की मांगे व्यक्तिगत स्तर लोगों द्वारा उठाई गईं हैं ताकि उनका प्रभाव दिखे. पर देखे जाने की जरूरत तो यह है कि क्या ये लोग एकजुट होकर राजनीतिक गठबंधन बना सकेंगे, जबकि आने वाले विधान सभा चुनावों में तीन खिलाड़ी और भी मैदान में हैं और क्या उन्हें पर्याप्त सीटें भी मिल सकेंगी कि वे इन मुद्दों को पूरा कराने के लिए सरकार पर दबाव डाल सकेंगे?

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक जगतार सिंह कहते हैं कि इतने कम समय में चुनाव की तैयारी करना आसान काम नहीं है. पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम तो सही प्रत्याशियों का चयन करना है. इसके लिए बूथ स्तर तक ढांचा तैयार करना होगा. यह व्यावहारिक समस्याएं हैं. विजन पेपर्स तैयार करना व्यावहारिक राजनीति से पूरी तरह अलग है. पहला कदम तो, इसके लिए पक्की सड़क बनानी होगी.

चौथा मोर्चा चुनाव के लिए समय पर उतरेगा, अभी यह देखा जाना बाकी है. अन्यथा यह सब कवायद व्यावहारिक राजनीति की एक अन्य एकाडमिक एक्सरसाइज ही साबित होगी.

First published: 28 September 2016, 2:16 IST
 
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