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नैनीताल: जंगल-शहर का अंतर मिटाते ये जानवर बने चिंता का सबब

राजीव खन्ना | Updated on: 3 August 2016, 8:27 IST
QUICK PILL
  • पिछले एक महीनों के दौरान नैनीताल के रिहायशी इलाकों में जंगली जानवरों के घुसने की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है. 
  • नैनीताल जंगलों से घिरा हुआ है और इन दिनों जानवरों का शहर में निकल आना चिंता का विषय बना हुआ है. 

उस वक्त आपको कैसा एहसास होगा जब आप किसी होटल में चेक इन कर रहे हो और आपसे यह पूछा जाए कि आप अपने कमरे में भालू या तेंदुआ में किसे देखना चाहेंगे? नैनीताल में इन दिनों यह मजाक का विषय बना हुआ है. नैनीताल जंगलों से घिरा हुआ है और इन दिनों जानवरों का शहर में निकल आना चिंता का विषय बना हुआ है. 

पिछले 20 दिनों के दौरान ऐसे कई वाकये सामने आए हैं. एक भालू ने पिछले दिनों होटल की खिड़की का शीशा तोड़ने की कोशिश की. वहीं एक दूसरे होटल में तेंदुआ एक कमरे के बाथरूम में घुस गया.

हाल ही में सुमित राठौड़ और शिवानी की शादी हुई है. दोनों अपने परिवार के साथ नैनीताल के तल्लीताल होटल में रुके हुए थे. जब यह दोनों नींद में थे तब एक तेंदुआ उनके कमरे में घुस गया. तेंदुआ तड़के सुबह होटल की खिड़की का शीशा तोड़कर घुसा था.

ऐसा माना जा रहा है कि कुत्ते तेंदुए का पीछा कर रहे थे. तेंदुआ दंपति के बिस्तर तक जा पहुंचा और उनके ऊपर पड़े कंबल को खींच दिया. तेंदुए को कमरे में देखकर दोनों की चीख निकल गई और फिर वह बाथरुम में जा घुसा. सुमित ने फिर तुरंत दिमाग दौड़ाया और बाथरुम के दरवाजे को बंद कर दिया. 

इसके बाद उन्होंने होटल के कर्मचारियों को फोन किया और फिर उन्होंने पुलिस और स्थानीय चिड़ियाघर के अधिकारियों को इत्तेला दी. इस दौरान होटल के बाहर स्थानीय लोगों की भीड़ जमा हो गई. लेकिन तेंदुआ तब तक खिड़की का शीशा तोड़कर भागने में सफल रहा.

10 जुलाई को शहर के लोगों को पता चला कि हिमालयी चीतल एक झील में तैर रहा है. स्थानीय लोगों ने कहा कि  चीतल ने होटल में घुसने की कोशिश की. लेकिन इस दौरान उसके जबड़े में चोट लग गई और फिर उसके बाद उसके पीछे कुत्ते लग गए. भयभीत जानवर फिर झील में कूद गया.

समझा जाता है  कि भालू लडिया के जंगल से नैनीताल में घुसा था.

उत्तराखंड के मैदानी इलाको में जंगलों से हाथियों और तेंदुओं का घुसना आम बात है.

उत्तराखंड के मैदानी इलाको में जंगलों से हाथियों और तेंदुओं का घुसना आम बात है. यहां भालुओं का देखा जाना भी आम है. वहीं ग्रामीण इलाकों में भालू और तेंदुए के हमले की खबर आती रहती हैं. 

शहर में बच्चों और वृद्ध लोगों पर हमले की खबर आम हो चुकी है. स्थानीय होटल मालिक कमल जगती ने कैच न्यूज को बताया, 'हमने होटल चलाने वाले लोगों से चमकने वाला शीशा हटाने के लिए कहा है. जानवर इसकी चमक को देखकर हमला कर देते हैं और फिर जब वह इसे तोड़ने की कोशिश करते हैं तो उन्हें चोट लगती है.'

कुछ महीनों पहले स्थानीय लोगों ने लगभग हर दिन डीएसबी कॉलेज के रास्ते पर तेंदुए को टहलते देखा. उत्तराखंड वन निगम के सेवानिवृत्त वन अधिकारी विनोद पांडे इस पूरे मामले को बड़े संदर्भ में देखते हैं. उन्होंने कहा कि अब जंगल की संकल्पना को बदलने की जरूरत है.

पांडे ने कहा, 'आपको चिपको आंदोलन से बहुत पीछे जाना होगा. उस वक्त जंगल को खतरनाक और रहस्यमय अंधेरे की तरह देखा जाता था. जंगली जानवरों को तब खतरनाक समझा जाता था.' उन्होंने कहा, 'यह गलत बात है कि चिपको आंदोलन केवल पेड़ों को बचाने का आंदोलन था. यह इस बात पर आधारित था कि जंगल स्थानीय लोगोें की आजीविका का आधार है जो बड़े क्षेत्र में फैला होता था. अब चिपको आंदोलन की पूरी धारणा को खत्म किया जा चुका है. जंगल का मतलब केवल पेड़ नहीं होते हैं. यह अपने आप में एक इकोलॉजी होती है जिसमें जानवर और पेड़ों को अन्योन्याश्रय संबंध होता है. चिपको आंदोलन के बाद बुद्धिजीवियों को इसे लोगों को बताना था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.'

पांडे बताते हैं कि विकास के नाम पर जंगलों के पारिस्थितिकी पर पड़ने वाले असर का परवाह किए बिना अंधाधुंध सड़कें  बनाई गई.

उन्होंने कहा कि नैनीताल के आस पास के इलाकों में झाड़ियों ने जंगल की जगह ले ली है. बाहर के लोगों को लगता है कि यह जंगल है. यह कई किलोमीटर में फैला हुआ है. हमें स्थानीय लोगों ने बताया कि भालू और गोराल उनकी फसलों को तबाह कर रहे हैं और यह पहले कभी नहीं देखा गया. इसलिए हमें जंगल और उसकी अवधारणा को लेकर तत्काल विचार करने की जरूरत है.

जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक रिहायशी इलाकों में जंगली जानवरों के घुसने की घटनाएं सामने आती रहेंगी.

First published: 3 August 2016, 8:27 IST
 
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