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हर-हर मोदी से मोदी मुर्दाबाद तक, हनीमून समाप्त

पाणिनि आनंद | Updated on: 25 January 2016, 8:44 IST
QUICK PILL
  • अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा के मद्देनजर सियासी जमीन तैयार करने पीएम मोदी ने लखनऊ और वाराणसी का दौरा किया लेकिन उन्हें विरोध-प्रदर्शन का सामना करना पड़ा.
  • राजधानी लखनऊ के सबसे प्रमुख चौराहे, हज़रतगंज में छात्रों के एक समूह \r\nने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ़ प्रदर्शन किया, उन्हें काले झंडे दिखाए और मोदी \r\nमुर्दाबाद के नारे लगाए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुक्रवार को अपनी उत्तर प्रदेश यात्रा पर थे. उन्होंने शुरुआत अपने संसदीय क्षेत्र बनारस से की. मोदी जिस वक्त बनारस के लिए रवाना हो रहे थे, उनकी निगाहें जिस एक बात पर टिकी थी, वो थी उत्तर प्रदेश के लिए अपनी ज़मीन तैयार करना. इसीलिए मोदी बनारस भी गए और फिर सूबे की राजधानी लखनऊ भी.

ऐसा अनायास ही नहीं हुआ है कि मोदी को उत्तर प्रदेश याद आ गया है. अब से एक साल बाद वो इसी सूबे के मैदानों, इलाकों में जनसभाओं को संबोधित करते हुए अपनी पार्टी के लिए वोट मांग रहे होंगे. सूबे में समाजवादी पार्टी की सरकार है. एक लंबे अरसे से पार्टी की सीटें विधानसभा में कम ही होती गई हैं.

हालांकि मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश से भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 73 सीटें जीतकर इतिहास रचा था. लेकिन 2014 से अबतक गंगा में काफी पानी बह चुका है. मोदी जब 2014 में उत्तर प्रदेश की ज़मीन पर वोट मांगने पहुंचे थे तो हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा जादू की तरह दिमागों और ज़बानों पर चढ़ा हुआ था. शुक्रवार को मोदी जब लखनऊ पहुंचे, तब तक मोदी-मोदी का जादू नरेंद्र मोदी वापस जाओ की कड़वी सच्चाई में तब्दील हो चुका था.

रोहित की आत्महत्या का मामला पीएम मोदी के भाषण के दौरान विरोध की प्रमुख वजह बना

मोदी लखनऊ स्थित काल्विन कॉलेज में ई-रिक्शा बांटने पहुंचे थे. वहां परिसर के बाहर समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस बात पर कड़ा विरोध दर्ज किया कि लोगों को मेक इन इंडिया का नारा देने वाले प्रधानमंत्री चीन का माल बांटने आए हैं. इसे लेकर कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किया.

राजधानी लखनऊ के सबसे प्रमुख चौराहे, हज़रतगंज में भी छात्रों के एक समूह ने प्रधानमंत्री के खिलाफ़ प्रदर्शन किया, उन्हें काले झंडे दिखाए और मोदी मुर्दाबाद के नारे लगाए. रही-सही कसर बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय में पूरी हो गई. वहां मोदी जैसे ही भाषण देने के लिए पोडियम पर आए, नरेंद्र मोदी वापस जाओ, नरेंद्र मोदी मुर्दाबाद और इंक़लाब ज़िदाबाद के नारे गूंजने लगे.

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विश्वविद्यालय के कितने ही छात्रों को उस दिन कार्यक्रम में शामिल नहीं होने दिया गया था. जबकि भाजपा के आनुषांगिक संगठनों के कार्यकर्ता और युवा वहां घूम रहे थे. इसे लेकर भी छात्रों में काफी रोष था. हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित की आत्महत्या का मामला मोदी के भाषण के दौरान विरोध की प्रमुख वजह बना.

मोदी के पक्ष में जो नारे लगे वो उनके अपने लोग लगा रहे थे. उनके नारे जय श्री राम और रामलला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे जैसे थे. इससे उलट लोगों के नारे विरोध, खिन्नता और गुस्से के थे. मोदी के लोग भी मोदी के साथ खड़े कम, उनसे मांगते ज़्यादा नज़र आ रहे हैं. और वे जो मांग रहे हैं, मोदी के लिए उसे दे पाना आसान नहीं है. मोदी के लिए न तो मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा दोहरा पाना संभव है और न ही जय श्री राम का उद्घोष.

पीएम मोदी से अपेक्षाएं जितनी अधिक थीं, उनके टूटने का दर्द भी उतना ही अधिक है

बल्कि ऐसा करने की स्थिति में उनके सामने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों से लेकर कई सामाजिक और राजनीतिक मोर्चों पर संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी. इस संकट को खुद पैदा करना और उसे पनपने देने का जोखिम मोदी फिलहाल नहीं उठा सकते, भले ही यह उनके और संघ के व्यापक एजेंडे का मूल तत्व ही क्यों न हो.

तो ऐसा क्या हुआ है कि हर-हर मोदी, घर-घर मोदी का नारा लगाने वाले लोग और मोदी को सिर आंखों पर बैठाने वाला जनमानस अब तेवर और भाषा में बागी दिखने लगा है. क्या यह मोदी के जादू के टूटने का संकेत है. क्या उत्तर प्रदेश की जनता मोदी से मोहभंग की स्थिति तक आ गई है. क्या मोदी का जयघोष करने वाले लोग अब उनकी पादुकाएं अपने सिर पर और नहीं रखना चाहते.

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दरअसल, मोदी से अपेक्षाएं जितनी अधिक थीं, उनके टूटने का दर्द भी उतना ही अधिक है. भाजपा के पारंपरिक वोटर राम की आस जोह रहे हैं. नया उत्साहित मध्यवर्ग माया की बाट जोहता है. न माया मिली है और न राम. संगठन के रूप में भाजपा कि छवि एक उग्र आंदोलन की है जो कि विकास और प्रगति जैसे शब्दों के सापेक्ष नहीं जाती. ऊपर से कठोर हिंदुत्व के मठ में भी सेवक कम और महंत ज्यादा वाली स्थिति है.

मोदी को इस वस्तुस्थिति का अंदाज़ा है. उन्हें 2015 के दो विधानसभा चुनावों में इसकी बानगी भी मिल चुकी है. लेकिन उत्तर प्रदेश का चुनाव वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल है. मोदी के लिए यह सेमीफाइनल जीतना बहुत ज़रूरी है और इसलिए अगले एक वर्ष तक मोदी के एजेंडे पर उत्तर प्रदेश लगातार बना रहेगा.

संकट यह है कि सूबे में सूखती ज़मीन पर मोदी अपनी करनी के कितने पौधे रोप पाएंगे और उनके सहारे सत्ता की कितनी छांव उन्हें मिलेगी, यह अब संशय दिखने लगा है. मोदी का उत्तर प्रदेश की ज़मीन पर मंगलाचरण अच्छा नहीं रहा है. आगे आगे देखिए, होता है क्या.

First published: 25 January 2016, 8:44 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

Senior Assistant Editor at Catch, Panini is a poet, singer, cook, painter, commentator, traveller and photographer who has worked as reporter, producer and editor for organizations including BBC, Outlook and Rajya Sabha TV. An IIMC-New Delhi alumni who comes from Rae Bareli of UP, Panini is fond of the Ghats of Varanasi, Hindustani classical music, Awadhi biryani, Bob Marley and Pink Floyd, political talks and heritage walks. He has closely observed the mainstream national political parties, the Hindi belt politics along with many mass movements and campaigns in last two decades. He has experimented with many mass mediums: theatre, street plays and slum-based tabloids, wallpapers to online, TV, radio, photography and print.

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