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राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग: "क्रोनी कैपिटेलिज्म" को बढ़ावा दे रही है सरकार

जगदीप एस छोकर | Updated on: 8 April 2017, 9:54 IST


क्रोनी कैपिटेलिज्म शब्द का इस्तेमाल प्राय: किया जाता है और इस शब्द के अर्थ के बारे में एक सामान्य समझ भी लोगों में है. विकीपीडिया में इस शब्द की परिभाषा इस प्रकार से दी गई है : एक ऐसी अर्थव्यवस्था जिसमें किसी कारोबार में सफलता कारोबारी और सरकारी अधिकारियों के बीच करीबी संबंधों पर निर्भर करती है. इसको हम लीगल परमिट, सरकारी अनुदान, विशेष टैक्स छूट के वितरण में भेदभाव और सरकारी दखल के अन्य रूपों में पक्षपात के रूप में इस हद तक देख सकते हैं कि इससे जनसेवा के आर्थिक और राजनीतिक आदर्श भी भ्रष्ट हो जाते हैं.


जब क्रोनी कैपिटेलिज्म से जुड़े होने की बात आती है तो भारत कहीं इसमें पीछे नजर नहीं आता है. 2014 में दि इकनॉमिस्ट मैग्जीन ने एक क्रोनी कैपिटेलिज्म इंडेक्स जारी की थी, “जिसमें उसने ऐसे देशों की सूची दी थी जिनमें राजनीतिक संबंध संपन्न कारोबारियों के समृद्ध होते जाने की संभावना सबसे अधिक थी.” इस विश्लेषण में शामिल 23 देशों में भारत का स्थान नौवें नंबर पर था।

 

बजट 2017 और क्रोनी कैपिटेलिज्म

 

क्रोनी कैपिटेलिज्म का मूल है कारोबार और राजनीति में एक गठजोड़. बजट 2017 सरकार की तरफ से उठाया गया वह सबसे महत्वपूर्ण सरकारी कदम है जिससे कारोबारी अथवा कॉरपोरेट तथा राजनीतिक दलों के बीच करीबी संबंधों को पनपने में सहूलियत दी गई है. ऐसा क्यों कहा गया है इसको समझाने के लिए बजट की कुछ मुख्य बातों को नीचे विवेचन किया गया है. 1 फरवरी को बजट आने के बाद से ही ये बिंदु पब्लिक डोमेन में चर्चा का विषय बने रहे हैं.

ये सब उन दो पैराग्राफ से शुरू हुआ जो कि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण के दौरान “चुनावी वित्तपोषण में पारदर्शिता” नाम के उदात्त शीर्षक के साथ पढ़े थे:

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. हमारी बहुदलीय संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में राजनीतिक दल इसके अनिवार्य घटक होते हैं. स्वतंत्रता के 70 वर्षों बाद भी देश में आज तक राजनीतिक दलों की फंडिंग के ऐसे पादर्शी तरीके विकसित नहीं किए जा सके जो कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराए जाने के लिए बेहद जरूरी हैं. निजी व्यक्तियों, साझेदारी फर्मों, हिंदू अविभाजित परिवारों और कंपनियों को राजनीतिक चंदा देने को प्रोत्साहित करने के लिए इसके पहले किए गए प्रयास में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, कंपनी अधिनियम और आयकर अधिनियम में संशोधन किया गया था.

अगर खातों को पारदर्शी तरीके से बनाया गया हो और सक्षम अधिकारी के समक्ष रिटर्न फाइल किया गया हो तो दाता और ग्राहक दोनों को ही कर अदायगी में छूट दी गई थी. साथ ही राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों की सूची बनाकर रखना भी अनिवार्य किया गया था जिन्होंने 20 हजार रुपये से अधिक का चंदा राजनीतिक दलों को चैक अथवा नकद में दिया हो. इन प्रावधानों के बाद भी स्थिति में आंशिक सुधार ही हुआ है. राजनीतिक दल अब भी अपना अधिकांश चंदा अज्ञात दाताओं से नकद में प्राप्त कर रही हैं.

इसलिए राजनीतिक चंदा प्रणाली को साफ सुथरा बनाने की दिशा में प्रयास करने की जरूरत है. दान दाताओं ने भी चेक और दूसरे पारदर्शी साधनों से चंदा देने में हिचकिचाहट दिखाई है, क्योंकि इससे उनकी पहचान उजागर होती है और इसके प्रतिकूल परिणाम हो सकते हैं. इसलिए मैं यहां राजनीतिक दलों के चंदा देने की प्रणाली को ठीक करने के लिए निम्न योजना पेश कर रहा हूं.

1. चुनाव आयोग द्वारा दिए गए सुझाव अनुसार कोई एक राजनीतिक दल किसी एक व्यक्ति से अधिकतम नकद चंदा अब 2000 रुपये से अधिक प्राप्त नहीं कर सकता.

2. राजनीतिक दल अब दानदाताओं से चंदा चैक अथवा डिजिटल माध्यम से प्राप्त कर सकेंगी.
3. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया अधिनियम में एक ऐसा संशोधन प्रस्तावित है जिससे कि वह सरकार द्वारा इस संबंध भविष्य में बनाई गई योजना के अनुसार चुनावी बांड जारी कर सके. इस योजना में दानदाता सिर्फ डिजिटल माध्यमों या चेक से ही अधिकृत बैंकों से बांड खरीद सकेगा. ये बांड केवल किसी पंजीकृत राजनीतिक दल के निर्दिष्ट खाते में ही भुगतान रूप में परिणत हो सकेंगे. इन बांडों को जारी होने के बाद इनको भुगतान रूप में बदलने के लिए एक निश्चित समय सीमा तय होगी.
4. प्रत्येक राजनीतिक दल को आयकर अधिनियम के तहत दिए गए समय में अपना रिटर्न फाइल करना होगा. यह बताना अनावश्यक है कि राजनीतिक दलों को आयकर में दी गई छूटें तभी मिल पाएंगी जबकि वे इन शर्तों को पूरा करेंगे. इस सुधार से राजनीतिक चंदे में अधिक पारदर्शिता तथा जवाबदेही आ सकेगी और साथ ही काले धन का पैदा होना भी इससे रुकेगा.”

 

वित्त बिल को लाना

 

इसके बाद वित्त बिल 2017 को सदन में पेश किया गया, जिससे बजट भाषण में की गई घोषणाओं को पूरा किया जा सके. बजट प्रस्तावों को क्रियान्वित करने के लिए वित्त बिल में कई कानूनों में संशोधन करने की दिशा में ठोस और निर्दिष्ट प्रस्ताव किए गए हैं. इन प्रस्तावों के विस्तृत अध्ययन से निम्न प्रकार के संकेत मिलते हैं:

 

 

 

1. राजनीतिक चंदे में नकद की लिमिट को 20,000 हजार से घटाकर 2 हजार किए जाने का कतई कोई अर्थ नहीं है. (http://www.firstpost.com/politics/union-budget-2017-18-why-arun-jaitleys-big-political-funding-reform-is-just-an-eye-wash-3269382.html). यह आयकर अधिनियम तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में प्रस्तावित उन संशोधनों से भी स्पष्ट है जो कि फाइनेंस बिल 2017 में दिए गए हैं.


जिस इलेक्टोरल बॉन्ड का इतना हाइप बनाया गया उसके रहस्य से यद्यपि पर्दा उठना अभी शेष है पर इसके बारे में कुछ जानकारी वित्त मंत्री ने बजट के बाद मीडिया के साथ अपनी रस्मी बातचीत में दी थी.

(http://indianexpress.com/article/business/budget/present-system-has-failed-we-are-experimenting-with-a-new-system-says-arun-jaitley-4503411/).

वित्त मंत्री ने इलेक्ट्रॉरल बॉन्ड के बारे में पूछे गए प्रश्न के बारे में यह जवाब दिया :

इलेक्टोरल बॉन्ड के बारे में जो प्रावधान किया गया है उसके लिए आरबीआई अधिनियम में एक संशोधन की जरूरत होगी. अधिसूचित बैंकों को यह बॉन्ड जारी करने का हक होगा. कोई भी दानदाता चैक या डिजिटल माध्यमों का उपयोग कर ये बॉन्ड खरीद सकता है. ये बॉन्ड राजनीतिक दलों को दिए जा सकते हैं. प्रत्येक मान्य राजनीतिक दल को अपने एक बैंक खाते की जानकारी पहले ही चुनाव आयोग को देनी होगी और ये बॉन्ड केवल उसी बैंक खाते में ही भुगतान हो सकेंगे. दानदाता की पहचान उजागर न हो [जोर हमारी तरफ से दिया गय है] इसलिए ये बॉन्ड अपने चरित्र में बीयरर यानी धारक स्वभाव के होंगे.

उपर दिये गए स्पष्टीकरण को आयकर अधिनियम के सेक्शन 13ए में किए गए संशोधन और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के सेक्शन 29 में किए गए संशोधन से पूरा समर्थन मिलता है. ये संशोधन यह सुनिश्चित करते हैं कि इलेक्ट्रॉरल बॉन्ड से दानदाता की पहचान गुप्त बनी रहेगी.

 

 

 

 

करीबी से और करीबी बनना

 


क्रोनी कैपिटेलिज्म को सहूलियत देने का काम वित्त बिल 2017 तक ही सीमित नहीं रहा. सबसे बेहतर या सबसे खराब तो अभी आना शेष था. यह 20 मार्च को उस समय आया जब वित्त मंत्री ने वित्त बिल में एक संशोधन का नोटिस संसद में दिया.


जो 40 संशोधन इसमें जोड़े गए,उनमें क्रोनी कैपिटेलिज्म को बढ़ाने की दिशा में दो संशोधन खास रहे. पहले में यह पाबंदी हटा दी गई कि कोई कंपनी अपने लाभ का कितना प्रतिशत किसी राजनीतिक दल को चंदे में दे सकती है. सबसे पहले यह लिमिट 5 प्रतिशत थी जिसे बढ़ाकर 7.5 प्रतिशत किया गया था और वित्त बिल 2017 में यह लिमिट पूरी तरह से हटा दी गई. यह कंपनी अधिनियम 2013 में सेक्शन 182 के उप—सेक्शन (1) के दिए गए प्रावधान को हटाकर किया गया.

दूसरा संशोधन इससे भी रोचक है. कंपनी अधिनियम 2013 के सेक्शन 182 के सब—सेक्शन (3) में यह प्रावधान था कि जो भी कंपनी किसी राजनीतिक दल को चंदा दे रही है उसे अपने प्रॉफिट एंड लॉस एकाउंट में चंदे में दी गई राशि बताने के साथ उस दल का नाम भी बताना होगा जिस दल को यह चंदा दिया गया. वित्त बिल में संशोधन के नोटिस के माध्यम से राजनीतिक दल का नाम बताने की अनिवार्यता हटा दी गई है. अब किसी भी राजनीतिक दल को चंदा देने वाली कंपनी के लिए राजनीतिक दल का नाम बताने की अनिवार्यता पूरी तरह से हटा दी गई है.

यहां जिन कदमों का विवरण ऊपर दिया गया है उन सबको साथ लिया जाए तो अब कोई भी कंपनी किसी भी राजनीतिक दल को कितना भी पैसा दे सकती है और किसी को भी यह पता नहीं लगेगा कि किसने किसको कितना पैसा दिया. किसी बिजनेस कॉरपोरेशन और राजनीतिक दलों के बीच करीबी या सहयोगी संबंध स्थापित करने की दिशा में सहूलियत देने का यह सबसे प्रभावशाली तरीका है.

तय मानिए कि इकनॉमिस्ट मैग्जीन के क्रॅोनी कैपिटेलिज्म इंडेक्स में भारत ऊपर उठने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. ऐसा किसने कहा है कि भारत ऊपर नहीं उठ रहा?

 

 

 

First published: 8 April 2017, 9:54 IST
 
जगदीप एस छोकर @CatchNews

Jagdeep S. Chhokar is a former professor, Dean, and Director In-charge at IIM, Ahmedabad. Views are personal.

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