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ग्रेटर कश्मीर के बाद जम्मू-कश्मीर सरकार का अब कश्मीर रीडर पर प्रतिबंध

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 October 2016, 7:36 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्थानीय मीडिया-प्रेस पर प्रतिबंधों का सिलसिला जारी रखा है. इस बार राज्य सरकार ने स्थानीय अखबार कश्मीर रीडर के प्रकाशन पर रोक लगा दी है.
  • मजिस्ट्रेट ने सुनवाई में कहा कि अखबार में जो कुछ छपता है, उसे पढ़कर जम्मू-कश्मीर, खास तौर पर श्रीनगर जिले में असानी से हिंसक वारदातें भड़क सकती हैं. प्रिंटर, प्रकाशक और कश्मीर रीडर के मालिक अगला आदेश आने तक अखबार की प्रिंटिंग और प्रकाशन नहीं करें.

लगातार जारी कश्मीर संकट के बीच जम्मू-कश्मीर सरकार ने स्थानीय मीडिया-प्रेस पर प्रतिबंध लगाने का सिलसिला जारी रखा है. इस बार राज्य सरकार ने स्थानीय अखबार कश्मीर रीडर के प्रकाशन पर रोक लगा दी है. सरकार का मानना है कि इससे राज्य की शांति को खतरा है.

रात 8 बजकर 15 मिनट पर पांच पुलिसकर्मी श्रीनगर के बटमालू स्थित कश्मीर रीडर के दफ्तर गए और अखबार पर प्रतिबंध लगाने का ऑर्डर थमा दिया.

कश्मीर रीडर के संपादक मीर हिलाल ने फेसबुक पर लिखा, 'आदेश में कहा गया है, जेंटलमैन, सरकार ने हमें निर्देश दिए हैं कि अगले आदेश तक कश्मीर रीडर का प्रकाशन रोक दिया जाए. इस अखबार में छपने वाली सामग्री से हिंसा भड़क सकती है और शांति भंग होने की आशंका है.'

प्रतिबंध

श्रीनगर जिला मजिस्ट्रेट फारुक अहमद लोन द्वारा पारित आदेश में कहा गया है कि विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, कश्मीर रीडर शीर्षक से श्रीनगर में प्रकाशित हो रहे अखबार में ऐसी सामग्री छप रही है, जिससे हिंसा भड़कने और शांति भंग होने का डर है. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि शांति बनाए रखने के लिए आवश्यक प्रयासों के तहत ऐसा करना जरूरी हो गया है.

आदेश में यह भी कहा गया कि अखबार में जो कुछ छपता है, उसे पढ़कर जम्मू-कश्मीर, खास तौर पर श्रीनगर जिले में असानी से हिंसक वारदातें भड़क सकती हैं.

लोन ने कहा,‘ऐसे पर्याप्त आधार मौजूद हैं, जिनके चलते मुझे समाचार पत्र अपराधों के प्रोत्साहन अधिनियम 1971 की धारा 3, आपराधिक दंड संहिता की धारा 144 और प्रेस व प्रकाशन अधिनियम 1989 की धारा 10 के तहत प्राप्त अधिकारों का उपयोग करना पड़ा और उक्त अखबार की प्रिंटिंग और प्रकाशन रोकने का सशर्त आदेश पारित किया.’

आदेश में कहा गया है कि प्रिंटर, प्रकाशक और कश्मीर रीडर के मालिक अगला आदेश आने तक अखबार की प्रिंटिंग और प्रकाशन नहीं करें.

आदेश में यह भी कहा गया ‘ध्यान रहे, अगर आदेश की पालना नहीं की गई तो डीसी को मजबूरन समाचार पत्र अपराध अधिनियम 1971 की धारा 3 और प्रेस व प्रकाशन अधिनियम 1989 के तहत प्रिंटिंग प्रेस और इस काम मे आने वाली सम्पत्तियों पर भी जुर्माना लगाया जा सकता है. हालांकि आदेश में किसी खास रिपोर्ट का उल्लेख नहीं किया गया है जिस वजह से यह कड़ा कदम उठाया गया है.

प्रेस के साथ पहले भी

इससे पहले जुलाई में दो सप्ताह तक चली अशांति के बीच राज्य सरकार ने आधी रात को श्रीनगर के अखबारों को जब्त कर लिया और उन्हें बांटने नहीं दिया गया. राज्य के सबसे बड़े अखबार ग्रेटर कश्मीर के कॉर्पोरेट ऑफिस में करीब बीस पुलिसकर्मी घुस गए और इस अंग्रेजी दैनिक की प्लेटें उठा कर ले गए. साथ ही इसके उर्दू एडिशन कश्मीर उज्मा की 50,000 कॉपियां जब्त कर लीं गईं थी.

पुलिस ने अखबार के प्रेस फोरमैन बीजू चौधरी व दो अन्य कर्मचारियों को भी गिरफ्तार कर लिया और वहां मौजूद स्टाफ के साथ बदतमीजी की. उसी वक्त पुलिस ने कश्मीर रीडर की प्रिंटिंग प्रेस पर छापा मारा और अखबार बांटने से रोक दिया. इसके अलावा राइजिंग कश्मीर, कश्मीर ऑब्जर्वर और अन्य इंग्लिश व उर्दू दैनिक भी रोक लिए गए.

सरकार की हीलाहवाली

विडम्बना यह है कि राज्य सरकार ने प्रतिबंध लगने के तीन दिन बाद भी इस ओर ध्यान नहीं दिया. पीडीपी के वरिष्ठ नेता और  पूर्व उपमुख्यमंत्री मुजफ्फर हुसैन बेग और मुख्यमंत्री के सलाहकार अमिताभ मट्टू ने कुछ टीवी चैनलों को दिए साक्षात्कारों मे इस बारे में कोई भी जानकारी होने से इनकार कर दिया.

हालांकि इस बार सरकार ने कश्मीर रीडर पर प्रतिबंध लगाने की बात स्वीकारी है. यह अखबार तीन साल पहले ही शुरू हुआ है और तभी से राज्य में मानवाधिकार हनन की संदिग्ध कवरेज करता आया है.

रविवार को अखबार ने एक 18 वर्षीय युवक मुजफ्फर अहमद पंडित की मौत पर लीड स्टोरी छापी है,जिसकी मौत 15 सितम्बर को पैलेट गन से हुई थी. खबर का इंट्रो कुछ इस प्रकार है-

‘बडगाम जिले के नरबल के पास चक-ए-कावूसा गांव में एक बूढ़ा आदमी लाठी लेकर चल रहा है. उसके पोते का अंतिम संस्कार हो रहा है. गुला कादिर शेख की आखों से आंसू बह रहे हैं और वह अपने पोते मुजफ्फर अहमद पंडित की एक झलक पाने के लिए परेशान हो रहा है. उसके ताबूत पर टॉफियां रखी जा रही हैं और औरतें रो रही हैं.’

विद्रोह

अखबार पर प्रतिबंध का सोशल मीडिया में काफी विरोध हुआ. इमरान डार ने लिखा- ‘भयावह, कश्मीर रीडर को बैन करने से गलत परम्परा की शुरुआत होगी. क्या जेके पीडीपी के पास इससे बेहतर ‘समाधान’ नहीं है.

मुहम्मद उजैर ने ट्वीट किया, ‘भारतीय लोकतंत्र अपना काम कर रहा है’, संभवतः यह मुफ्ती साहब के विजन का हिस्सा हो.

हरसरण सिंह ने ट्वीट किया ‘नाकारा सरकार की निशानी और खुद को उबारने की अंतिम कोशिश. इसी प्रकार फेसबुक पर इस मसले पर खूब बहस चली और घाटी के दूसरे अखबारों का आह्वान किया गया कि वे विरोध में उतरें.

फेसबुक पर पत्रकार सईद मलिक ने कहा, क्या मीडियाकर्मी सामूहिक रूप से इस बैन का विरोध करेंगे? यह एकजुट होने का वक्त है.

First published: 4 October 2016, 7:36 IST
 
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