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गांधी महिमा जस की तस, मोदी की गरिमा ज़रूर कम हुई

रामचंद्र राही | Updated on: 15 January 2017, 8:25 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  •  30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की शहादत के बाद एक मुहिम के तहत गांधी स्मारक निधि की स्थापना की गई थी. इस संगठन के पहले ट्रस्टी और अध्यक्ष थे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद. अन्य न्यासियों में थे प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल, आचार्य कृपलानी, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और गोविंद वल्लभ पंत जैसे राजनीतिक दिग्गज.
  • गांधी के विचार और काम को आगे बढ़ाने के लिए इस संगठन को साधनों की ज़रूरत थी. संस्थापकों में देश के शीर्ष नेतृत्व की हस्तियां थीं. तब जितना धन चाहते, सरकार से इस संगठन के लिए लिया जा सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया गया.
  • राष्ट्रीय नेताओं ने तय किया कि गांधी का काम सरकार की बजाय सीधे समाज के सहयोग से चलना चाहिए. इन नेताओं ने गांधी स्मारक निधि को खड़ा करने के लिए मदद की अपील की और देशभर से चंदा, ज़मीन और मकान जैसे साधन जमा होने लगे.

गांधीजी की मृत्यु के बाद दिल्ली और पूरे देश में समाज के सहयोग से गांधी की विरासत को सहेजने की मुहिम सन 1948 में चल पड़ी थी. एक दिन दिल्ली के एक बैंक में एक महिला अपनी साड़ी के आंचल में कुछ सिक्के बांधकर दान करने पहुंचीं. (उन दिनों जगह-जगह बैंको में गांधी स्मारक निधि के लिए दान इकट्ठा करने के लिए एक डेस्क हुआ करती थी) 

महिला ने बैंककर्मियों को बताया कि वह मूंगफली बेचती हैं और अपनी आज की कमाई गांधी के नाम पर दान करने आई हैं. उनसे पूछा गया कि क्या उनके पास खाने के लिए पैसे बचे हैं? महिला ने कहा कि आज वह उपवास करेंगी. आज की कमाई सिर्फ़ गांधीजी के लिए.

गांधी स्मारक निधि के संग्रहालय में रखे दान में कुछ सिक्के उस महिला के भी हैं. (गांधी स्मारक निधि/कैच न्यूज़)

महात्मा गांधी को किसी सरकार ने अध्यादेश जारी कर राष्ट्रपिता घोषित नहीं किया था. गांधी लोगों के हृदय में बस गए थे, अपने समर्पण से, अपने चरित्र और आम आदमी के प्रति अपनी निष्ठा से. सत्य, अहिंसा पर आधारित समाज की रचना का जो मूल्य उन्होंने दिया था, इनके कारण वह इतने विराट हो गए.

उस महिला के दिए हुए सिक्के गांधी संग्रहालय में आज भी रखे हुए हैं. आज गांधी को अवरोध मानकर उन्हें हटाने की कुछ कोशिशें दिख रही हैं, हालांकि इस तरह की जितनी भी कोशिश होगी, गांधी उतने ही मज़बूत होते जाएंगे.

गांधी स्मारक निधि के सचिव रामचंद्र राही (शाहनवाज़ मलिक/कैच न्यूज़)

खादी ग्रामोद्योग के कैलेंडर से गांधी की तस्वीर हटाकर अपनी तस्वीर लगाने की जो कोशिश है, मुझे पता नहीं कि यह प्रधानमंत्री की इच्छा से हुआ है या फ़िर उनके समर्थकों ने अपने मन से अपने नेता को ग्लैमराइज़ कर उन्हें गांधी के बराबर की स्थित में पहुंचाने के लिए ऐसा किया है.

गांधी का चित्र किसी कैलेंडर से हटा देने का काम जिस किसी ने भी किया है, उससे गांधी की महिमा घटती-बढ़ती नहीं है. गांधी की जगह किसी और को महिमा मंडित करने के लिए दूसरे का चित्र लगा दिया जाए, तो इससे उसकी गरिमा में इज़ाफ़ा होता है, यह भी मुझे नहीं लगता. मेरी नज़र में यह पूरा प्रकरण अशोभनीय है.

गांधी का भारत

स्वराज आंदोलन के दौर में गांधी जिस राष्ट्र की अवधारणा प्रस्तुत कर रहे थे, उसी दौर में एक विचारधारा ऐसी भी थी जिसे गांधी के भारत की कल्पना पचती नहीं थी.

तब कांग्रेस भी एलीट यानी भद्र लोगों की पार्टी थी लेकिन गांधी ने उसे समाजोन्मुख बनाया. जिन लोगों की कोई सियासी हैसियत नहीं थी, गांधी ने उन्हें कांग्रेस में महत्वपूर्ण भूमिका दिलाई. मगर पार्टी का एलीट वर्ग जिनमें सामंत, पूंजीपति और जातिगत श्रेष्ठता रखने वालों को पार्टी के नेतृत्व में साधारण लोगों की हिस्सेदारी बर्दाश्त नहीं हुई.

कांग्रेस पार्टी का एलीट वर्ग वैसा ही शासन चाहता था, जिस तरह अंग्रेज़ भारत में अपनी हुक़ूमत चलाते थे. यह कांग्रेस की महत्वाकांक्षा थी. मगर गांधी ने जिस तरह से स्वराज आंदोलन को जन संघर्ष का रूप दिया, उससे अंग्रेज़ों की तर्ज़ पर देश का शासन चलाने का कांग्रेस का सपना छिन्न-भिन्न हो गया.

हत्या से ज्यादा मज़बूत हुए गांधी

स्वराज आंदोलन के लिए देश में जो व्यापक जनांदोलन हुए, उसमें कुलीन विचारधारा के लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रही. उसमें बहुत सारे लोग ऐसे भी थे जिन्होंने आंदोलन में भागीदारी की बजाय अंग्रेज़ों का समर्थन शुरू कर दिया था.

ऐसे लोगों को गांधी एक अवरोध के रूप में नज़र आने लगे थे. 30 जनवरी 1948 को उनकी हत्या उस अवरोध को हटाने का एक स्थूल प्रयास था. मगर उनके दुर्भाग्य से गांधी ख़त्म नहीं हुए बल्कि भारत और दुनिया में वो और ज्यादा मज़बूती के साथ स्थापित हो गए.

बिड़ला भवन में रखा गांधी का शव (गांधी स्मारक निधि/कैच न्यूज़)

ऐसे संगठन जिनमें गोपनियता होती है और जो नीति निर्धारण, चिंतन, रणनीति और निर्णायक भूमिका बनाने वाले अंगों के क्रियाकलापों में सक्रिय हैं, दुनिया उनसे परिचित है. समाज में ऐसे संगठनों की दोहरी भूमिका होती है और उसपर परदेदारी के लिए कोई ना कोई माध्यम चाहिए होता है और वैसा माध्यम कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति ही हो सकता है.

ऐसे संगठन के ना चाहने पर भी भारत 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद हो गया और देश ने माना कि आज़ादी गांधी के रास्ते से मिली. इस हासिल स्वराज में आमजन की भागीदारी थी.

तब कांग्रेस ने स्पष्टता से यह प्रस्ताव पास किया था कि जो आज़ादी हम हासिल करेंगे, वह कांग्रेस या किसी अन्य संस्था की न होकर आम जनता की आजादी होगी. इसी के बाद अपने देश में बालिग मताधिकार के आधार पर लोकतांत्रिक संविधान की रचना हुई और उसे देश ने स्वीकार किया.

सत्ता के लिए संविधान की शपथ ज़रूरी

राजघाट के क़रीब गांधी स्मारक निधि का परिसर (शाहनवाज़ मलिक/कैच न्यूज़)

अब किसी भी संगठन को राजनीति में शक्तिशाली होना है, सत्ता में आना है तो इस संविधान की शपथ लिए बिना बात नहीं बनती. संविधान के जो बुनियादी उसूल हैं, उन्हें अपनाने का मतलब होता है, अपने आप में भी बुनियादी तौर पर बदलाव लाना लेकिन वो ऐसा कर नहीं पाते. लिहाज़ा, वो ऊपरी तौर पर संविधान की शपथ खाते हैं और सत्ता में आने पर मनमानी करते हैं.

मगर ये लोग भूल जाते हैं कि जिस जनता ने इन लोगों को सत्ता सौंपी है, वही जनता इन्हें सत्ता से बाहर भी कर सकती है. सांप्रदायिक उन्माद पैदा करके या जुमलेबाज़ी से बहुत समय तक सत्ता पर काबिज़ रहना लोकतंत्र में संभव नहीं होता.

भारत की जनता नेताओं पर भरोसा करती है लेकिन उनकी कसौटी भी तय करती है. यह एक से अधिक बार भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सिद्ध हो चुका है. लिहाज़ा, इतिहास को बदलने के बदले आज के शासकों को इतिहास से सबक लेना चाहिए.

रामचंद्र राही गांधी स्मारक निधि के सचिव हैं. यह लेख उनसे कैच संवाददाता शाहनवाज़ मलिक की बातचीत पर आधारित है.

First published: 15 January 2017, 8:25 IST
 
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