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पत्रकारिता के इस दौर में गणेश शंकर विद्यार्थी को अधिक समझने की ज़रूरत है

हेमराज सिंह चौहान | Updated on: 25 March 2018, 15:00 IST
(गणेश शंकर विद्यार्थी )

आज के दिन साल 1931 को ऐसे पत्रकार की मौत हुई थी. जो जिंदगी भर हूकुमत के खिलाफ लिखता रहा. उसने अपने अखबार में हमेशा सवालों को जगह दी. वो जहां एक तरफ ब्रिटिश राज के खिलाफ अखबार के जरिए आजादी की अलग देशभर में जगा रहा था. वहीं दूसरी तरफ सांप्रदायिक ताकतों से लड़ रहा था.

इस वजह से वो दोनों तरफ के निशाने पर था. उसकी लेखनी दोनों तरह के लोगों को गुस्से से भर देती थी. इस वजह से उसके पांव कभी जेल में तो कभी अखबार में रहते थे. हम बात कर रहे गणेश शंकर विद्यार्थी को जो कानपुर से प्रताप नाम का अखबार निकालते थे.

इस अखबार ने उस दौर में पत्रकारिता के उच्च मानक स्थापित किए. जब तक ये अखबार चला इसमें छपने वाली साम्रगी से कोई समझौता नहीं होने दिया गया. ये अखबार लोगों की आवाज था जो उनकी बातें करता था. चाहे मुद्दे आजादी और अधिकारों के हों या फिर समाज में फैली कुरोतियों और आंडबर की हो. ये अखबार हर भारतीय का अखबार था. 

उन्होन प्रताप के संपादक के तौर पर करीब 18 सालों तक काम किया. वो 1919 से 1931 तक इस अखबार के संपादक रहे. उन्होंने संपादक के तौर पर ना कि सिर्फ इस अखबार में जनता और सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी बल्कि कई पत्रकारों को भी तैयार किया. 

गणेश शंकर विद्यार्थी की मौत भगत सिंह के तीन दिन बाद हुई थी. वो कुछ समय पहले ही जेल से बाहर आए थे. कानपुर इस समय हिंदू-मुस्लिम दंगो में दहल रहा था. पर वो इन दंगो में ऑफिस के रहने के बजाय ज्यादा समय सड़कों पर लोगों की मदद को भटकते रहते थे.

वो कभी हिंदू मुहल्लों में जाकर मुस्लिम शख्स की जान बचाते तो कभी मुस्लिम कस्बों में जाकर हिंदू की. सांप्रदायिकता के खिलाफ वो लगातार संघर्ष करते रहे. इसी बीच दंगो के दौरान किसी ने उनके शरीर को चाकू से गोंद दिया. इसमें उनकी मौत हो गई. कहा जाता है कि उनकी मौत के बाद उनकी अंतिम यात्रा में हिंदू-मुस्लिम दोनों लोगों तरफ के लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई. कहा तो यहां तक जाता है कि उनके बलिदान को देखते हुए उन्होंने भविष्य में कभी दंगे ना करने का प्रण लिया. 

प्रताप में छपे अंक का पृष्ठ

गणेश शंकर विद्यार्थी की हत्या सांप्रदायिक उन्माद में मात्र 41 साल की उम्र में हो गई. वो आज़ादी के दौरान में उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन के इतर जनआंदोलन भी खड़ा किया. पत्रकार के तौर पर उन्होंने समाज को संगठित करने और उनकी आवाज को अखबार के तौर पर एक मंच दिया.

आज के दौर में जब पत्रकारिता पर निशान उठ रहे हैं. सत्ता से संबधों की बात हो रही है. सवालों पर मानहानि के केस सहित बहिष्कार पत्रकार झेल रहे हैं. ऐसे में पत्रकारिता करने वालों के लिए गणेश शंकर ऐसे आदर्श हैं जो सीमित संसाधनों और विरोध के वाबजूद कैसे संघर्ष किया जाता है. इसकी सबको राह दिखाते हैं.

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First published: 25 March 2018, 13:43 IST
 
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