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सैयद अली शाह गिलानी के नाती को सरकारी पद और कश्मीर में चल रही मिलीभगत

रेयाज़ उर रहमान | Updated on: 15 March 2017, 8:21 IST

हाल ही एक प्रमुख दैनिक अखबार में छपी खबर ने कश्मीर के आम आवाम से लेकर सोशल मीडिया में खलबली मचा दी है लेकिन स्थानीय अखबारों ने जानबूझ कर शायद इस खबर को तवज्जो नहीं दी. यहां तक कि ज्यादातर राष्ट्रीय अखबारों ने भी इसकी अनदेखी कर दी. लेकिन इससे उठे सवालों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. फेसबुक पर भले ही यह मामला ठंडा पड़ गया हो, लेकिन आपसी बातचीत में यह चर्चा का विषय बना हुआ है.

खबर यह है कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सर्वेसर्वा सैयद अली शाह गिलानी के नाती अनीस-उल-इस्लाम को जम्मू-कश्मीर सरकार के पर्यटन विभाग में शोध अधिकारी के पद पर नियुक्त किया गया है. कहा जा रहा है कि उन्हें सालाना 12 लाख रुपए का पैकेज दिया गया है.

परन्तु इस्लाम की इस नियुक्ति का समय काबिल-ए-गौर है. अनीस को पिछले साल कश्मीर में फैले तनाव के बीच यह ‘नौकरी’ मिली. उसी दौरान जब कश्मीर में हिंसा और विरोध प्रदर्शनों के बीच सैंकड़ों लोगों की जानें चली गई थी, कई लोग अंधे हो गए थे और हजारों लोग घायल हुए थे. यह सारी कवायद उन्हीं दिनों हुई जब लोग गिलानी के नेतृत्व वाले ‘संयुक्त प्रतिरोधी संगठन’ की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार एक तयशुदा कार्यक्रम के तहत विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी के चलते जेलें ठसाठस भर गई थीं. इस कार्रवाई के बावजूद हुर्रियत ने छह महीने की हड़ताल की घोषणा कर दी और हजारों लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा. हुर्रियत के कड़े विरोध कार्यक्रम के अनुसार युवाओं के झुंड स्थानीय दुकानदारों को दुकान खोलने पर प्रताड़ित करते और आते-जाते वाहनों पर पथराव और तोड़-फोड़ करते. जबकि सरकारी सुरक्षा एजेंसियां इन प्रदर्शनकारियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को मार कर, अपंग बनाकर और गिरफ्तार कर अपनी ड्यूटी पूरी कर रही थी.

कानून-व्यवस्था तंत्र के अलावा सरकार की ओर से किसी और विभाग ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. सारे के सारे दफ्तर बंद थे. पर्यटन विभाग का नाम अलग से लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि कश्मीर में पर्यटक तो वैसे ही नहीं आ रहे थे. यहां तक कि प्रदेश सचिवालय में भी केवल नाम मात्र के ही कर्मचारी आ रहे थे.

अचानक आई सक्रियता

इस सब के बीच अचानक ही पर्यटन विभाग की सक्रियता बढ़ गई. विभाग ने घाटी में पर्यटकों को आकर्षित करने की दिशा में तो काम किया नहीं बल्कि शेर-ए-कश्मीर इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर के एक वरिष्ठ पद के लिए आमंत्रित आवेदनों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. और कमाल की बात यह कि विभाग ने इस पद के लिए आए 140 आवेदनों में से गिलानी की बेटी फरहात और दामाद अल्ताफ फंतूश के बेटे अनीस को ही चुना.

पर्यटन विभाग दरअसल मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती के अधीन है. विभाग ने यह पद न तो लोक सेवा आयोग (पीएससी) और न ही कर्मचारी चयन मंडल (एसएसबी) के जरिये जारी किया. सरकारी नियुक्तियों का जिम्मा प्रदेश की इन्हीं भर्ती
एजेंसियों के पास है. मार्च में खबर आने से पहले किसी को भी पर्यटन विभाग में हुई इस नई नियुक्ति के बारे में कुछ पता नहीं था और जब सोशल मीडिया में इस पर बहस चल रही थी तो गिलानी चुप्पी साधे रहे. उनके संगठन ने इसका जवाब देना जरूरी नहीं समझा.

परन्तु राज्य सरकार इस बहस में कूदी. विडम्बना यह है कि एक ओर जहां हजारों लोगों की मौत हो गई, वहीं सरकार गिलानी को निर्दोष बताते हुए अनीस के बचाव में उतर आई.

पर्यटन विभाग में सचिव फारुख शाह ने मीडिया से कहा, ‘न तो इस पद का सृजन किया गया है और न ही किसी दबाव में आकर इस पद पर नियुक्ति की गई है. इस पद के लिए आए आवेदनों में से चयनित आवेदनकर्ताओं को 5 नवम्बर, 2016 को साक्षात्कार के लिए बुलाया था. एसकेआईसीसी के नियमानुसार गठित एक चयन समिति ने चयनित 35 उम्मीदवारों में से 32 का साक्षात्कार लिया.’ उनके मुताबिक अनीस इस पद के लिए उपयुक्त उम्मीदवार हैं.

सच्चाई क्या है?

बहुत से लोगों ने पर्यटन विभाग की इस चयन प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं. इस नियुक्ति का वक्त देखते हुए इसके बिल्कुल निष्पक्ष होने पर संदेह होना लाजिमी है. क्या वाकई सरकार जो कह रही है, वह सही और नियुक्ति उचित है? हुर्रियत समर्थकों ने सरकार की बात को सही ठहराते हुए कहा यह नियुक्ति भी एक सामान्य प्रक्रिया के तहत ही हुई है और इसका उस वक्त घाटी के हालात से कोई लेना-देना नहीं है.

इस मुद्दे पर सोशल मीडिया में कुछ इस तरह की बहस छिड़ी:

‘गिलानी को अपने नाती की नौकरी से क्या फायदा होगा?'

‘गिलानी को इस बारे में कुछ पता नहीं है?’

‘गिलानी ने अपने नाती के लिए नौकरी नहीं मांगी?’

‘क्या गिलानी के नाती को सरकारी नौकरी करने का हक नहीं है? इसे आजादी के लिए संघर्ष करने वाले गिलानी की छवि से कैसे जोड़ा जा सकता है?’

‘अगर कोई व्यक्ति अपने पिता, दादा या नाना के रास्ते पर नहीं चलना चाहता तो उसे इसका दोष नहीं दिया जा सकता.’

चुप्पी

इस नियुक्ति के बारे में और अधिक स्पष्टीकरण नहीं दिए गए. मीडिया में इस बारे में और कुछ नहीं आया जो इस नियुक्ति पर और जानकारी दे सके. जाहिर है सरकार को इस कदम से हो सकने वाले राजनीतिक नुकसान का अंदाजा है और इसीलिए वह इस पर बस मामूली सा बचाव करने के बाद चुप बैठ गई है, जैसे कि हुर्रियत चुप है. ऐसे में कुछेक लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर यह चर्चा करना कोई खास मायने नहीं रखता.

हालात तब और खराब हो जाते हैं, जब सरकारी अधिकारी, स्थानीय मीडिया, अलगाववादी और जनता का एक वर्ग शीर्ष नेता के नाती को सरकारी नौकरी में संदिग्ध नियुक्ति पर पर्दा डालने में जुट जाता हैं. वह भी उस वक्त जब उसी नेता के एक इशारे पर किए जा रहे ‘आजादी के संघर्ष’ के दौरान कश्मीर के किशोरों की मौत हो रही हो, हजारों लोग अपनी नौकरियां गवां चुके हों.

गिलानी वही स्वयंभू नेता हैं, जिन्होंने गत वर्ष घाटी में मचे हाहाकार के दौरान उनसे मदद मांगने गए सर्वदलीय नेताओं के मुंह पर अपने दरवाजे बंद कर दिए थे. वे खुद को लोगों के सामने भ्रष्टाचार विरोधी और दृढ़ता का पर्याय बताते हैं.

सवाल यह उठता है कि गिलानी ने जनता के नाम पर कश्मीर में विरोध प्रदर्शन का कदम कैसे उठा लिया? और उसके बाद जब बात अपने नाती की नौकरी की आई तो पूरी तरह चुप्पी साध ली. हो सकता है सरकार ने जानबूझ कर गिलानी की ‘बेदाग’ छवि को थोड़ा ‘नुकसान’ पहुंचाते हुए उनसे थोड़ा फायदा उठाने की उम्मीद में ऐसा किया हो.

अब यह महज संयोग तो नहीं कि दिसम्बर माह के अंत में, जबकि जम्मू-कश्मीर में बिगड़े हालात के छह महीने पूरे हो गए थे, हुर्रियत ने रहस्यमयी तरीके से पर्यटकों को घटी में लौटने का आह्वान किया. कुछ लोग अब इन सारे घटनाक्रमों की कड़ियां जोड़ पा रहे हैं. उस पर हुर्रियत की लगातार चुप्पी इन कड़ियों पर मुहर लगाती नजर आ रही है.

संदर्भ और समय

बात बस इतनी ही नहीं है कि अनीस की नियुक्ति सही प्रक्रिया के तहत हुई है या नहीं और ना ही यह है कि गिलानी सब कुछ जानते थे कि नहीं. ना ही सवाल यह है कि अनीस या उनके पिता ने इस नियुक्ति की मांग की थी या नहीं या इस पद को पाने के लिए अपनी इच्छा जताई थी. असलियत तो यह है कि अब बहस का विषय यह हो गया है कि क्या एक अलगाववादी नेता के परिजनों को सरकारी नौकरी करने का अधिकार है या नहीं?

अधिकार है. बस इस नौकरी के लिए उनकी नियुक्ति का वक्त, संदर्भ और हालात पर सवाल उठना स्वाभाविक है. यहां फिर से दोहराना होगा कि जिस वक्त अनीस को यह पद सौंपा गया उसी वक्त घाटी में सैंकड़ों युवाओं की मौत हो रही थी. कईयों को अंधा होना पड़ा था और अनगिनत घायल हो गए थे. लगातार छह महीने तक चले कर्फ्यू और बाजार बंद के चलते हजारों लोग बेरोजगार हो गए लेकिन किसी ने कोई शिकायत नहीं की. बल्कि लोगों ने आंखें मूंद कर हुर्रियत के विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम में भाग लिया. और इस सारे विरोध प्रदर्शन कार्यक्रम के प्रमुख नेता गिलानी ही थे.

सरकारी नौकरी की बात छोडि़ए, अगर कोई निजी कम्पनी भी अनीस को नौकरी देती तो उन्हें इन हालात में वह प्रस्ताव स्वीकार करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं था.

जम्मू कश्मीर के एक बड़े अंग्रेजी अखबार में छपे एक लेख के स्तम्भकार के अनुसार, ‘गिलानी जिस तरह का आंदोलन चला रहे हैं, उस पर ऐसी किसी बात का कोई असर नहीं पड़ने वाला कि उनके नाती को सरकारी नियुक्ति दी गई है. लेकिन सवाल यह है कि आपका बच्चा तो इस नौकरी में बाजी मार ले गया लेकिन जान जोखिम में डालकर सैनिक की नौकरी करना किसका बच्चा चाहता है?'

संयोग ही कहा जा सकता है कि जिस दिन अनीस को गुपचुप तरीके से सरकारी नौकरी दी गई थी, उसी दिन त्राल में एक मुठभेड़ में दो उग्रवादी मारे गए थे. चार दिन बाद पदमपोरा में हुई एक और मुठभेड़ में दो उग्रवादी और एक 15 साल के लड़के आमिर नाजिर वानी की मौत हो गई. वानी वहां फंसे हुए लड़ाकों को बचाने की जिम्मेदारी निभा रहा था. उनका सामूहिक रूप से अंतिम संस्कार किया गया.

इस तरह के हालात में एक विश्वसनीय, दूरदर्शी और सशक्त नेतृत्व की जरूरत है और कश्मीर में राजनीतिक स्तर पर ऐसे नेतृत्व का अभाव ही दिखता है. मुख्यधारा की राजनीति आज महज एक पावर गेम बन कर रह गई है. उस पर कश्मीर में चल रहे मौजूदा हालात के बीच राजनेताओं द्वारा किसी एक विचारधारा को अपनाना या अलगाववाद के रास्ते पर चल रहे लोगों से निपटना किसी चुनौती से कम तो नहीं है.

First published: 15 March 2017, 8:21 IST
 
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