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यह मोचन का सुर है, संकट का नहीं

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

तुलसीदास का हाथ तोड़ने वाला भी बनारस था और सिर पर रखने वाला भी बनारस. यही बनारसी रंग का सौंदर्य है. गुस्सा, असहमति, विरोध, विवाद सब एकसाथ एक शहर में जीते हैं. 

एक ही दुकान पर चाय पीकर एक से पैलगी करते हैं और फिर असहमति होने पर उसी को मन भर गरियाते हैं. एक साथ पान खाना और एक ही जगह पर देख लेने का संकल्प लेना, दोनों सतत होता रहता है इस शहर में.

ताज़ा मामला पाकिस्तान के गज़ल गायक ग़ुलाम अली के बनारस में कार्यक्रम का है. कार्यक्रम दरअसल ग़ुलाम अली का नहीं है. कार्यक्रम संकट मोचन मंदिर का है. वहां प्रति वर्ष संगीत समारोह होता है. देश दुनिया के बाकी हिस्से से भी लोग संगीत में गोता लगाने यहां आते हैं. इस बार भी इस कार्यक्रम का आयोजन किया गया. 

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मंगलवार को संकट मोचन हनुमान मंदिर के प्रांगण में कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ. मंच पर ग़ुलाम अली अपने हारमोनियम में हवा भरते हुए तुलसीदास की विनय पत्रिका को गाते दिखाई दिए.

ग़ुलाम अली संकटमोचनमय हो गए. बनारसी हो गए. बनारस गुलाम अली में डूब गया. डूबने के बाद निकलना होता है और निकलते समय हर-हर महादेव का विधान इस नगर का अनुशासन है. ग़ुलाम अली को इसी अलंकरण से नवाज़ा गया.

ग़ुलाम अली के आने की सूचना जब शहर में लोगों को लगी तो त्रिशूल लेकर राजनीति करने वाले मन ही मन गदगद हुए. उन्हें सड़क पर बिना मेहनत प्रचार का मौका मिल गया. स्वनामधन्य हिंदुत्व रक्षक संगठन पोस्टर चिपकाने लगे कि इस पाकिस्तानी को नहीं गाने देंगे. 

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ये वो लोग हैं जिन्होंने न तो कभी प्रेम से बिस्मिल्ला खां की शहनाई सुनी और न ही जिन्हें ओंकारनाथ ठाकुर का संगीत याद है. ये बनारस के रस में चीटों की तरह पड़े हुए हैं और कोई एक तिनका मिलते ही निपट लेने वाली शैली में पूंछ उठा लेते हैं.

बनारस को लेकर धारणा बनाने वाले बनारस को एक तय नंबर का चश्मा लगाकर देखते हैं और जो दिख जाता है, उसे ही बनारस का अंतिम सत्य मान लेते हैं

तो ग़ुलाम अली के आने को लेकर धमकियों का सिलसिला शुरू हुआ. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र में किसी पाकिस्तानी मुलसमान का गायन कैसे सहज ही स्वीकार कर लिया जाता. बवाल काटा जाने लगा. प्रेस विज्ञप्तियां छपने लगीं. धमकियां मिलती रहीं. नारे उछाले जाते रहे. पर इससे न तो बनारस उद्वेलित हुआ, न आयोजक मंहत विशंभरनाथ मिश्र और न ही गायक ग़ुलाम अली. कार्यक्रम जस तय था, तस हुआ.

विरोध करने वालों को पता नहीं इस बार क्यों विरोध की सूझी, गुलाम अली तो पहली बार पिछले साल ही संकटमोचन के संंगीत समारोह में शिरकत कर चुके थे. 

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दरअसल, बनारस को लेकर धारणा बनाने वाले बनारस को एक तय नंबर का चश्मा लगाकर देखते हैं और जो दिख जाता है, उसे ही बनारस का अंतिम सत्य मान लेते हैं. जब बनारस जाते हैं तो गोबर देखकर बनारस को दुनिया का सबसे गंदा शहर मान लेते हैं. 

मणिकर्णिका देखते हैं तो इसे मोक्षद्वार घोषित कर देते हैं. मंदिर देखकर इसे धर्म की नगरी घोषित कर देते हैं. नाव देखकर इसे गंगा दर्शन की देवभूमि मान लेते हैं. साड़ी लाते हैं तो बुनकरों का शहर बताते हैं और लुट जाते हैं तो ठगों का शहर बताते हैं.

2014 में जब नरेंद्र मोदी जीते थे तो लोगों को लगा कि बनारस तो अब सांप्रदायिक लोगों का हो गया. इसपर हिंदुत्ववादियों का कब्ज़ा हो गया. अब ग़ुलाम अली गाकर गए तो लोग कहेंगे कि देखिए महाराज, पूरा लोकतंत्र है. कोई भी मुल्ला मियां यहां आ रहा है और गा रहा है और हम सुन रहे हैं. कहीं देखा है ऐसा लोकतंत्र.

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ऐसे लोगों को यह समझना चाहिए कि बनारस हमेशा सबकुछ था. सांप्रदायिक भी और लोकतांत्रिक भी. बनारस कर्मकांडी भी था और कबीरमार्गी भी. जातिवादी भी और डोमों की डेहरी भी. मोदी बनारस के लिए एक नया प्रयोग हैं. प्रयोग करके देखा. 

एक ऐसा सांसद जिता दिया जो प्रधानमंत्री बन गया. उसके वादों और भाषणों को चरितार्थ होने का एक मौका दिया. नहीं होने पर नंदी से उतारकर शहर के बाहर बाबतपुर तरफ खदेड़ भी देंगे. मोदी को जिताया लेकिन न तो साड़ी त्याग दीं, न दंगे कर दिए. 

यही बनारस है. सब रसों में रंगा. लुटिया जब तब छलकती है. अस्थिर सा लगता है कभी कभी

शहर साथ रह रहा है. ग़ुलाम अली को सुनते गुनगुनाते यहां के गुरू लोग बड़े हुए हैं. सुनाने आ रहा है तो सुनने में हर्ज क्या है. वो आए. बनारस ने सुना. फिर आने का वादा करके गए. बनारस फिर आने की राह देखेगा.

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यही बनारस है. सब रसों में रंगा. लुटिया जब तब छलकती है. अस्थिर सा लगता है कभी कभी. लेकिन बनारस को मालूम है कि उसे किससे खतरा है और किससे नहीं. ग़ुलाम अली से ख़तरा नहीं था. उनको सत्कार करके भेज दिया. जिनसे खतरा लग रहा है, वक्त आने पर बनारस उनसे बदला ले लेगा.

संकट मोचन प्रांगण में गु़लाम अली का गायन बनारस की जीत है. इस कार्यक्रम की सफलता किसी एक पार्टी या किसी एक रंग के वर्चस्ववाद की हार है. बनारस एक रंग नहीं हो सकता. न था. न होना चाहिए. बना रहे बनारस.

(विचार लेखक के निजी हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है)

First published: 28 April 2016, 8:13 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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