Home » इंडिया » How India can fight with disastrous infant mortality deaths
 

भारत में आतंकवाद से ज्यादा मौतें प्रसव के दौरान माता और शिशुओं की होती हैं

श्रिया मोहन | Updated on: 8 March 2016, 12:13 IST
QUICK PILL
  • शिशु और मातृत्व मृत्यु दर के मामले में भारत अब भी दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में से एक है. यहां घर पर होने वाले प्रसव के लिए मेडिकल सहायता नाममात्र की है, मिडवाइफों की संख्या बहुत कम है.
  • स्वास्थ्य के अधिकांश मानदंडों पर भारत सबसे निचले पायदान पर है. शिशु\r\n मृत्यु दर और प्रसव के दौरान होने वाली मौतों के मामले में इसकी स्थिति बहुत ही खराब है. 
सरस्वती मुर्मू पुआल की चटाई पर लेटी हैं. वो दर्द से छटपटा रही हैं. माथे पर मोतियों की तरह पसीने की बूंदें दिख रही हैं. वो पहले भी दो बच्चों को जन्म दे चुकी है लेकिन इस बार प्रसव वेदना से वह कमजोर हो गयी हैं. उनके पति गौर काफी परेशान हैं.

पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले के हौर गांव में इस समय रात के साढ़े ग्यारह बज रहे हैं. यहां से सबसे नजदीकी जिला सरकारी अस्पताल 30 किलोमीटर दूर है.

गौर ने फुर्ती से सरस्वती का नेशनल रूरल हेल्थ कार्ड ढूंढ निकला. यह कार्ड उन्हें गांव के स्वास्थ्य केंद्र से मिला था. कार्ड में प्रसव की संभावित तारीख और उन्हें लगे टीकों का ब्योरा दर्ज है.

खास बात यह कि इसमें एम्बुलेंस ड्राइवर का फोन नंबर भी है. बदहवास गौर ड्राइवर को फोन मिलाकर कहते हैं, “दादा, मेरी बीवी को प्रसव पीड़ा हो रही है. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाना जरुरी है.”

कुल पल की चुप्पी के बाद उन्हें एक ठंडा स्वर सुनायी दिया, “लेकिन मैं तो जात्रा (स्थानीय नाटक) देख रहा हूं. दो घंटे से पहले नहीं पहुंच पाऊंगा.

जीवन-रक्षक सुकुमार नंदी

गौर खुद को लाचार महसूस कर रहे थे. वो गांव में नाटक देख रहे एम्बुलेंस ड्राइवर से काफी नाराज थे. तभी मैली-कुचैली लुंगी पहने, टुटही सायकिल से एक आदमी उनके पास आया. उसके हाथ में सिरिंज और दवाइयों का एक छोटा थैला था. गौर के चेहरे पर उम्मीद की एक लहर दौड़ गयी. चलो, कम से कम सुकुमार नंदी तो हैं.

Child birth embed 1

सुकुमार नंदी, आरएमपी (रूरल मेडिकल प्रैक्टिसनर) हैं. वो डाक्टर नहीं बल्कि सातवीं फेल झोलाछाप डॉक्टर हैं.

नंदी कुछ साल तक एक कम्पाउंडर के साथ रहे थे. उसके बाद अपने गांव में आकर एक झोपड़े में अपनी खुद की ‘प्रैक्टिस’ शुरू कर दी.

मुर्मू आदिवासियों में गरीबी बहुत आम है. बच्चों की पैदाइश के लिए आम तौर पर वे नर्सिंग होम नहीं जाते क्योंकि इसका खर्च बहुत ज्यादा है.

सरस्वती को पता है कि उसे किसी अस्पताल में जाना चाहिए क्योंकि दूसरे बच्चे को जन्म देते समय उसे काफी दिक्कत हो गई थी. लेकिन प्रसव पीड़ा शुरू हो जाने के कारण अब यह मुमकिन नहीं है. उसके पास नंदी से इलाज कराने के अलावा कोई चारा नहीं है.

नंदी ने अपना थैला नीचे रखा, उसमें से सिरिंज निकाला और सरस्वती को सुई लगा दी. बच्चा धीरे-धीरे बाहर आने लगा. नंदी ने नंगे हाथों से बच्चे को खींचकर बाहर निकाल लिया. जब बच्चा बाहर आ गया तो नंदी ने गौर को एक ‘चोचली’ यानी बांस का टुकड़ा लाने के लिए भेजा.

गौर एक हंसिया लेकर भागे और बांस का टुकड़ा ले आए. बच्चा अभी भी सफ़ेद लिसलिसे तरल में लथपथ रो रहा था. नंदी ने छिले हुए बांस के नुकीले हिस्से को अपनी गन्दी लुंगी से पोंछा और उससे नाल काटकर बच्चे को मां से अलग कर दिया.

child birth embed 2

इसके बाद फरवरी की सर्दी में बच्चे को गुनगुने पानी से नहलाया गया. जिस गंदे कपड़े का इस्तेमाल प्रसव के लिए किया था उसी से बच्चे का मुंह पोंछ दिया गया. सफाई से फारिग होकर नंदी ने अपना थैला खोला और उसी सिरिंज से मां और बच्चे को टेटनस की सुई लगा दी.

खतरे से भरा मातृत्व

भारतीय नीति आयोग ने हाल ही में पिछले 20 सालों के दौरान भारत की स्वास्थ्य प्रणाली की हालत पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की है. रिपोर्ट में भारत की स्थिति की तुलना चीन, बांग्लादेश, नेपाल और वियतनाम से की गयी है.

स्वास्थ्य के अधिकांश मानदंडों पर भारत सबसे निचले पायदान पर था. जबकि शिशु मृत्यु दर और प्रसव के दौरान मृत्यु दर के मामले में इसकी स्थिति बहुत ही खराब थी.

अंतरराष्ट्रीय एनजीओ 'सेव द चिल्ड्रेन' की सालाना रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है. इस रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ दशकों में हुए आर्थिक विकास के बावजूद भारत आज भी बच्चे को जन्म देने के लिहाज से दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक है.

साल 2013 में दुनिया भर में हुए प्रसव के दौरान हुई कुल मौतों में से 17 प्रतिशत भारत में हुई थीं.

प्रसव के दौरान जच्चा मृत्युदर और शिशु मृत्युदर कम करने के लिए साल 2005 में शुरू की गयी 'जननी सुरक्षा योजना' लगभग विफल रही है.

साल 2010 में घर पर बच्चे के जन्म देने के दौरान 10 में से केवल दो महिलाओं के लिए मेडिकल सुविधा मिल पाई. भारत ने साल 2015 तक जच्चा मृत्यु दर को घटाकर प्रति एक लाख प्रसव पर 109 तक सीमित करने का लक्ष्य रखा था जिसमें वो विफल रहा है.

गांवों से अलग नहीं हैं शहर

आम धारणा के विपरीत ग्रामीण भारत की तुलना में शहरी भारत में प्रसव के दौरान मेडिकल सहायता पाने वाली महिलाओं का प्रतिशत कम है.

गांवों के 16.2 प्रतिशत की तुलना में शहरों में 10.8 प्रतिशत महिलाओं को ही प्रसव के दौरान मेडिकल सहायता मिल पाती है. इस दौरान पश्चिम बंगाल में हर चार में से एक बच्चे का जन्म किसी 'अप्रशिक्षित चिकित्साकर्मी' की सहायता से हुआ.

child birth embed 2

इस मामले में दिल्ली की हालत भी कुछ खास अच्छी नहीं है. 28 वर्षीय परिमित गिरी ने एमबीबीएस की पढ़ाई करने के बाद 2009 में दिल्ली के नजफगढ़ में काम किया था और आजकल फोर्टिस अस्पताल कोलकाता में कार्यरत हैं. उन्हें वहां के अस्पतालों में कर्मचारियों और ढांचागत सुविधाओं की जर्जर हालत देख कर काफी आश्चर्य हुआ था.

गिरी कहते हैं, "सात बजे शाम के बाद वहां कोई स्त्रीरोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं थी. उसके बाद आनेवाले प्रसव के मामलों के लिए, इंटर्न और आयाओं को ही अपने अल्प ज्ञान का उपयोग करना होता था. यह एक बहुत बड़ी गड़बड़ी थी."

राज्य का हस्तक्षेप बेअसर

स्वास्थ्य विशेषज्ञ और एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) इस बात पर जोर दे रहे हैं कि खराब स्वास्थ्य सुविधाओं को देखते हुए सरकार सुकुमार नंदी की तरह दाइयों को फिर से इस काम में लगाये. इसके लिए उन्हें प्रसव के आधुनिक तरीकों का प्रशिक्षण दिया जाय और इस दौरान आने वाली जटिलताओं से निपटने में सक्षम बनाया जाए.

साल 2001-2002 में 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 156 जिलों में दाइयों और मिडवाइफों के प्रशिक्षण की एक योजना शुरू की गयी.

इस योजना के तहत पश्चिम बंगाल के उन जिलों का चयन किया गया जहां सुरक्षित प्रसव की दर 30 प्रतिशत से कम थी. इसके लिए 2000-2001 के दौरान 5.21 करोड़ रुपये आवंटित हुआ और 2001-2002 के दौरान 17.60 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि दी गयी.

इसका उद्देश्य दाइयों को पर्याप्त विशेषज्ञता से लैस करना था. सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और सामान्य चिकित्सक डॉ अमिताभ चौधरी इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का हिस्सा थे.

इसे एक त्रासदी बताते हुए वो कहते हैं, "कार्यक्रम बहुत कम समय का था. दाइयां सीखने में शायद ही कोई रुचि रखती थीं. अधिकांश बहुत बूढ़ी और अनपढ़, मोतियाबिंद और अन्य बीमारियों से पीड़ित थीं."

चौधरी के अनुसार वे बस पैसे के लिए इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हो गयी थीं. चौधरी ने बताया, "पश्चिम बंगाल सरकार ने इस कार्यक्रम को वापस ले लिया गया था. उसका मानना था कि इससे प्रसव के दौरान अस्पताल न जाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी. बहुत कम लोग ही अस्पतालों में जच्चा का नामांकन कराएंगे.

चौधरी मानते हैं कि दाई प्रशिक्षण कार्यक्रम की योजना को और बेहतर बनाया जा सकता था. वे जर्मनी का उदहारण देते हैं जहां प्रसव में सहायता करने को एक सम्मानजनक पेशा माना जाता है.

जर्मनी सरकार ने जब महसूस किया कि घर पर प्रसव लोकप्रिय हो रहा है तो उसने स्नातकों के लिए एक प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया.

इसमें एक बुनियादी पाठ्यक्रम पूरा करने और 300 प्रसव कराने के बाद पेशेवर प्रसव सहायक का प्रमाणपत्र मिलता है.

चौधरी कहते हैं, “किसी को प्रसव सहायक के रूप में मान्यता देने से पहले उसे उचित गुणवत्ता वाला प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और उसके बाद उसकी विशेषज्ञता की जांच भी होनी चाहिए. इसे एक सम्मानजनक पेशे के रूप में भी देखा जाना चाहिए.”

पॉपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया की कार्यकारी निदेशक पूनम मुतरेजा भी चौधरी से सहमत हैं.

मुतरेजा कहती हैं, " अस्पतालों में प्रसव को बढ़ावा देने के लिए दाइयों को दिए जाने वाले प्रशिक्षिण से समझौता करना उचित नहीं है.

वो कहती हैं, “दोनों का होना जरूरी है. दूर-दूरदराज के इलाकों में यातायात की सुविधा का अभाव और सांस्कृतिक रूढ़ियों के कारण अस्पताल में प्रसव बहुत कम होते हैं. हमें दाइयों के प्रशिक्षण को तेजी से बढ़ावा देना चाहिए, खास कर आपातकालीन लक्षणों को पहचानने का प्रशिक्षण. उन्हें ज्यादा जोखिम वाले प्रसव की समझ होनी चाहिए, ताकि जच्चा का समय से अस्पताल पहुंचना सुनिश्चित हो सके.”

भरोसा भी, जोखिम भी

नैशनल फाउंडेशन ऑफ इंडिया से जुड़ी फोटो-पत्रकार नतीशा मल्लिक अगस्त 2012 से ग्रामीण इलाके में घर पर प्रसव को डॉक्युमेंट कर रही हैं.

नतीशा कहती हैं, “जब मैंने पहली बार यह प्रोजेक्ट शुरू किया तब आरएमपी और दाई के बारे में मेरी धारणा नकारात्मक थी. लेकिन उनके काम की तस्वीर उतारते हुए मैंने उनके महत्व को समझना शुरू किया.”

नतीशा ने बताया कि पिछली बार जब वो सरस्वती के घर गयीं तो जच्चा-बच्चा दोनों ठीक थे. लेकिन सभी मामलों में ऐसा ही नहीं होता. साल 2013 में मल्लिक ने पूर्वी मिदनापुर के एक परंपरागत मुस्लिम परिवार में हुए प्रसव का डॉक्युमेंटेशन किया था. वहां आरएमपी को घर के भीतर नहीं आने दिया गया. इस बीच दाई ने जब बच्चे को बाहर निकाला तो उसकी नाल फट गयी. आखिर में आरएमपी को घर के भीतर आकर स्थिति सम्हालने की अनुमति दी गयी.

बंगाल के ग्रामीण इलाकों में दाई और आरएमपी भले ही जान बचाते हों, लेकिन मान्यताप्राप्त स्वास्थ्यकर्मियों की अनुपस्थिति में वे कई बार स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा भी बन जाते हैं.

चौधरी को नीम-हकीमों की गड़बड़ियों का प्रत्यक्ष अनुभव है. वे कहते हैं, “भारत में 99 प्रतिशत गर्भपात आरएमपी कराते हैं. उनका तरीका जच्चा की जान जोखिम में डालने वाला होता है."

मल्लिक कहती हैं, “अपने प्रोजेक्ट की समाप्ति तक मुझे यह अहसास हो गया था कि सरस्वती जैसी हजारों माताओं के लिए नीम-हकीम और दाइयां ही अंतिम आसरा हैं.”

वे कहती हैं, "ये परंपरागत तरीके कम खर्चीले भी हैं. एक परिवार से एक प्रसव के लिए उनको 100 रुपये से 500 रूपये के बीच मिलता है."

First published: 8 March 2016, 12:13 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी