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ग्लोबल फूड पॉलिसी रिपोर्ट 2016: भोजन का दीर्घकालिक इंतजाम कैसे?

श्रिया मोहन | Updated on: 1 April 2016, 12:51 IST

हमें अक्सर बताया जाता है कि धरती पर मौजूद संसाधनों की एक सीमा है. जो अनाज हम उगाते हैं ये भी उसमें शामिल है. क्या अपने संसाधनों की तुलना में हम इसकी ज्यादा खपत कर रहे हैं?

हम लंबी मियाद के लिए भोजन का इंतजाम कैसे कर सकते हैं? इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी आईएफआरआई ने गुरुवार को वैश्विक खाद्य नीति रिपोर्ट 2016 जारी की है.

रिपोर्ट के मुताबिक हमें ऐसी खाद्य व्यवस्था की जरूरत है जो 2030 तक दीर्घकालिक विकास के लक्ष्य को हासिल करने में मदद कर सके.

ये फूड सिस्टम कैसा होना चाहिए? हम इसको हासिल करने के कितने करीब हैं? आईएफआरआई की रिपोर्ट इन सारे मुद्दों पर स्पष्ट राय रख रही है. रिपोर्ट के मुताबिक ऐसी खाद्य व्यवस्था की छह विशेषताएं होनी चाहिए.

प्रभावी नीति, सबका साथ, जलवायु संरक्षण, पोषण, स्वास्थ्य के मुताबिक और कारोबार के लिए बेहतर. ये सारी खूबियां फूड सिस्टम में होनी चाहिए. फूड पॉलिसी रिपोर्ट से कुछ दिलचस्प तथ्य भी सामने आए हैं.

जलवायु परिवर्तन स्वाभाविक है

इस बात के मजबूत प्रमाण हैं कि जलवायु परिवर्तन का खेती पर लगातार बुरा असर पड़ता है. हर साल एक करोड़ 20 लाख हेक्टेयर जमीन सूखे और मरुस्थलीकरण की वजह से बर्बाद हो जाती है.

ये तकरीबन निकारागुआ के क्षेत्रफल के बराबर है जो सेंट्रल अमेरिका का सबसे बड़ा देश है. ये खास तौर पर छोटे किसानों के लिए काफी नुकसानदेह है.

संयुक्त राष्ट्र की फूड और एग्रीकल्चर संस्था के मुताबिक वैश्विक खाद्य व्यवस्था की वजह से वायुमंडल में 20 फीसदी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन होता है.

हमें जलवायु के मुताबिक उगने वाली फसलों की जरूरत है. जिससे पानी का सही तरीके से इस्तेमाल और बेहतर पैदावार मिल सके. बढ़ती जनसंख्या के हिसाब से ढलने और जलवायु परिवर्तन का गंभीरता से सामना करने के लिए ये बेहद अहम है.  

हमें छोटे किसान मुहैया कराते हैं अनाज

आईएफआरआई की रिपोर्ट में एक और दिलचस्प जानकारी सामने आई है. रिपोर्ट के मुताबिक एशिया और अफ्रीका में 80 फीसदी अनाज 50 करोड़ छोटे किसान मुहैया कराते हैं. दुखद पहलू ये है कि इनमें से ज्यादातर गरीब हैं.

उनके पास सुविधाओं का अभाव है. अनिश्चित मौसम और दूसरी अनदेखी चुनौतियों से जूझने के लिएउनके पास कोई सरकारी मदद नहीं है.

भारत में छोटे किसानों की कुल कृषि उपज में 70 फीसदी हिस्सेदारी है. देश की आधी से ज्यादा खेती बारिश के भरोसे है. 

इन किसानों को बेहतर मानसून की भविष्यवाणियों पर ही निर्भर रहना पड़ता है. इसी का नतीजा था कि 2011 में जब मानसून देरी से आया तो छोटे किसान उसका ठीक ढंग से सामना नहीं कर सके.

बीफ सबसे ज्यादा खपत वाला फूड

विकासशील देशों में शहरीकरण, आय में बढ़ोतरी और एनिमल प्रोटीन की ज्यादा मांग की वजह से खानपान की आदतें बदली हैं. बीफ की खपत बढ़ रही है. ये प्रचुर मात्रा में इस्तेमाल होने वाला और पर्यावरण के लिहाज से असरदार भोजन है.

प्रति यूनिट प्रोटीन खपत के हिसाब से बीफ प्रोडक्शन के लिए डेयरी के मुकाबले चार गुना ज्यादा जमीन (चार गुना ज्यादा ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन) की जरूरत होती है.

साथ ही पोर्क और मुर्गीपालन के मुकाबले बीफ की सात गुना ज्यादा खपत है. यही नहीं दालों के मुकाबले इसका 20 गुना ज्यादा उपभोग होता है.

बीफ में चारे के इस्तेमाल के बाद लोगों के भोजन में तब्दील करने की सबसे कम ताकत होती है. मवेशी का एक फीसदी चारा ही ऊर्जा देता है वहीं खिलाया जाने वाला चार फीसदी प्रोटीन ही इंसान के लिए कैलोरी और प्रोटीन मुहैया कराता है.

इसी का नतीजा है कि बीफ के लिए ज्यादा जमीन और साफ पानी का इस्तेमाल होता है. साथ ही आम तौर पर खाए जाने वाले किसी भोजन के मुकाबले बीफ की प्रति यूनिट प्रोटीन से ज्यादा ग्रीनहाउस गैसें उत्पन्न होती हैं.

अंटार्कटिका को छोड़कर पृथ्वी के क्षेत्रफल का एक चौथाई हिस्सा चारागाह के रूप में इस्तेमाल होता है. यही नहीं दुनिया के जल भंडार का एक तिहाई हिस्सा मवेशियों के फार्म की भेंट चढ़ जाता है.

अमेरिकियों का बोझ

2009 के दौरान दुनिया की आबादी में एक अमेरिकी का इजाफा होने पर एक हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन की जरूरत होती थी. जो कि एक वर्ल्ड कप फुटबॉल ग्राउंड के अधिकतम आकार जितना होता है.

इसमें 1700 वर्गमीटर फालतू जमीन शामिल है.साथ ही हर साल 16.6 मीट्रिक टन कार्बन डाई ऑक्साइड का उत्सर्जन करके वातावरण पर प्रत्येक अमेरिकी बोझ बढ़ाते हैं.

न्यूयॉर्क से लॉस एंजिल्स तक 7 बार आने-जाने के दौरान ड्राइविंग से होने वाले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से इसकी तुलना की जा सकती है.  

फूड पॉलिसी रिपोर्ट में खान-पान की आदतों में तीन बदलाव का प्रस्ताव है. जिससे खेती योग्य जमीन का सबसे कम इस्तेमाल करते हुए लंबे अरसे के लिए भोजन का इंतजाम हो सकता है.

साथ ही ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी घटाया जा सकता है.

ज्यादा खाने पर लगाम

दुनिया भर में ज्यादा वजन वालों की तादाद अल्पपोषित लोगों से ढाई गुना अधिक है. रिपोर्ट बताती है कि हमें मोटापे को खत्म करते हुए इस ज्यादा वजन वालों की तादाद आधे पर लाने की जरूरत है.

सामान्य इंसान के मुकाबले एक मोटा शख्स रोजाना औसतन 500 कैलोरी ज्यादा इस्तेमाल करता है. वहीं ज्यादा वक्त तक बैठे रहने की आदत वाले शख्स के मुकाबले ज्यादा वजन वाला इंसान रोजाना 250 कैलोरी अधिक उपभोग करता है.

रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि हर इलाके में समान अनुपात के साथ कैलोरी की खपत को कम किया जाना चाहिए जिससे मोटापे को खत्म करने के साथ ज्यादा वजन वालों की आबादी आधी हो सके.

प्रोटीन और मांस में कटौती

जिन इलाकों में रोजाना प्रति व्यक्ति 60 ग्राम से ज्यादा प्रोटीन का सेवन होता है वहां प्रोटीन की खपत को कम करने के लिए समान अनुपात में एनिमल प्रोटीन की खाने में मात्रा घटानी चाहिए.

दूध और मांस के स्रोतों से ये कटौती होनी चाहिए. इस कदम से दुनिया में एनिमल प्रोटीन की खपत 17 फीसदी कम हो जाएगी.

बीफ की खपत में खास कटौती

जिन इलाकों में रोजाना प्रति व्यक्ति बीफ की खपत विश्व औसत से ज्यादा है, वहां इसे एक तिहाई घटाकर इलाके के मुताबिक पोर्क-पॉल्ट्री, दाल और सोया को समान अनुपात में शामिल किया जाए.

ये भी ध्यान रखने की जरूरत है कि कैलोरी का सेवन पहले जितना ही रहे. रिपोर्ट के मुताबिक खानपान की आदतों में इन तीन बदलाव से बहुत कुछ हो सकता है.

पारंपरिक भूमध्यसागरीय डाइट की बदौलत 2 करोड़ हेक्टेयर जमीन की बचत हो सकती है.वहीं मोटापे में कमी की दो संभावनाओं के चलते 9 करोड़ से 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन सुरक्षित रह सकती है.

साथ ही शाकाहारी भोजन और बीफ की खपत में कमी की बदौलत हम दुनिया की 15 करोड़ से 30 करोड़ हेक्टेयर खेती योग्य जमीन बचाने में कामयाब हो सकते हैं.इस रिपोर्ट पर हर किसी को जरा सोचने की जरूरत है.

First published: 1 April 2016, 12:51 IST
 
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