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जीएम फसलें: सरसों रसोई में, सेहत खटाई में!

निहार गोखले | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(कैच)

भारत के रसोईघरों में जल्द ही जेनेटिकली मोडिफाइड सरसों का प्रवेश हो जाएगा. पर्यावरण मंत्रालय के अधीन आने वाले जीएम फसलों की नियामक संस्था जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमेटी (जीईएसी) की बैठक 20 जून को हुई है. यह बैठक जीएम सरसों को व्यवसायिक खेती के लिए मंजूरी देने के लिए बुलाई गई थी.

हालांकि बैठक में कई कारणों से कोई निर्णय नहीं लिया गया. समिति के सदस्य जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती के पक्ष में दिखे. यदि इसे अनुमति मिल जाती है तो यह भारत का पहला जीएम खाद्य होगा जिसे खेतों में उगाया जाएगा.

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केंद्र सरकार ने साफ किया है कि जेनेटिकली मोडिफाइड सरसों की खेती को वो फिलहाल मंजूरी नहीं देगी. जीएम सरसों को हालांकि अभी खेतों में बतौर फसल उगाने और बेचने की इजाजत नहीं है लेकिन इसे विकसित किया जा चुका है. 

अगर सरकार की जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रूवल कमेटी - जो कि इस मामले में नियामक बॉडी है - इसके लिए अनुमति देती है तो जीएम सरसों पहला जीएम खाद्य होगा जिसे खेतों में उगाया जाएगा. अभी हमारे देश में केवल जीएम कपास को ही उगाया जाता है. जरा, विचार कीजिए- क्या यह एक अच्छा विचार है.

जीएम का पक्ष और विरोध

इंसान दो तरह का बीज उत्पन्न कर सकता हैः हाईब्रिड और जीएम. इंसान ने हाईब्रिड तरीके से जहां आम की विभिन्न प्रजातियां दी है तो वहीं कुत्तों, बिल्लियों और गायों की कई तरह की नस्ल भी मिली हैं. भारत ने 1975 से ही सरसों की कई तरह की हाईब्रिड प्रजातियां विकसित की हैं. दूसरी तरफ जीएम आधुनिक अवधारणा है.

जीएम फसल यानी हिन्दी में कहें -जैविक रूप से कृत्रिम तरीके से बनाई गए फसल बीज. जानकारी के मुताबिक जीएम बीज भारत में पनपे संकर बीज से भी ज्यादा की तादाद में उत्पादन देने में सफल होंगे. पर इसमें भी अंतर है. कुत्तों की दो नस्लों की क्रासिंग के मिलान से जर्मन शैफर्ड सफेद दिखने लगता है. 

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ऐसे में व्यक्ति की सुरक्षा और पर्यावरण मुद्दे पर जीएम फसलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं तो दूसरी ओर जीएम की खिलाफत करने वालों ने सरसों पर दूसरी दिशा अपनाई हुई है. जीएम फसलों के प्रशंसकों का मानना है कि इससे कृषि क्षेत्र की कई समस्याएं दूर हो जाएंगी और फसल का उत्पादन का स्तर सुधरेगा. 

ये जीएम फसलें रोग और कीट प्रतिरोधी तो होती ही हैं, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी उग सकने की क्षमता रखती है. हालांकि जीएम फसलों का विरोध करने वाले कई सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हैं जिनमें यह पता चला है कि नई गैर जीएम प्रजातियां प्रति हेक्टेयर ज्यादा सरसों का उत्पादन करती हैं अपेक्षाकृत जीएम बीज के. हालांकि उनके दावे के आंकड़े सरकार ने जारी नहीं किए हैं.

डीएमएच-11 और उसका परीक्षण

पिछले दशक में दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा पूर्व कुलपति दीपक पेंटल की अगुवाई में जीएम सरसों की एक वैरायटी धारा मस्टर्ड हाईब्रिड 1- या डीएमएच-11 विकसित की गई थी. डीएमएच-11 का परीक्षण चार साल तक 2006-07, 2-1--11,2011-12 और 2014-15 में किया गया. 

2006-07 में परीक्षण पूरे देश में 12 स्थानों पर जबकि अन्य सालों में आठ स्थानों पर किया गया. जीएम-फ्री इंडिया गठबंधन का दावा है कि पहले ट्रायल का जो नतीजा निकला, उसे जनता के सामने कभी नहीं लाया गया. इस ट्रायल में डीएमएच-11 ने अन्य वैरायटियों से अच्छा प्रदर्शन नहीं किया. 

अन्य तीन परीक्षणों में जिसके आंकड़े जनता के सामने लाए गए उसकी तुलना पुरानी वैरायटियों से की गई जो प्राकृतिक रूप से कम पैदावार देती थीं. गठबंधन का दावा है कि जीएम बीज की उत्पादकता आधुनिक हाईब्रिड की तुलना में अच्छीं नहीं है.

वर्ष 2006-07 के ट्रायल में डीएमएच-11 सरसों का उत्पादन प्रति हेक्टेयर औसतन 1551 किग्रा रहा. लेकिन यह उत्पादन डीएमएच-1 से 1.5 फीसदी कम रहा. डीएमएच-1 सरसों की हाईब्रिड वैरायटी है. इसने भी केवल अन्य वैराटियों की अपेक्षाकृत 9 फीसदी बेहतर फसल दी जिसे क्रांति कहा गया. इन आंकड़ों को परीक्षणों से सलाहकार के रूप में जुड़े रहे एक रिटायर्ड कृषि वैज्ञानिक डा. शरद ई पवार ने जारी किया.

जीएम मस्टर्डः नए आंकड़ों से सरकार बैकफुट पर

डीएमएच-1 और क्रांति को बाद में होने वाले परीक्षणों में शामिल नहीं किया गया. जीएम वैरायटी ने बेहतर फसल नहीं दी थी. अन्य तीन ट्रायल्स में जीएम सरसों की तुलना वरुणा, ईएस-2 और आरएल 1359 से की गई, इन सभी से 25-30 फीसदी कम उत्पादन हुआ. इसके आंकड़े जनता के सामने मौजूद हैं.

फिर सरकार का यह दावा कहां से आ गया कि डीएमएच-11 हाईब्रिड वैरायटियों से 25-30 फीसदी ज्यादा फसल देती है. विरोध करने वालों का कहना है कि इसकी तुलना नए हाईब्रिड्स (क्रांति और डीएमएच-1) से नहीं की गई बल्कि जीएम सरसों के पुराने वर्जन से की गई.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने बिल्कुल सटीक तरीके से परिभाषित किया है कि कौन से बीज की नए प्रस्तावित बीज से तुलना की जाए. यह सूची नियमित रूप से अपडेट होती है. ज्यादा उत्पादकता वाले बीजों को विकसित किया जाता है. नए प्रकार के बीजों का मानक भी उच्च होता जाता है. 

वर्ष 2008 में वरुणा का स्थान ज्यादा फसल देने वाली जीएम सरसों जैसे क्रांति, डीएमएच-१ और एनआरसीएचबी-५०६ ने ले लिया. अतः वरुणा की तुलना करनी बंद कर दी गई लेकिन इसकी तुलना वर्ष 2014 तक जीएम सरसों की उत्पादकता से की जाती रही. इसके अलावा वरुणा जीएम वैरायटी के पैरन्ट प्लांट्स में से एक है. माना जाता है कि यह कम फसल देती है.

उत्पादकता का सिद्धान्त

बीज की नई वैरायटी को तभी अनुमति दी जाती है जब वह मौजूदा वैरायटी से कम से कम 10 फीसदी ज्यादा उत्पादन दे. यदि किसी भी चरण में ट्रायल को संतोषजनक नहीं पाया जाता है तो बीज पर फिर से विचार नहीं किया जाता है.

इस हिसाब से गठबंधन और पवार कहते हैं कि जीएम सरसों का ट्रायल्स 2006-07 में बंद हो जाना चाहिए क्योंकि यह नियमों पर खरे नहीं उतरे हैं. यदि इसके बाद होने वाले ट्रायल को ध्यान में रखा जाए तो भी जीएम सरसों का प्रति हेक्टेयर उत्पादन 2029 किलोग्राम है. तो भी यह क्रांति, डीएमएच-1, एनआरसीएचबी-506 के प्रति हेक्टेयर 2200 किलोग्राम के उत्पादन से काफी कम है.

हालांकि यहां एक समस्या है-ये नियम जीएम बीजों में लागू नहीं होते हैं, केवल हाईब्रिड्स में लागू होते हैं.

आपत्तियां

जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेसल कमेटी (जीईएसी) की बैठक में कुछ सदस्य चाहते थे कि जीएम सरसों की तुलना आधुनिक हाईब्रिड्स डीएमएच-1 और क्रांति से की जाए, लेकिन कमेटी के अंतिम निर्णय में केवल –समुचित नेशनल और जोनल जांच की बात कही गई.

पवार का कहना है कि इससे यह लगता है कि सरकार जीएम सरसों के लाभों को बढ़ा-चढ़ाकर बता रही है. इसकी तुलना अन्य हाईब्रिड जैसे डीएमएच-1 आदि से नहीं की जाती है. इसकी कई वजहें भी हैं. 

पवार 2006-07 की बात याद करते हुए कहते हैं कि मैं राजस्थान के भरतपुर में स्थित रेपसीड और सरसों पर आल इंडिया को-आर्डिनेटेड रिसर्च प्रोजेक्ट की रिसर्च एडवाइजरी कमेटी का सदस्य था. 

मैं यह जानकर हैरान रह गया जब मुझे पता चला कि डीएमएच-11 की लांचिंग का विचार किया जा रहा है. जबकि इसके ट्रायल में आया था कि यह अन्य गैर जीएम वैरायटी की तुलना में ज्यादा उत्पादन देने वाली नहीं है. 

उधर, जीएम- फ्री इंडिया गठबंधन से जुड़ी कविता कुरुगंती कहती हैं कि उन्होंने आरटीआई के जरिए ताजा आंकड़े एकत्रित किए हैं. ट्रायल्स जल्दबाजी में पूरे किए गए. कुरुगंती ने पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावेडकर को लिखे पत्र में भी इस अस्वीकार्य जल्दबाजी, नियामक प्रक्रिया में शार्टकट अपनाए जाने पर आपत्ति जताई है.

पेन्टल बचाव में

डीएमएच-11 को विसिसत करने वाली टीम के नेतृत्वकर्ता पेन्टल इन दावों को सिरे से खारिज करते हैं. वह कहते हैं कि ट्रायल्स आईसीएआर द्वारा कराए गए. हम आंकड़ों को घटा-बढ़ा नहीं सकते.

स्वतः ही पता चलता है कि कुछ संगठन दुस्साहसी तरीके से सरसों में हाईब्रिड बीज उत्पादन के लिए जीएम टेक्नाल़ाजी को रोक रहे हैं. वह कहते हैं कि 2006-07 के ट्रायल इसलिए खारिज कर दिए गए थे क्योंकि उनका परीक्षण तीन स्थानों पर समुचित तरीके से नहीं कराया गया था.

तर्क के लिए समय नहीं

समझा जाता है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेसल कमेटी को आदर्शपूर्ण तरीके से इन तथ्यों पर विचार करना था और पैनल के विशेषज्ञों की राय पर निश्चय करना था, पर यह नहीं हो सका. 

कुरुगंती के अनुसार जीएम विरोधी लोग बैठक से बाहर निकल आए क्योंकि उन्हें बोलने के लिए दस मिनट का समय दिया गया जबकि उन्होंने दो घंटे की मांग की थी. 

क्या भारत के पहले जीएम खाद्य को खेतों में उगाया जाएगा, खुला सवाल यही है.

First published: 25 June 2016, 8:19 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

संवाददाता, कैच न्यूज़. जल, जंगल, पर्यावरण समेत नीतिगत विषयों पर लिखते हैं.

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