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क्या जीएम गन्ने में सूखे का समाधान ढूंढ़ रही है सरकार?

निहार गोखले | Updated on: 4 May 2016, 23:14 IST
QUICK PILL
  • महाराष्ट्र में कुल खेती का 10 प्रतिशत गन्ने की खेती का है लेकिन इसमें खेती में लगने वाला तीन-चौथाई पानी लगता है.
  • खबर आ रही है कि केंद्र सरकार गन्ने की नई प्रजाति लाना चाहती है जिसमें \r\nपानी की कम खपत हो. यानी किसानों को ज्यादा पानी की जरूरत भी नहीं होगी.
  • गन्ने की जीएम प्रजाति को इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने कोयंबटूर स्थित सुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट में विकसित किया है.

क्या जेनेटिकली मॉडिफाइड गन्ना सूखा-प्रभावित कर्नाटक और महाराष्ट्र को राहत दे सकता है? ये दोनों राज्य न केवल पीने के पानी की कमी से जूझ रहे हैं बल्कि नगदी फसलों की खेती न होने पाने के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान भी सहना पड़ रहा है. कुछ लोगों का मानना है कि गन्ने की खेती के कारण सूखा ज्यादा भयावह हो गया है क्योंकि इसकी खेती में ज्यादा पानी चाहिए होता है.

महाराष्ट्र में कुल खेती का 10 प्रतिशत गन्ने की खेती का है लेकिन इसमें खेती में लगने वाला तीन-चौथाई पानी लगता है.

अब खबर आ रही है कि केंद्र सरकार गन्ने की नई प्रजाति लाना चाहती है जिसमें पानी की कम खपत हो. यानी किसानों को ज्यादा पानी की जरूरत भी नहीं होगी और फसल न होने से आर्थिक नुकसान भी नहीं होगा.

महाराष्ट्र में कुल खेती का 10% गन्ने की खेती का लेकिन इसमें तीन-चौथाई पानी लगता है

खबरों के अनुसार पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने पूर्व कृषि मंत्री शरद पावर को चिट्ठी लिखकर कहा है कि केंद्र सरकार जीएम गन्ने का परीक्षण को बढावा देना चाहती है. गन्ने की जीएम प्रजाति को इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च ने कोयंबटूर स्थित सुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट में विकसित किया है.

जीएम फसलों पर विवाद


भारत में अब तक केवल जीएम कपास की ही व्यावसायिक खेती हुई है. स्वास्थ्य विशेषज्ञ इसके स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर हमेशा सशंकित रहे हैं.

जीएम बैंगन के परीक्षण को यूपीए सरकार ने रद्द कर दिया था. तत्कालीन पर्यावण मंत्री जयराम रमेश ने इससे जुड़े जैवसुरक्षा के मुद्दे को लेकर चिंता जताई थी.

भारत के 10 से अधिक राज्यों के करीब 33 करोड़ लोग सूखा प्रभावित हैं. शायद इसीलिए नरेंद्र मोदी सरकार जीएम गन्ने को बढ़ावा देने में विशेष रुचि दिखा रही है. 

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इस प्रस्ताव को अभी बायोटेक्नोलॉजी डिपार्टमेंट से मंजूरी मिलनी बाकी है. किसी भी जेनेटिक मॉडिफाइड प्रजाति के जमीनी परीक्षण की अंतिम मंजूरी जेेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रेजल कमिटी(जीईएसी) देती है.

अगर ये मंजूरी मिलती है तो जीएम गन्ने के ये दूसरा जमीनी परीक्षण होगा. इससे पहले जुलाई 2014 में जीईएसी ने उत्तर प्रदेश में जीएम गन्ने के परीक्षण की मंजूरी दी थी. कीड़े न लगने वाले इस जीएम गन्ने का "उत्तर प्रदेश काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च' ने विकसित किया था.

संस्थान की 2014-15 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार जीएम गन्ने की विभिन्न प्रजातियों में से पांच का सूखा-रोधक परीक्षण किया गया था.

इन जीएम गन्नों को लगाए जाने के बाद 10 दिन तक पानी नहीं दिया गया. वैज्ञानिकों ने पाया कि जीएम गन्ने की पैदावार गैर-जीएम गन्ने से अच्छी हुई. आखिरकार, 18 प्रजातियों को अंतिम परीक्षण के लिए चुना गया.

सरकार ने अपने दो साल के कार्यकाल में करीब 80 प्रतिशत प्रस्तावित जीएम बीजों के जमीनी परीक्षण की अनुमति दे दी

इंडोनेशिया ने 2013 में जीएम गन्ने का परीक्षण शुरू किया था. परीक्षण के दौरान सामान्य गन्ने की तुलना में जीएम गन्ने की 20-30 प्रतिशत ज्यादा पैदावार हुई. वहीं आठ महीने में तैयार होनेे वाला गन्ना चार महीने तक पानी के बगैर बचा रहा.

कुछ खबरों के अनुसार भारत इंडोनेशिया से गन्ना आयात करने के बारे में भी विचार कर रहा है. इसके लिए वसंतदादा सुगर इंस्टीट्यूट और आईसीएआर के अधिकारियों ने इंडोनेशिया का दौरा भी किया था.


जीएम गन्ना समाधान नहीं


सुनने में चाहे ये जितना अच्छा लगे जीएम गन्ना सूखे का समाधान नहीं हो सकता.

2012 में अमेरिकी जीएम फसलों पर के अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों ने पाया था कि सूखे की स्थिति में जीएम फसलों से ज्यादा लाभ नहीं होता.

खुद सुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट ने गन्ने की आठ ऐसी प्रजातियां जारी की हैं जिनकी सूखे की स्थिति में खेती की जा सकती है. ये प्रजातिजां जेनेटिकली मॉडिफाइड नहीं हैं.

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लेकिन लोक सभा जारी कई बयानों से पता चलता है कि मोदी सरकार जीएम बीज को लेकर अति-उत्साहित है. सरकार ने अपने दो साल के कार्यकाल में करीब 80 प्रतिशत प्रस्तावित जीएम बीजों के जमीनी परीक्षण की अनुमति दे दी है. इनमें जीएम चावल, जीएम जौ, जीएम बैंगन और जीएम आलू शामिल है.

सरकार जीएम सरसों को भी बढ़ावा दे रही है. जबकि सरकार अब तक जीएम सरसों और गैर-जीएम सरसों के उत्पादन की तुलना वाले आंकड़े जारी करने में आनाकानी कर रही है.

कोअलिशन फॉर जीएम-फ्री इंडिया के कन्वीनर श्रीधर राधाकृष्णन कहते हैं कि परंपरागत प्रजातियों से सूखे जैसी स्थितियों का सामना किया जा सकता है लेकिन सरकार जीएम प्रजातियों पर ज्यादा जोर देती है क्योंकि इससे बीज तकनीकी पर नियंत्रण का मौका मिल जाएगा.

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राधाकृष्णन कहते हैं कि चावल तक की ऐसी प्रजाति उपलब्ध है जिसकी सूखे की स्थिति में खेती की जा सकती है लेकिन सरकार ऐसी चीजों को बढ़ावा नहीं देना चाहती.

भारत के कई सरकारी शोध संस्थानों ने गन्ने की ऐसी हाईब्रिड प्रजातियां विकसित की हैं जिनकी सूखे की स्थिति में खेती की जा सकती है.

लखनऊ स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सुगरकेन रिसर्च ने 2000 से 2009 के बीच गन्ने की 23 ऐसी प्रजातियां विकसित की थीं जिनकी सूखे की स्थिति में खेती की जा सकती है. इनमें से कोई भी प्रजाति जेनेटिकली मॉडिफाइड नहीं थी.

First published: 4 May 2016, 23:14 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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