Home » इंडिया » Godse is revered by many right wing students. Is that sedition?: Happymon Jacob
 

क्या सरकार को गोडसे के समर्थक देशद्रोही नजर नहीं आते हैं?

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के प्रेसिडेंट कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के बाद सियासत गरमा गई है. शिक्षकों का कहना है कि जेएनयू में की गई पुलिसिया कार्रवाई पूरी तरह से गैर-जरूरी थी.
  • कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या नाथूराम गोडसे को हीरो की तरह पूजने वाले दक्षिणपंथी समूहों के खिलाफ राष्ट्रद्रोह की कार्रवाई की जाएगी? अगर उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मामला नहीं तो फिर जेएनयू से कन्हैया को कैसे इस आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है?

विश्वविद्यालय परिसर आम तौर पर बहस, विरोध, असहमति और लोकतांत्रिक मूल्यों को लागू किए जाने की दिशा में काम करने के लिए जाने जाते हैं लेकिन हाल के दिनों विश्वविद्यालय परिसर विचारों का मैदान होने की बजाए लड़ाई के मैदान बनते जा रहे हैं.

पहला मामला हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय का है और अब जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) इसकी चपेट में है. फिलहाल 'राष्ट्र विरोधी गतिविधियों' की वजह से जेएनयू को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. कैच ने देशद्रोह और शैक्षणिक परिसर में विचारधाराओं को थोपे जाने समेत कई मुद्दों को लेकर जेएनयू के एसोसिएट प्रोफेसर हैप्पीमन जैकब के साथ बातचीत की. 

जेएनयू छात्रसंघ कन्हैया कुमार को फिलहाल राष्ट्रद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर पुलिस हिरासत में भेजा जा चुका है

जैकब बताते हैं कि यह सरकार और दिल्ली पुलिस की अतिसक्रियता का मामला भर नहीं है बल्कि यह पूरा मामला कानून के मुताबिक भी नहीं है क्योंकि यह राष्ट्रद्रोह के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के खिलाफ जाता है. केदारनाथ बनाम बिहार राज्य और कई बाद के मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि किसी व्यक्ति को उसके भाषण के लिए तब तक गिरफ्तार नहीं किया जा सकता जब उससे हिंसा और कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा नहीं हो. 

हैदराबाद यूनिवर्सिटी, आईआईटी चेन्नई के बाद यह एक तरह से स्वायत्त संस्थाओं का चरित्र तय करने की कोशिश है. आईआईटी चेन्नई और हैदराबाद यूनिवर्सिटी में तो मामला मांसाहारी खाना परोसे जाने को लेकर शुरू हुआ था. यह आपको बताता है कि केंद्र सरकार राष्ट्रद्रोह और विरोध को लेकर दोहरा रवैया अपनाती है.

कई दक्षिणपंथी समूहों ने नाथूराम गोडसे को हीरो की तरह पूजा. तो क्या केंद्र सरकार इनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने जा रही है? अगर उनके खिलाफ राष्ट्रद्रोह का मामला नहीं तो फिर जेएनयू से कन्हैया को कैसे इस आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है?

वह भी तब जब वह लड़का कोई नारे नहीं लगा रहा था. हम  'भारत की बर्बादी होगी का समर्थन नहीं करते हैं', यह बयान उसने खुद कोर्ट के सामने दिया है.

मेरे कहने का मतलब है कि विश्वविद्यालय कैंपसों में सभी तरह की विचारधाराओं को साथ रहने की अनुमति मिलनी चाहिए. हमारे पास राजनीति, राष्ट्रवाद और न्याय की अवधारणा को लेकर सवाल जवाब करने का पूरा अधिकार है. अगर यह काम हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा? यह हमारा काम है और इसे किसी भटकाव के तौर पर नहीं देखना चाहिए.

मेरी कक्षाओं में मैं सरकार के फैसले की आलोचना करता हूं. तो क्या मुझे राष्ट्रद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया जाना चाहिए?

क्या प्रासंगिकता है राष्ट्रद्रोह कानून की?

मैं पूरी तरह से इस कानून के खिलाफ हूूं और हमें इसे खत्म करना चाहिए. यह एक औपनिवेशिक मानसिकता है. यह लोकतंत्र में ठीक नहीं है. लेकिन अगर संसद को लगता है कि यह जरूरी है तो इसके साथ कई शर्तों को जोड़ा जाना चाहिए. मसलन किसी व्यक्ति के खिलाफ तभी राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाना चाहिए जब वह राष्ट्र के खिलाफ काम कर रहा हो या फिर उसकी किसी आतंकी संगठन के साथ सांठ-गांठ हो.

लेकिन अगर कोई यह कहता है कि अफजल गुरु को असंवैधानिक तरीके से लटकाया गया तो उसे आतंकवादी करार देकर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. यह आलोचना है और यह अधिकार बना रहना चाहिए.

क्या ईरानी को भारत माता बोलना चाहिए?

केवल अदालत ही निर्णय ले सकती है न कि कोई मंत्री यह बयान दे सकता है कि फला राष्ट्र के खिलाफ है. उन्होंने यही किया और यह सब कुछ हैदराबाद विश्वविद्यालय में हो चुका है. बेमतलब के बयान दिए जाते हैं. मैं वैसे भारत में रहता हूं जहां विविधता है, लोकतंत्र है. जो धर्मनिरपेक्ष है. सभी विचारों को मान्यता मिलनी चाहिए. यह हमारी संस्कृति का हिस्सा है और यह भारत के विचार का सबसे खास पहलू है.

किसी फैसले की आलोचना कर देने भर से वह राष्ट्रद्रोही नहीं हो जाता है. बीजेपी के मंत्री अक्सर ऐसे बयान देते रहते हैं

बीजेपी की रणनीति में हैदराबाद विश्वविद्यालय हो या जेएनयू फिट नहीं बैठता है क्योंकि हमने उनके खिलाफ बोला है. हम उनके धर्मनिरपेक्षता और कश्मीर की नीति का समर्थन नहीं करते हैं. हम उनका समर्थन नहीं करते हैं. तो जब आप उनका समर्थन नहीं करते हैं तो आपको निशाना बनना होता है. 

स्मृति ईरानी को देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए काम करना चाहिए. उन्हें इस बात में नहीं पड़ना चाहिए कि क्या राष्ट्र के हित में है और क्या उसके खिलाफ.

मौजूदा सरकार को यह लगता है शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों को आकर केवल पढ़ाई कर अच्छे नंबर से पास करने पर फोकस करना चाहिए. वह नहीं चाहते कि छात्र उस तरह से पढ़ाइ करें कि उनमें राजनीतिक चेतना आए और फिर वह यथास्थिति  पर सवाल करने लगे.

बिलकुल ऐसा ही है. यह शिक्षा को लेकर बेहद संकीर्ण विचार है. जेएनयू में जब समाज विज्ञान पढ़ाते हैं और हमारे छात्र की मौजूदा मान्यताओं को चुनौती देने का प्रशिक्षण दिया जाता है. वह यही करते हैं. शिक्षा का मतलब केवल अच्छे नंबर लाना नहीं है. उन्हें सभी विचारों के लिए खुला होना चाहिए.

जेएनयू मामले से कैसे निपटा जाना चाहिए था?

उन्हें यूनिवर्सिटी की जांच कमेटी को काम करने देना चाहिए था. जांच रिपोर्ट के आधार पर फैसला लिया जाना चाहिए था. लोगों ने नारे लगाए और वह साफ तौर पर राष्ट्र विरोधी था. इस मामले में यूनिवर्सिटी को फैसला लेने देना चाहिए था. हमारे यहां इसकी प्रक्रिया है. जब कभी भी ऐसा होता है तो छात्रों को जुर्माना लगाया जाता है या फिर उन्हें सेमेस्टर से वंचित कर दिया जाता है. पुलिस का कैंपस में कोई काम नहीं है जब तक कि हिंसा जैसी स्थिति पैदा नहीं हो जाती है. जेएनयू को पता है कि किस तरह से छात्र राजनीति से निपटा जाता है.

(हैप्पीमन जैकब जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं.)

First published: 15 February 2016, 11:05 IST
 
श्रिया मोहन @shriyamohan

एडिटर, डेवलपमेंटल स्टोरी, कैच न्यूज़

पिछली कहानी
अगली कहानी