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असम में नीतीश के दांव से बीजेपी को चित करेंगे गगोई

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST
QUICK PILL
  • बीजेपी पर हिंदी भाषी पार्टी होने का आरोप लगाते हुए गगोई ने उन पर असम में घुसपैठ करने का आरोप लगाया है.
  • पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह असम में बाहरी लोगों के विरोध का मुद्दा अक्सर वहां की राजनीति के केंद्र में होता है.

असम के मुख्यमंत्री तरुण गगोई ने बीजेपी से निपटने का नया रास्ता खोजा है. गगोई बिहारी बनाम बाहरी कार्ड से असम में बीजेपी का मुकाबला करेंगे. उन्होंने बीजेपी को 'हिंदी भाषी नेताओं की पार्टी बताते हुए उन पर असम में घुसपैठ करने का आरोप लगाया है.' विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही इस तरह के हमलों में तेजी आने की उम्मीद है.

राज्य में अगले साल विधानसभा के चुनाव होने हैं. गगोई का बयान समय को ध्यान में रखकर दिया गया है. लछित बोरपुखान की जन्मशती पर गगोई के इस बयान को यूं ही नहीं देखा जा सकता. अहोम जनरल बोरपुखान ने करीब 300 साल पहले सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को धूल चटाई थी.

समय-समय पर असम की राजनीति में प्रतिबंधित संगठन उल्फा समेत अन्य स्थानीय संगठन इस मौके का इस्तेमाल असमिया अस्मिता को जगाने के लिए करते रहे हैं ताकि बाहरी लोगों के खिलाफ अपने पक्ष में समर्थन जुटाया जा सके. लछित बोरपुखान और मुगलों पर उनकी विजय गाथा का जिक्र कर गगोई अहोम समुदाय में क्लीन स्विप करने की ताक में हैं जो ऊपरी असम में बहुसंख्यक आबादी है.

चुनावों के दौरान स्थानीय संगठन हमेशा से ही असमिया अस्मिता को कुरेदने की कोशिश करते रहे हैं

इस इलाके में बीजेपी और अन्य दलों ने थोड़ी देर से शुरुआत की है. पिछले साल आम चुनाव में बीजेपी असम की 14 लोकसभा सीटों में से 7 सीटों पर कब्जा जमाने में सफल रही थी और पार्टी ने ऊपरी असम के इलाकों में भी बेहतर प्रदर्शन किया था.

हिंदी के पक्ष में बीजेपी का पूर्वाग्रह

बीजेपी के स्थानीय नेताओं की तरफ से असम की मशहूर हस्तियों का नाम भी ठीक से नहीं लिए जाने के कई मामले सामने आने के बाद गगोई ने बीजेपी पर इस तरह से हमला किया है. मुख्यमंत्री ने इस मौके का फायदा उठाते हुए यह कह डाला कि यह असम में बोलने की हिंदी शैली को थोपने की कोशिश है. उन्होंने कहा कि यह 'हिंदी भाषी लोगों की तरफ से किए गए किसी हमले से बिलकुल भी कम नहीं है.'

चुनावी प्रबंधन समिति का गठन होने के ठीक बाद 21 नवंबर को दिल्ली में हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जो प्रेस रिलीज जारी किया गया उसमें सदस्यों के नाम को लेकर कम से कम पांच गलतियां की गई थी. हाल ही में बीजेपी के प्रेसिडेंट बनाए गए सर्बनंदा सोनोवाल का नाम सर्बनंदा सोनवाल लिखा गया था जबकि हेमंत बिस्वा शर्मा के नाम को हेमंत विश्व शर्मा लिखा गया था. पार्टी के राज्य प्रभारी महेंद्र सिंह को जहां समाज सुधारक बताया गया वहीं वैष्णवी संत श्रीमंत शंकरदेव को 'बाबा संकरदेव' बताया गया.

पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों की तरह ही असम में भी बाहर से आकर बसे या काम करने वाले लोगों के खिलाफ चुनाव के दौरान भावनाओं को भड़काया जाता रहा है. हाल तक असम में बीजेपी को वैसी पार्टी के तौर पर देखा जाता रहा है जिसे स्थानीय मुद्दों को लेकर कोई समझ तक नहीं है. इस बात को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस और एआईडीयूएफ के मुकाबले बीजेपी की जमीनी पकड़ असम में बेहद कमजोर है.

गगोई का महागठबंधन

गगोई के बयान में छिपी बेचैनी को भी समझा जा सकता है. गगोई चुनाव के पहले बीजेपी के खिलाफ 'सेक्युलर दलों' का एक महागठबंधन बनाने की फिराक में हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि गगोई के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर दिनों दिन मजबूत होती जा रही है. राज्य के विभिन्न हिस्सों में विपक्षी दलों के नेताओं की रैलियों में जबरदस्त भीड़ आ रही है.

बिहार चुनाव के ठीक बाद कांग्रेस आलाकमान और जेडी-यू ने गगोई को असम में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की सलाह दी थी.

हालांकि मुख्यमंत्री ने ऐसे किसी महागठबंधन की संभावना से इनकार किया है लेकिन उनकी उम्मीद 'महाबुजाबुजी' (सहमति) पर टिकी है. उन्होंने ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, आरटीआई एक्टिविस्ट अखिल गगोई की पार्टी गण मुक्ति संग्राम असम और बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट यानी बीपीएफ से साथ आने की अपील की है. बीपीएफ कभी कांग्रेस की करीबी हुआ करती थी जो अब बीजेपी के करीब जा रही है.

उल्फा से बातचीत

उल्फा के बातचीत समर्थक धड़े के साथ सरकार की बातचीत के बाद गगोई का बयान आया. पूर्व विद्रोहियों ने महासचिव अनूप चेतिया को बातचीत में शामिल किए जाने की मांग की है. जेल में बंद उल्फा नेता अनूप चेतिया का शांति प्रक्रिया को समर्थन चुनाव में कांग्रेस को भारी पड़ सकता है.

सूत्रों के मुताबिक 2011 में सौंपी गई 38 पन्नों की मांग को लेकर बातचीत लगभग पूरी हो चुकी है. सूत्रों ने बताया, 'अधिकांश मांगों को स्वीकार किया जा चुका है. कुछ ही ऐसे मांग हैं जिन्हें खारिज किया गया है.' इसके साथ ही चेतिया को छोड़े जाने का फैसला किया जा चुका है ताकि शांति वार्ता को वैधता दी जा सके. कांग्रेस चेतिया के शांति वार्ता का समर्थन किए जाने से चिंतित है क्योंकि इससे डिबू्रगढ़ और तिनसुकिया में कांग्रेस के गढ़ को झटका लग सकता है.

First published: 27 November 2015, 10:03 IST
 
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