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गुजरात: भाजपा का लोकलुभावन बजट चुनाव में कितना असरकारी होगा?

रथिन दास | Updated on: 24 February 2017, 9:12 IST


गुजरात में दस माह बाद चुनाव हैं और भाजपा नेतृत्व के पास गुजरात में वोटरों को लुभाने के अलावा और कोई चारा ही नहीं था. गुजरात का वह शुभ चेहरा दिल्ली चले जाने के बाद गुजरात भाजपा के पास ऐसा करने की वजह कई गुना बढ़ गई थी.
यह ध्यान में रखते हुए कि युवा मतदाताओं को पार्टी की ओर खींचना जरूरी हो गया है, गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल, जो कि राज्य के वित्त मंत्री भी हैं ने आगामी एकेडमिक वर्ष में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले 3 लाख 50 हजार छात्रों को कंप्यूटर टैबलेट देने का वादा किया है.

 

अकादमिक वर्ष की अवधि को नजर में रखें तो यह टैबलेट छात्रों को विधानसभा चुनावों के लगभग 4 महीने पहले दिए जाएंगे. लेकिन अन्य राज्यों की तुलना में जहां टैबलेट या लैपटॉप मुफ्त में दिए गए हैं गुजरात के छात्रों को इस गैजेट के लिए 1000 रुपये चुकाने होंगे. यह सच है कि कॉलेज में प्रवेश लेने वाले कई छात्र तो उस समय तक वोटर भी नहीं हुए होंगे, लेकिन सच यह भी है कि वे सभी 2019 के गर्मियों तक मतदाता हो चुके होंगे जबकि देश के प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा चुनाव में दूसरे कार्यकाल के लिए वोट मांगने जाएंगे.


हालांकि इस जीरो टैक्स बजट प्रस्तावों में चुनाव का परिदृश्य साफ देखा जा सकता है, पर भाजपा के नेता इसे स्वीकार करने में हिचक रहे हैं. इस तरह गुजरात के उप मुख्यमंत्री ने बजट में उठाए गए लुभावने कदमों को इस आधार पर समर्थन किया है कि इस साल से जीएसटी लागू हो जाएगा इसलिए नये टैक्सों की जरूरत नहीं थी.

 

ग़रीबों को लुभाने की कोशिश


इस बजट की केंद्रीय थीम मानव संसाधन के समावेशी विकास को अधिकतम करना तथा कुशल और पारदर्शी क्रियान्वयन से बुनियादी ढांचे को समन्वित करने को बताया जा रहा है. इन शब्दों को आम आदमी के लिए जो भी आशय हो, तथ्य यह है कि बजट का मुख्य उद्देश्य हाशिए पर स्थित उस समुदाय तक पहुंचने का होता है जो कि राज्य में पिछले साल से हो रहे घटनाक्रमों से आहत नजर आता है.

परंपरागत सेवाएं देने वाले वर्ग जैसे नाई, धोबी, बढ़ई, दर्जी, मोची और कुम्हार आदि के लिए 10 करोड़ का पैकेज देने की घोषणा को निश्चित रूप से चुनावी वर्ष में सरकार की इन पिछड़े समुदायों तक पहुंचने की कोशिश के रूप में देखी जा सकती है. यह सही है कि इन समुदायों में कुछ ही पिछड़े समुदाय हैं जो कि गुजरात के अपने निराले गौ—सेवकों की धरपकड़ से सीधे प्रभावित हुए हैं लेकिन यह सारा समुदाय उस दमनकारी तरीकों से जरूर आंदोलित है जो कि इन धरपकड़ों का विरोध करने के लिए किए गए आंदोलन को दबाने के लिए सरकार की तरफ से किए गए थे.

 

इन लोगों को नए कौशल हासिल करने तथा नए उपकरण खरीदने के लिए दिए गए 10 करोड़ रुपये से भाजपा को कुछ वोट जरूर मिल सकते हैं. अस्सी प्रतिशत से अधिक अंक हासिल करने वाली छात्राओं को मुफ्त शिक्षा का वादा से सरकार को लोकप्रियता और चर्चा जरूर मिल सकती है पर इसके वास्तविक लाभार्थियों की संख्या बहुत कम रहने वाली है.


सरकार ने इसके अलावा बजट में 14 लाख किसानों को 1 प्रतिशत की रियायती ब्याज दर पर फसली कर्ज देने की घोषणा भी की है. इसे इस बात की स्वीकृति मानी जा सकती है कि प्रदेश के किसान कठिनाई से गुजर रहे हैं. साथ ही 1.25 लाख कृषि बिजली कनेक्शनों के लिए भी 2000 करोड़ रखे गए हैं जो कि स्पष्ट रूप से चुनावी बजट की घोषणा करता है, क्योंकि ऐसा पिछले वर्षों में नहीं किया गया.

 

जनजातिय विश्वविद्यालय


अगर शहरी युवा और किसानों को रिझाया गया है तो फिर भाजपा की सरकार जनजाति समुदाय को कैसे छोड़ सकती है जो कि कांग्रेस को मजबूत समर्थन आधार रहा है. इनको रिझाने के लिए पूर्वी जनजातीय क्षेत्र के नर्मदा जिले में एक जनजातीय विश्विद्यालय की घोषणा की गई है. इस क्षेत्र में विवि खोलने की घोषणा अपने आप में स्वागत योग्य है लेकिन हकीकत यह है कि इस क्षेत्र के अनेक स्कूलों में क्लास दस भी उपलब्ध नहीं है. ऐसे में इस क्षेत्र के लोग कैसे विवि की शिक्षा ले पांएगे.

 

बजट में भवन निर्माण में लगे 50 हजार मजदूरों के बच्चों के पोषक भोजन के लिए भी 50 करोड़ सब्सिडी की घोषणा की गई है. इस तरह से बजट में छोटे-छोटे जन कल्याणकारी कदमों की घोषणा अलग-अलग समुदायों को लुभाने के लिए की गई है जिससे सब को कुछ न कुछ मिल जाए और बदले में वे पार्टी को वोट दें.


लेकिन बजट में उन दलितों के आर्थिक उत्थान के लिए किसी कदम की घोषणा नहीं की गई है जो प्रदेश के गो सेवकों के हाथों मरे हुए जानवरों को उठाने और उनकी खाल निकालने के गंदे काम के कारण प्रताड़ित हुए हैं. लेकिन दलितों के लिए इसके जोखिम को पहचानते हुए लेदर इंडस्ट्री से जुड़े कामगरों को पहचानपत्र देने की घोषणा जरूर इस बजट में की गई है.


चुनावी वर्ष में सभी वर्गों का लुभाने को राजनीतिक दबाव भाजपा के सामने कई नई चुनौतियों के कारण बढ़ गया है जिसमें यह भी शामिल है कि इस बार प्रभावशाली पटेल सरकार से चिढ़े हुए हैं और राज्य में मोदी—विरोधी सेंटीमेंटस भी दिख रहा है. साथ इस बार कांग्रेस के साथ—साथ आम आदमी पार्टी से भी भाजपा का चुनावी मुकाबला होने जा रहा है.

 

First published: 24 February 2017, 9:11 IST
 
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