Home » इंडिया » Gopalganj Hooch Tragedy In Bihar Raises Serious Questions Over Total Prohibition
 

नीतीश कुमार की अधकचरा शराबनीति और 13 मौतें

अभिषेक पराशर | Updated on: 17 August 2016, 19:24 IST
QUICK PILL
  • अप्रैल महीने में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू किए जाने के कुछ ही महीनों के भीतर राज्य में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से करीब 13 लोगों की मौत ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराब मुक्त बिहार के दावे की पोल खोल कर रख दी है.  
  • मरने वाले सभी गोपालगंज जिले के हैं . गोपालगंज राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख लालू प्रसाद का गृह जिला है. मृतकों में अधिकांश कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि से आते हैं.
  • सरकार लोगों की मौत के लिए जहरीली शराब को कारण मानने से इनकार कर रही है लेकिन मृतकों के परिजनों का कहना है कि मौत की वजह जहरीली शराब है.

अप्रैल महीने में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू किए जाने के कुछ ही महीनों के भीतर राज्य में कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से करीब 13 लोगों की मौत ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शराब मुक्त बिहार के दावे पर सवालिया निशान लगा दिया है. 

मरने वाले सभी गोपालगंज जिले के हैं. गोपालगंज राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख लालू प्रसाद का गृह जिला है. जिले के नोनिया टोली में ही सात लोगों की मौत हुई है. मृतकों में अधिकांश गरीब मजदूर हैं. घटना के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अधिकारियों ने पूरे मामले की रिपोर्ट तलब की है. 

बीते 12 घंटों के दौरान कथित तौर पर जहरीली शराब पीने से 13 लोगों की मौत होने की खबर है. गोपालगंज सदर अस्पताल के एक डॉक्टर ने अपना नाम नहीं छापे जाने की शर्त पर बताया, 'मरने वालों की संख्या 20 से अधिक हो सकती है. कई गंभीर रूप से बीमार लोगों को इलाज के लिए गोरखपुर भेजा गया है.' 

सरकार लोगों की मौत के लिए जहरीली शराब को कारण मानने से इनकार कर रही है लेकिन मृतकों के परिजनों का साफ कहना है कि  शराबबंदी के बावजूद नगर थाने के हरखुआ रोड के पास रेलवे क्रॉसिंग के बगल में खजुरबानी में अवैध शराब बेचने की बात आम है.

मृतकों में ज्यादातर ने सोमवार की शाम को खजुरबनी में शराब का सेवन किया था. रेलवे क्रॉसिंग के पास का यह इलाका अवैध तौर पर देसी शराब की बिक्री के लिए कुख्यात है. 

राज्य में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद भी यहां पर देसी शराब की बिक्री धड़ल्ले से जारी है. डॉक्टर ने बताया, 'अस्पताल में आए मरीजों को उल्टी, सर में दर्द और बेचैनी हो रही थी. स्थिति की गंभीरता को देखते हुए इनमें से छह मरीजों को गोरखपुर भेजा गया, जहां एक-एक कर उनकी मौत हो गई.'

नीतीश कुमार ने वाराणसी की रैली में शराब मुक्त समाज और संघ मुक्त भारत का नारा दिया था.

प्रशासन का कहना है कि सभी मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में हुई है. गोपालगंज जिले के डीएम राहुल कुमार ने कहा, 'हमने जांच के लिए खून के नमूने भेजे हैं. हम पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं. रिपोर्ट आने के बाद ही हम मौत के कारणों के बारे में कुछ कह सकते हैं.'

डॉक्टर ने कहा कि प्रशासन इस मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है. 'संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का क्या मतलब है? उन्हें कोई बीमारी नहीं थी और नहीं यह इलाका किसी महामारी की चपेट में है.'

नहीं टाले जा सकते हादसे

हकीकत यह है कि बिहार सरकार ने जिस जल्दबाजी में बिना किसी पर्याप्त इंतजाम के शराबबंदी का फैसला लिया, उसमें इस तरह की घटनाएं होनी ही थीं. कुछ दिनों पहले ही पश्चिमी चंपारण में तरह का हादसा सामने आ चुका है. 

नीतीश कुमार ने वाराणसी की रैली में शराब मुक्त समाज और संघ मुक्त भारत का नारा दिया था. हालांकि राज्य में अवैध तरीके से बन रही शराब की भट्टियों को खत्म करने के लिए पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए और न ही नशे के आदी लोगों की लत छुड़ाने की दिशा में ईमानदार कोशिश की गई. 

शराबबंदी के बाद हुए बदलाव का कोई अध्ययन कराए बगैर सरकार ने यह मान लिया कि कानून बना देने से राज्य शराबमुक्त हो जाएगा. 

लोगों की माने तो पूर्ण शराबबंदी के फैसले के बाद राज्य में अवैध तरीके से बनने वाली शराब के उत्पादन और खपत दोनों में बढ़ोतरी हुई है. 

देसी भट्टियों में बनने वाली शराब में गुणवत्ता नियंत्रण का कोई कारगर तरीका नहीं होता, जिसकी वजह से जहरीली शराब से होने वाली मौतों की संभावना कई गुणा बढ़ जाती है. 

भट्टियों में बनने वाली शराब अधिकांश मामलों में मौत का कारण बनती है. राज्य के कई ऐसे जिले हैं जहां अभी भी धड़ल्ले से देसी शराब बनाई और बेची जाती हैं. 

शराबबंदी से हुए बदलाव का अध्ययन कराए बगैर सरकार ने यह मान लिया कि कानून बना देने से राज्य शराबमुक्त हो जाएगा

सरकार ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने की बजाए बिहार उत्पाद संशोधन विधेयक 2015 में बदलाव करते हुए मद्यनिषेध और उत्पादन विधेयक 2016 पारित कर दिया. नए कानून में गांव या समुदाय पर सामूहिक जुर्माना लगाए जाने का प्रावधान किया गया है.

सबसे पहले इसकी गाज मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा पर गिरी. नालंदा के जिलाधिकारी ने कैलाशपुरी गांव पर शराबबंदी कानून की अवहेलना करने के लिए सामूहिक जुर्माने का आदेश जारी कर दिया. सरकार के इस तुग्लकी फरमान के बाद डर से दलितों ने गांव से निकलने की तैयारी शुरू कर दी है. 

जिला प्रशासन का कहना था कि लगातार कोशिशों के बावजूद नालंदा जिले के इस्लामपुर प्रखंड में मौजूद इस गांव से शराब का अवैध कारोबार रुक नहीं रहा था. 

पड़ोसी राज्यों पर नियंत्रण नहीं

विश्लेषकों की माने तो बिहार की सीमा झारखंड, उत्तर प्रदेश, बंगाल और नेपाल से लगती है, जहां से धड़ल्ले से शराब की तस्करी होती है. गोपालगंज जिला उत्तर प्रदेश से सटा हुआ है और यहां पिछले कुछ महीनों में हुई छापेमारी में बड़ी मात्रा में शराब बरामद हुई है. 

डॉक्टर ने बताया कि सरकार ने नशे के आदी लोगों की लत छुड़ाने और शराबबंदी के बारे में पर्याप्त जागरूकता अभियान चलाए बिना ही शराबबंदी का फैसला थोप दिया. 

उन्होंने कहा कि गोपालगंज में जिन लोगों की मौत हुई है वह शराब पीने के आदी थे. पेशे से यह सभी सब्जी बेचने वाले और दिहाड़ी मजदूर थे. सरकार ने ऐसे लोगों की लत छुड़ाने की दिशा में कोई कोशिश नहीं की और सीधे कानून बनाकर शराबबंदी की घोषणा कर दी.

पड़ोसी राज्य और नेपाल में होने वाली आवाजाही पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है. लोग बड़ी आसानी से इन राज्यों में जाकर शराब का सेवन कर देर रात घर लौट आते हैं. जागरूकता अभियान और नशा मुक्ति केंद्र की लचर व्यवस्था के कारण लोगों के पीने की लत छूट नहीं रही है. 

हाल ही में सरकार ने ताड़ी के सेवन को प्रतिबंध के दायरे से हटा दिया है. सरकार का यह फैसला ग्रामीण क्षेत्र में नशा मुक्त समाज बनाने  की दिशा में सबसे बड़ा झटका है. 

नीतीश कुमार ने जमीनी स्तर पर बिना किसी तैयारी के सियासी फायदे के लिए जिस हड़बड़ी में शराबबंदी की घोषणा की, उसमें इस तरह की घटनाओं को टाला नहीं जा सकता. 

नए कानून के तहत जहरीली शराब पीने से हुई मौत या विकलांगता के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को मौत की सजा और 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने तक का प्रावधान किया गया है.

मौत की सजा जैसे सख्त प्रावधान के बावजूद गोपालगंज जिले में जहरीली शराब से हुई करीब दर्जन भर से अधिक लोगों की मौत यह बताने के लिए काफी है कि महज कानून की मदद से पूर्ण शराबबंदी को लागू नहीं किया जा सकता. 

First published: 17 August 2016, 19:24 IST
 
अभिषेक पराशर @abhishekiimc

चीफ़ सब-एडिटर, कैच हिंदी. पीटीआई, बिज़नेस स्टैंडर्ड और इकॉनॉमिक टाइम्स में काम कर चुके हैं.

पिछली कहानी
अगली कहानी