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गोपालकृष्ण गांधी: फांसी की सज़ा पाने वाले अधिकतर ग़रीब, मगर क्यों?

लमट र हसन | Updated on: 2 December 2016, 16:18 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • गोपाल कृष्ण गांधी की नई किताब ‘अबॉलिशिंग द डेथ पेनेल्टीः व्हाइ इंडिया शुड से नो टू कैपिटल पनिशमेंट फांसी की सज़ा पर सवाल खड़ा करती है. 
  • गोपाल कृष्ण गांधी ने कैच से हुई लंबी बातचीत में फांसी की संस्कृति और इसके कारणों पर रोशनी डाली है.

‘जब कोई किसी की हत्या करता है तो वह कानून तोड़ता है और जब सरकार उसे मौत की सज़ा देती है तो यह कानून सम्मत है.’ यह उक्ति पूर्व प्रशासनिक अधिकारी गोपाल कृष्ण गांधी की नई किताब ‘अबॉलिशिंग द डेथ पेनाल्टीः व्हाइ इंडिया शुड से नो टू कैपिटल पनिशमेंट (एल्फ बुक्स) के शुरुआती शब्द हैं. गांधी के ये शब्द सोचने पर मजबूर करते हैं कि आप मृत्यु दंड जैसे विषय पर क्या राय रखते हैं. महात्मा गांधी के पोते गोपाल कृष्ण गांधी ने अपनी किताब में एक के बाद एक कई सवाल इस सज़ा पर उठाए हैं.

कैच के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, 'अपराध का जवाब अपराध से नहीं दिया जा सकता; हिंसा का जवाब हिंसा नहीं हो सकता. इस तर्क को थोड़ा और आगे ले जाने की जरूरत है.’ वे कहते हैं कि ‘फांसी या मृत्यु दंड देने से न तो आतंक में कमी आएगी और न ही औरतों के खिलाफ अपराधों में. मैं आपराधिक जांच प्रणाली के प्रति दिन-ब-दिन जागरुक होता जा रहा हूं. अपराधी के प्रति जांच अधिकारियों का रवैया दर्शाता है कि सरकार उनके साथ कैसा सलूक करती है, जो कि मेरी नजरों में तो बिल्कुल ही आदिम काल का लगता है.’ गांधी का मानना है कि मृत्यु दंड खत्म करने के साथ ही सरकार को जांच तंत्र और जेल प्रणाली में भी सुधार करने की जरूरत है.

सवाल-जवाब

मृत्यु दंड पर गांधीजी के क्या विचार थे?

गांधीजी के इस पर दो तरह के विचार थे. आध्यात्मिक स्तर पर देखा जाए तो उनका कहना था कि जीवन लेने का अधिकार उसी को है, जो जीवन देता है यानी परमात्मा.

दूसरी ओर एक वकील होने के नाते वे मृत्युदंड के खिलाफ थे, क्योंकि यह एक ऐसी सजा है, जो वापस नहीं ली जा सकती. इस सजा में न तो सुधार की गुंजाइश है न बचाव की.

गांधीजी के साथ-साथ कुछ राजनीतिक चिंतक भी मृत्यु दंड के खिलाफ थे, जैसे डॉ. बीआर अम्बेडकर. उन्होंने भी कहा था कि मृत्यु दंड समाप्त हो जाना चाहिए.

इस पर नेहरू जी का क्या सोचना था?

मृत्यु दंड पर नेहरू के विचारों से रू-ब-रू होने का मौका मुझे नहीं मिला. लेकिन मैं एक बात जानता हूं कि 1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक सम्मेलन में मृत्यु दंड के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था और नेहरू पूरी तरह इसके पक्ष में थे. उस वक्त सरदार पटेल कांग्रेस के अध्यक्ष थे और पंडित नेहरू इस मामले में काफी सक्रिय थे.

मगर कांग्रेस के लिए मृत्यु दंड को खत्म करना बहुत ही मुश्किल था. मैं तो इसे मौका गंवाने के बराबर मानता हूं. गांधीजी की हत्या से इतर अगर उस वक्त मृत्यु दंड खत्म कर दिया गया होता तो यह भारत के राजनीतिक, दार्शनिक और नैतिक विकास में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता था. 

आपको मृत्यु दंड को खत्म करने के बारे में विचार कब आया?

जब मैं स्कूल और कॉलेज में था तो मृत्यु दंड के पक्ष में था. विद्यार्थी के तौर पर मैंने इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया. स्कूल कॉलेजों की बहस में यह मसला काफी हल्के में लिया जाता है. कहीं न कहीं मैं इस मामले में अपने नाना से काफी प्रभावित रहा, जो कि पेशे से वकील थे और मृत्युदंड पर उनका रवैया परम्परावादी या यूं कहें रूढ़िवादी था.

हाल ही श्रीलंका में जो कुछ हुआ उसने मुझे मृत्यु दंड के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया. वहां हाल ही में मृत्यु दंड खत्म कर दिया गया है. हालांकि वहां तमिल टाइगरों के खिलाफ जरूरी आवश्यक कार्रवाई की गई. मगर कानूनी तौर पर 1976 के बाद से वहां किसी को फांसी नहीं दी गई. यह अपने आप में एक रिकॉर्ड है. हालांकि तकनीकी तौर पर यह अब भी लिखित कानून है, लेकिन जल्द ही इसे प्रभावी तौर पर हटा दिया जाएगा. भूटान जैसे छोटे देशों में यह हटाया जा चुका है.

फिजी में भी... ?

हां, क्या आप इसकी कल्पना कर सकते हैं? इसलिए मृत्यु दंड के खिलाफ दुनिया के इस रवैये का मुझ पर खासा प्रभाव पड़ा.

इसका मतलब मृत्यु दंड के बारे में आपने अभी हाल ही अपनी राय कायम करनी शुरू की है.. ?

आपराधिक जांच तंत्र अपराधियों के प्रति कैसा रवैया रखता है, इस पर मैं जरूरत से ज्यादा सतर्क रहा हूं, जो बताता है कि सरकार उनके साथ कैसा सलूक कर रही है, जो कि मेरी नजरों में काफी पिछड़ा हुआ है और मध्यकालीन भारत की याद दिलाता है.

दोषी के लिए अपराध की सजा मृत्यु दंड से ज्यादा भयावह कोई और नहीं है. यह केवल फांसी पर लटकाना मात्र नहीं है, यह दरअसल संस्कृति का एक दुखदायी पहलू है.

अगर किसी को फांसी की सजा न देकर केवल उम्र कैद की सजा दी जाए तो क्या यह उतना ही बुरा नहीं है? आपने कहा है  सरकार अपराधियों को अपनी बपौती समझती है और सरकार इन्हें प्रताड़ित करती रहेगी ?

यह काफी बुरा हो सकता है. यह बहुत ही अहम मुद्दा है. मैं यही तो बताना चाहता हूं कि आप यह नहीं कह सकते कि फांसी मत दो लेकिन कोई सुधार मत करो; यह भी नहीं कह सकते.

मृत्यु दंड हटाया जाना दरअसल जांच व जेल तंत्र में सुधार का ही एक हिस्सा है, जिसमें सही मायनों में सुधार पर ध्यान देने की जरूरत है. मूलतः आपराधिक मामलों से निपटने की दिशा में सुधार की जरूरत है. अपराध के जवाब में अपराध और हिंसा के अभाव में हिंसा कोई समाधान नहीं है. नॉर्वे जैसे देशों में इस संदर्भ में अधिक लचीला रूख अपनाया गया है. जो कि आदर्श है. कम से कम हम इस आदर्श की राह पर थोड़ा तो चल ही सकते हैं. 

2011 में एक भयावह घटना घटी, जहां करीब 72 लोग मारे गए. हत्यारे को फांसी की सजा देना तो दूर किसी ने इसकी मांग तक नहीं की. कुछ ने शायद की भी हो लेकिन कमोबेश समाज को यह तो समझ आ ही गया कि इसकी अहमियत क्या है?

पेशावर कांड के बाद पाकिस्तान फिर से मृत्यु दंड को लागू कर रहा है, जो लगता है वाजिब है. भारत की ही तरह वहां भी कुछ समय तक मृत्यु दंड की सजा नहीं दी जा रही थी. अब तो पाकिस्तान में कई मामलों में फांसी की सजा दी जाती है.

पाकिस्तान भी तो सउदी अरब का अंध भक्त है?

सउदी अरब, ईरान, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया, चीन, भारत और अमेरिका, ये सभी मृत्यु दंड की सजा सुनाने में अव्वल हैं लेकिन अमेरिका में अलग-अलग प्रदेशों में नियम बदल जाते हैं.

हमारे देश में न्यायिक प्रणाली के काम करने का जो तरीका है, उसे देखते हुए लगता है कि निर्भया मामले की तरह हर केस को निपटाने के लिए त्वरित फैसला सुनाया जाना चाहिए?

मृत्यु दंड की समाप्ति और जेल प्रणाली में सुधार से अपराधों में कोई फर्क नहीं पड़ा रहा. इस संदर्भ में न तो नॉर्वे मेरा आदर्श है और ना ही कोई और देश. वहीं यूरोप के कुछ देशों और अफ्रीकी देशों ने मृत्यु दंड समाप्त कर दिया लेकिन अपराध के खिलाफ सख्ती बरती. मगर अपराध और आपराधिक प्रवृत्ति की रोकथाम के लिए सरकार का क्रूर होना जरूरी नहीं. अपराध कबूल करवाने के लिए किसी अपराधी को पीटना काफी कठिन काम है.

इसे कुछ इस तरह समझें. 

अपराध हो गया, यह अलग बात है लेकि इसकी सजा कुछ भी हो सकती है और अंततः जज जो फैसला देते हैं, वही सजा दी जाती है. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में कई खामियां हैं. सबसे मुश्किल काम तो अपराधी को पकड़ना है. अगर जेल का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि पूर्व मुख्यमंत्रियों और चार्ल्स शोभराज जैसे दूसरे नामी गिरामी लोग जेल में फाइव स्टार जेलों में रहते हैं. 

इनके अलावा ज्यादातर कैदी गरीब हैं. पहली बात कैदियों के खिलाफ सुनवाई चल रही है. इसमें ज्यादातर कैदी निर्दोष पाए जाते हैं और रिहा कर दिए जाते हैं. ये समाज के काफी गरीब तबके से आते हैं. अगर आप फांसी पर चढ़ाए गए लोगों की सूची पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि ये सब गरीब हैं. अमीर और पढ़े लिखे लोग क्या अपराध नहीं करते? मैं नहीं मानता.

क्या हमारा न्याय तंत्र वास्तविकता से परे है?

यह केवल इतना दिखाने के लिए काफी है कि न्यायिक तंत्र में गिरावट आ गई है. मुझे लगता है कि उनके काम का आकलन इस बात से नहीं होना चाहिए कि उन्होंने अपराधी को क्या सजा दी?

अफजल गुरू को फांसी दिए जाने पर आपका क्या कहना है?

मैं बहुत ही दुर्लभ फैसले बचन सिंह के फैसले के बारे में आपको बताता हूं. जिसने पूरी दुनिया की सोच बदल दी? कुछ लोग हत्या को मृत्यु के समान मानते थे, कुछ कह रहे हैं कि हत्या और मौत में फर्क है. इस पर कई बार बहस हो चुकी है और अब यह राष्ट्रपति के पास है.

क्या दया राजनीतिक कार्रवाई पर भारी पड़ेगी?

नहीं, यह राजनीतिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि राष्ट्रपति के पास यह विशेषाधिकार है. राष्ट्रपति हर तरह से विचार करता है और सरकार के परामर्श पर कार्रवाई करता है. संविधान अनुसार राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर ही कार्य करता है. वह इसके खिलाफ कार्य नहीं कर सकता. मैं यह नहीं कह रहा कि यह आदर्श स्थिति है लेकिन होता यही है. 

सरकार की इच्छा के खिलाफ राष्ट्रपति न तो किसी को फांसी की सजा दे सकते हैं और न ही खारिज कर सकते हैं लेकिन वह सरकार के साथ मिल कर फैसले में भागीदारी तो कर ही सकते हैं. आखिर वह कोई मोम का पुतला नहीं होता, उनके भी विचार होते हैं.

प्रतिभा पाटिल ने राष्ट्रपति पद पर रहते हुए फांसी की एक भी सिफारिश को नहीं स्वीकारी. अब्दुल कलाम ने एक मामले में फांसी के लिए स्वीकृति दे दी. यह उनका विशेषाधिकार था.

क्या यह दुर्लभतम मामला होने के बजाय कुछ अस्पष्ट है?

यह बहुत ही अच्छी बात है. इससे फांसी के मामलों में कमी आई है. राष्ट्रपति को भी ऐसी सिफारिशें कम ही मिली हैं. यह फैसला एक मील का पत्थर साबित हुआ है. मुझे इस बारे में एक आपत्ति यह है कि हर राष्ट्रपति की सोच अलग होती है. किसी व्यक्ति का जीवन एक व्यक्ति की सोच पर छोड़ना कहां तक उचित है. इसीलिए कुछ जजों को फांसी देने वाला जज कहा जा रहा है तो कुछ को माफ करने वाला जज कहा जा रहा है. मैं नहीं मानता कि यह सही है.

अपनी किताब में आपने नेल्सन मंडेला के उस वक्तव्य का जिक्र किया है, जिसमें उन्होंने कहा है, हत्या करना पाश्विक प्रवृत्ति की निशानी है तो क्या हमारे अंदर पशु प्रवृत्ति जाग चुकी है?

ऐसा ही है लेकिन मृत्यु दंड समाप्त करने के पक्ष में भी कई आवाजें बुलंद हुई हैं.

भविष्य के बारे में क्या खयाल है?

मृत्यु दंड खत्म होगा.

इसमें कितना वक्त लग सकता है?

कहा नहीं जा सकता. जहां तक आतंकवाद की बात है, मैं पूछता हूं क्या फांसी की सजा से आतंकवाद रोका जा सकेगा? आप कैसे पता लगा सकते हैं कि फांसी के डर से कितने आतंकी हिम्मत हारे हैं? ये लोग मौत से नहीं डरते बल्कि मौत के सौदागर हैं.

महिलाओं के खिलाफ अपराधियों का क्या ?

निर्भया कांड के बाद क्या रेप की वारदातें कम हुईं? 

महात्मा गांधी का पड़पोता होना आपको कैसा लगता है?

मैं इसके बारे में नहीं सोचता.

First published: 2 December 2016, 16:18 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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