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गौरक्षकों के गढ़ में जापानी बुखार का आतंक

आवेश तिवारी | Updated on: 9 August 2016, 13:22 IST

सावन के महीने में पूरा उत्तर प्रदेश चुनावी रंग में रंगा हुआ है. सोनिया रोड शो करके जा चुकी है पीएम मोदी कभी आ रहे हैं कभी जा रहे हैं. गाय हमारी माता है यह बात कहने वालों की तादात अचानक बढ़ गई है और साथ ही गाय माता के लिए जान लड़ा देने वाले लाल भी बढ़ गए हैं.

इन सबके बीच पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में उन मांओं की चीख लगातार बढ़ती ही जा रही है जिनके बच्चे जानलेवा इन्सेफेलाइटिस यानी मियादी बुखार की भेंट चढ़कर अकाल मौत के शिकार हो रहे हैं. यह चीख न पीएम मोदी को सुनाई देती है जो अभी कुछ दिनों पहले ही गोरखपुर का दौरा करके गए हैं न सीएम अखिलेश को. और तो और यह चीख हिंदू हृदय सम्राट इलाके के सांसद योगी आदित्यनाथ को भी सुनाई नहीं देती.

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इस इलाके में स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के तमाम दावे हैं. लेकिन सच्चाई यह है कि हर साल जापानी इन्सेफेलाइटिस से मरने वालों की तादात बढ़ती जा रही है. यह महामारी सत्तर के दशक से गोरखपुर औऱ आस-पास के जिलों में लगातार अपना पांव जमाए हुए है.

गोरखपुर में मौजूदा वर्ष में इन्सेफेलाइटिस से मरने वालों की तादात 100 के आंकड़े को पार कर गई है . आज की तारीख में बीआरडी मेडिकल कॉलेज के पीडियाट्रिक वार्ड में 400 के आसपास मरीज भर्ती हैं. इन आंकड़ों में निजी अस्पतालों में भर्ती मरीजों के आंकड़े शामिल नहीं है. सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल गोरखपुर में अब तक 104 बच्चों की मौत हो चुकी है. जबकि पिछले वर्ष इन्सेफ़ेलाइटीस से मरने वालों की तादात 89 थी.

अकाल मौतों के बीच धन का अकाल

गोरखपुर में इन्सेफेलाइटिस की इस भयावहता के पीछे सरकारी बदनीयती कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि इस बीमारी के इलाज के एकमात्र केंद्र गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में मौजूदा वित्तीय वर्ष में इस रोग के मद में एक पैसा नहीं आया है.

मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल राजीव मिश्रा का का दावा है कि उन्होंने शासन को पत्र लिखकर एक करोड़ रुपये की मांग की थी. जब हम इस संबंध में यूपी के स्वास्थ्य सचिव अरविन्द कुमार से जानकारी मांगते हैं तो वो कैबिनेट मीटिंग में व्यस्तता की बात कह कर जवाब टाल देते हैं.

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आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इन्सेफेलाइटिस को अब तक असाध्य रोगों की श्रेणी में शामिल नहीं किया था जिसका नतीजा यह हुआ कि पिछले वर्ष मेडिकल कालेज में असाध्य रोगों के लिए आवंटित की गई 3 करोड़ से ज्यादा की राशि को वापस करना पड़ा अब जबकि इस वर्ष इस रोग को असाध्य रोगों की श्रेणी में शामिल कर लिया गया मेडिकल कालेज के पास पैसे ही नहीं है. बजट नहीं है इसलिए दवाओं, मशीनरी के लिए भी पैसे नही हैं. नतीजा मासूमों की अकाल मौत के रूप में हमारे सामने है.

1978 से अब तक करीब छः हजार बच्चों की मौत

अगर गोरखपुर में इन्सेफेलाइटिस से मौत के आंकड़ों को देखा जाए तो दिल दहला देने वाला है. यहां पर जनवरी 2011 से 433 मौते केवल इसी रोग से हुई हैं जिनमें से 336 बच्चे थे वहीं 1978 में जब इस रोग का पहला मामला सामने आया था तबसे अब तक करीब 6,000 बच्चों की मौत हो चुकी है.

मानसून के वक्त इस रोग के मामले बढ़ जाते हैं क्यूंकि यह मच्छरों में प्रजनन का सबसे उपयुक्त समय होता है. इस वर्ष भी ऐसा ही हो रहा है चूंकि तैयारी नहीं है इसलिए स्थिति गंभीर होती चली जा रही है. गंभीर बात यह है कि 2006 और 2010 के बीच यहां जापानी इन्सेफेलाइटिस का बड़े पैमाने पर फैलाव हो चुका है.

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हालांकि उसके बाद लगातार वैक्सिनेशन कार्यक्रम चलाया जा रहा है. अभी जो इन्सेफेलाइटिस फैला हुआ है इसके बारे में कहा जा रहा है कि यह वायरल है. इसके किस्म की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की एक टीम ने पिछले सप्ताह ही गोरखपुर का दौरा किया है.

गोरखपुर बीजेपी के कद्दावर नेता योगी आदित्यनाथ का संसदीय क्षेत्र है. पीएम मोदी ने अपने हालिया दौरे में गोरखपुर में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान खोलने का ऐलान किया है, लेकिन यह सवाल फिर भी बार-बात उठता है कि बिना मजबूत इच्छा शक्ति के आखिरकार इस रोग पर कैसे काबू पाया जाएगा?

First published: 9 August 2016, 13:22 IST
 
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