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जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन से मजबूत होगी महबूबा की स्थिति

वजाहत क़ाजी | Updated on: 10 February 2017, 1:52 IST
QUICK PILL
  • जम्मू-कश्मीर में अगली सरकार के गठन को लेकर स्थिति सुलझने की बजाए और अधिक उलझ गई है. महबूबा मुफ्ती की चुप्पी सियासी रणनीति का हिस्सा बनती जा रही है.
  • मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद महबूबा मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने में टाल-मटोल करती रही हैं और आखिरकार राज्य में राज्यपाल शासन लगाना पड़ा. समझा जा सकता है कि महबूबा सियासी फायदे और बीजेपी के साथ गठबंधन की वजह से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुख्यमंत्री का शपथ लेने से कतरा रही हैं.

जम्मू-कश्मीर में अगली सरकार के गठन को लेकर आशंका बरकरार है और महबूबा मुफ्ती की 'रहस्यमयी चुप्पी' और नई सरकार बनाने में रुचि नहीं दिखाए जाने के बाद राज्य में फिर से चुनाव होने को लेकर अटकलों का बाजार गर्म है. सवाल यह है कि आखिर महबूबा क्या फैसला लेंगी? इस सवाल का जवाब वहीं दे सकती हैं. हालांकि सच्चाई यह है कि वह गंभीर विरोधाभासों से घिरी हुई हैं और उनकी तरफ से लिया गया हर फैसला अवसर के मुताबिक होगा. 

आखिर में क्या होगा और कैसे होगा, इसकी जानकारी समय के साथ ही मिल पाएगी. मौजूदा स्थिति में खबरों और सूचनाओं के आधार पर एक तार्किक अनुमान ही लगाया जा सकता है. पूरा मामला भारत की संघीय स्थिति और राज्यों के रणनीतिक विकल्प से जुड़ा हुआ है जिसमें राज्य का राजनीतिक नेतृत्व केंद्र से अधिक से अधिक फायदे लेने की कोशिश करता है. 

आजाद होने के बाद भारत ने संघीय ढांचे को अपनाया जिसमें संसदीय लोकतंत्र की व्यवस्था अपनाई गई जो मजबूत केंद्र पर आधारित है. भारत के संघीय ढांचे के आलोचक इसकी आलोचना करते हुए बताते हैं कि इस व्यवस्था में केंद्र को राज्यों को दबाने का मौका मिलता है. इस वजह से शक्तियों के विभाजन की एक वैसी व्यवस्था सामने आती है जिसमें कई खामियां हैं.

शक्तियों के बंटवारे की इस व्यवस्था से प्रधानमंत्री भारत में राष्ट्रपति से ज्यादा शक्तिशाली होता है. यही वजह है कि भारत के राज्य केंद्र के पिछलग्गू बन जाते हैं. उनका अस्तित्व लोगों के संघ के तौर पर नहीं रहता. राज्यों को गवर्नेंस, आंतरिक सुरक्षा और वित्तीय प्रबंधन के मामले में केंद्र पर निर्भर रहना होता है और कश्मीर जैसे राज्य में आंतरिक सुरक्षा का मामला और भी अधिक अहम हो जाता है. 

भारतीय राजनीति की व्यवस्था जम्मू-कश्मीर की मौजूदा स्थिति का आधार है. मुफ्ती मोहम्मद सईद की मृत्यु के बाद जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल का शासन लग चुका है और उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती फैसला लेने के मामले में समय ले रही है या फिर वह इस मामले में कोई फैसला नहीं ले पा रही हैं. महबूबा के पास फिलहाल तीन विकल्प हैं.

पहला विकल्प तो यह है कि छह महीनों के बाद फिर से चुनाव कराया जाए. यह उनकी पार्टी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. पीडीपी को निश्चित तौर पर वोट हिस्सेदारी और सीटों की संख्या के मामले में नुकसान उठाना होगा. हालांकि यह स्थिति उनके लिए तब फायदे की सौदा साबित हो सकता है जब चुनाव छह साल बाद हों. छह साल लंबा समय होता है और इस दौरान उनकी पार्टी के सदस्य पार्टी छोड़ सकते हैं या फिर अपनी नई पार्टी खड़ी कर सकते हैं. इस विकल्प में भी जोखिम है.

राष्ट्रपति शासन की आड़ में उन्हें सरकार चलाने की जिम्मेदारी से मुक्ति मिलेगी और वह पार्टी के लिए जनाधार मजबूत करती रहेंगी

दूसरा विकल्प बीजेपी से और अधिक रियायत लेने का है. लेकिन ऐतिहासिक तौर पर देखा जाए तो गवर्नेंस और वित्तीय लाभ कश्मीर जैसे क्षेत्र में राजनीतिक मुनाफे में तब्दील नहीं होती. इसके साथ ही बीजेपी को कश्मीर लाने का धब्बा नहीं छूटेगा.

ऐसे में तीसरा विकल्प सामने आता है. यानी राष्ट्रपति शासन को बढ़ाए जाने का फैसला. यह फैसला एक तीर से कई निशाना साधने जैसा होगा. पहला तो इससे महबूबा को बीजेपी से पिंड छुड़ाने का मौका मिलेगा और वह इसका फायदा उठा सकती हैं.

राष्ट्रपति शासन की आड़ में उन्हें सरकार चलाने की जिम्मेदारी से मुक्ति मिलेगी और वह पार्टी के लिए जनाधार मजबूत करती रहेंगी. इसके साथ ही इससे उन्हें बागियों की तरफ से पैदा होने वाले खतरे की आशंका नहीं होगी. इस स्थिति में वह अपने मुख्य विपक्षी दल नेशनल कॉन्फ्रेंस को भी कमजोर कर सकेंगी.

महबूबा को बीजेपी की केंद्र सरकार और राज्यपाल शासन के बहाने कश्मीर में भी बीजेपी की सरकार को घेरने का मौका मिल जाएगा

नेशनल कॉन्फ्रेंस विधानसभा में महज विपक्ष की भूमिका में रह जाएगी और अगले चुनाव में उनकी स्थिति मजबूत नहीं रह जाएगी. इस दौरान महबूबा को बीजेपी की केंद्र सरकार और राज्यपाल शासन के बहाने कश्मीर में भी बीजेपी की सरकार को घेरने का मौका मिल जाएगा. 

केंद्र पूरी तरह से बैकफुट पर है और राज्य की वास्तविक सियासत अपने आप ही पीडीपी के हाथों में चली गई है. और अगर कुछ गलत होता है तो केंद्र पर इसकी जिम्मेदारी आएगी. पीडीपी इस दौरान जमीनी स्तर अपनी स्थिति मजबूत करेगी और दो सालों बाद चुनाव का सामना कर सकती है. 

अगर यह महबूबा की चुप्पी के पीछे की रणनीति है तो उन्हें समझदार और चतुर नेता समझा जाएगा जिसका राज्य की राजनीति में चमकदार भविष्य है. 

First published: 3 February 2016, 11:33 IST
 
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