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कविता कुरुगंती: धांधलियों पर पर्दा डालने के लिये जीएम फसलों का डाटा छिपाया जा रहा है

निहार गोखले | Updated on: 30 May 2016, 7:42 IST
QUICK PILL
  • क्या जेनेटिकली माॅडिफाइड (जीएम) फसले सुरक्षित हैं? वास्तव में यही एक सवाल दुनियाभर में फैले जीएम विवाद की मूल जड़ है.
  • कैच ने इस मामले की याचिकाकर्ता और एलायंस फाॅर सस्टेनेबल एंड हाॅलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) की संयोजक कविता कुरुगंती से विस्तार से बातचीत की.

भारत में जहां केवल जीएम कपास को ही अनुमति मिली हुई है, में पारदर्शिता को लेकर बेहद चिंता है. सरकार की जीएम से संबंधित जानकारी को बिल्कुल गुप्त रखने की स्थिति यह है कि जैव-सुरक्षा डाटा तक को छिपाया जाता है.

एक अप्रैल को केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को जीएम परीक्षणों से संबंधित तमाम दस्तावेजों को सार्वजनिक करने का आदेश दिया है.

कैच ने इस मामले की याचिकाकर्ता और एलायंस फाॅर सस्टेनेबल एंड हाॅलिस्टिक एग्रीकल्चर (आशा) की संयोजक कविता कुरुगंती से बातचीत की. कुरुगंती ने बताया कि आदेश आने के बाद भी वे अभी तक जानकारी का इंतजार कर रही हैं.

कुरुगंती और आशा ने ही भारत में जीएम फसलों के खिलाफ अभियान की शुरुआत की है. इस साक्षात्कार मे कुरुगंती सीआईसी के आदेश की अहमियत और जीएम को लेकर केंद्र सरकार के बदलते हुए रवैये के बारे में विस्तार से जानकारी देती हैं. सरकार एक तरफ तो जैविक खेती को बढ़ावा देने का काम कर रही है और वहीं दूसरी तरफ जीएम फसलों के व्यवसायीकरण को भी बढ़ा रही है.

एनडीए सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये कई फ्लैगशिप योजनाओं की घोषणा की है

आपने हाल ही में सीआईसी में जीएम से संबंधित तमाम जानकारियों को सार्वजनिक करने से संबंधित मामला जीता है. आपको ऐसा क्यों लगता है कि सरकार इस जानकारी को छिपाना चाहती है?

केंद्रीय सूचना आयुक्त एम श्रीधर ने जैव सुरक्षा से संबंधित तमाम डाटा और जेनेटिक इंजीनियरिंग मूल्यांकन समिति (जीईएसी) की बैठक के मिनट्स नियामकों द्वारा अविलंब सार्वजनिक किये जाने के आदेश दिये हैं.

हालांकि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि समयसीमा बीतने के कई सप्ताह बाद भी जीईएसी ने अभी तक कोई डाटा साझा नहीं किया है और एक बेहद ही सीधे मामले में वह और अधिक समय मांग रहा है.

इस नियामक संस्था का दावा है कि वह अभी भी यह पता लगाने के प्रयास कर रही है कि कौन सा डाटा ऐसा है जो तीसरी पार्टी (फसल डेवलप करने वाले आवेदक) से संबंधित होने के चलते गोपनीय हो सकता है. चूंकि सुरक्षा से जुड़ा डाटा और ऐसे सुरक्षा परीक्षणों के परिणामों से संबंधित डेटा किसी भी सूरत में गोपनीय नहीं हो सकता और ऐसे में उनका रुख बिल्कुल हास्यास्पद है.

इस रवैये से यह साफ है कि सरकार इस डाटा को सिर्फ इसलिये छिपा रही है क्योंकि वह जानती है कि परीक्षणों में बड़े पैमाने पर धांधली हुई है और डाटा सामने आने पर यह साफ हो जाएगा कि कैसे यह तथाकथित परीक्षण बिल्कुल अवैज्ञानिक तरीके से किये गए हैं जो स्वतंत्र वैज्ञानिक परीक्षणों के लिये खतरी की घंटी है.

इस प्रकार की गोपनीयता बरतकर वास्तव में वे नियामक प्रणाली से जनता का विश्वास हटाने का काम कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर जैविक खेती की काफी प्रशांसा की है और कृषि मंत्रालय ने भी इसे बढ़ावा देने के लिये एक कार्ययोजना तैयार की है. सरकार ने जीएम बीजों पर राॅयल्टी लगा दी है. क्या यह सरकार पहले की अन्य सरकारों के मुकाबले जैविक खेती के लिये अधिक नहीं कर रही है?

यह सच बात है कि यूपीए सरकार के मुकाबले जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये जितना कुछ एनडीए सरकार ने किया वह तारीफ के लायक है. जैसे कम लागत, कम कर्जे और कम जोखिम वाली अजीविका को बनाए रखते हुए उपभोक्ताओं तक सुरक्षित जैविक खाना पहुंचाना. एनडीए सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिये कई फ्लैगशिप योजनाओं की घोषणा की है.

हालांकि यह एक अलग मामला है कि मोदी सरकार द्वारा जैविक खेती के क्षेत्र में किया जा रहा निवेश अपर्याप्त है.

जीएम बीजों से जुड़े राॅयल्टी को विनियमित करने और बौद्धिक संपदा से संबंधित मामलों को लेकर सरकार के भीतर ही विचारों में काफी विभिन्नता है और यह इस बात से साफ होता है कि कृषि मंत्री के विचारों को समय-समय पर प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा बदला जाता रहता है.

इस सरकार को सबसे पहले और प्राथमिकता पर इससे संबंधित नीतियों को हल करने की आवश्यकता है. इसे जल्दी से जल्दी यह समझना होगा कि भारत जैसे देश में जैविक और जेनेटिक मॉडीफाइड एक साथ नहीं मौजूद रह सकते.

जी हां, जैविक और टिकाऊ खेती के कई सफल उदाहरण मौजूद हैं

क्या एनडीए की वर्तमान सरकार के कार्यकाल के दौरान जीएम फसलों के व्यवसायीकरण पर अधिक जोर दिया जा रहा है?

बेशक... यह काफी निराशाजनक है कि केंद्र सरकार विभिन्न सरकारों और यहां तक कि बीजेपी-शासित राज्यों से उठने वाली असहमति की आवाजों को कुचलने का काम कर रही है जबकि दूसरी तरफ विज्ञान के आधार पर इस बारे में कितनी बातें हो रही है.

वास्तविक विज्ञान को असंतोष और प्रारंभिक चेतावनियों की ओर इशारा करने वाले वैज्ञानिक सबूतों का स्वागत करते हुए एक स्वस्थ सार्वजनिक बहस का स्वागत करना चाहिये.

पर्यावरण मंत्री समय-समय पर कहते आए हैं कि वे वैज्ञानिक अनुसंधान के रास्ते में नहीं आ सकते और इसलिये फील्ड-ट्रायल को नहीं रोक सकते. आखिरकार यह तमाम फील्ड-ट्रायल जीएम बीजों को व्यवसायीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.

कई विश्वसनीय समितियों ने साफ शब्दों में इस बारे में सुझाव दिया है कि जीएमओ को सिर्फ उसी सूरत में विकल्प के रूप में अपनाना चाहिये जब समाधान के लिये अन्य कोई और विकल्प मौजूद न हो लेकिन इसके बावजूद कोई नीतिगत निर्णय नहीं लिया गया है.

नियामक दिशा में कदम आगे बढ़ाने पर एक और नई बात कानों में पड़ती है कि चूंकि जीएमओ के लिये अनुसंधान इत्यादि पर अबतक करोड़ों रुपये का खर्चा हो चुका है इसलिये इसका व्यवसायीकरण कर देना चाहिये! यह बेहद डरावना विचार है.

जैविक और टिकाऊ खेती के कई सफल उदाहरण मौजूद हैं. लेकिन इसके बावजूद हम स्थाई कृषि के क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर बदलाव नहीं देख पा रहे हैं. ऐसा क्यों?

जी हां, जैविक और टिकाऊ खेती के कई सफल उदाहरण मौजूद हैं. इनमें सूखा प्रभावित क्षेत्रों में और किसानों के बीच भूजल प्रबंधन को लेकर सार्वजनिक भागीदारी के कई उदाहरण शामिल हैं.

हालांकि इसे किसानों के बीच लोकप्रिय करने के तमाम प्रयासों के बावजूद अभी तक न तो ‘‘बढ़ावा’’ मिला है और न ही ये ‘‘मुख्यधारा’’ में शामिल हो पाए हैं. ऐसा इसलिये क्योंकि ये प्रयास अधिकतर धारा के विपरीत तैरने जैसा काम हैं इसलिये इन प्रयासों को पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है.

चूंकि अधिकतर नीति-निर्माताओं और किसानों के बीच विश्वास की काफी कमी है इसलिये मानसिकता में परिवर्तन लाना बेहद जरूरी है. ऐसा इसलिये क्योंकि उन्हें ऐसा ही सोचने की ‘‘शिक्षा’’ दी गई है.

हमारी कृषि-शिक्षा और अनुसंधान प्रणाली एक ऐसे कृषि आधारित कार्यक्रम की ओर उन्मुख रहती है जिसमें भविष्य के परिदृश्य के बारे में अधिक विचार किये बिना प्राकृतिक संसाधनों का सर्वाधिक दोहन करने पर जोर दिया जाता है.

हमारे किसानों को भी हताशा की स्थिति में धकेला जाता है जो इन्हें वर्तमान और दिन पर दिन खुद को बचाए रखने के बारे में सोचने पर मजबूर करती है.

ऐसी स्थिति में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जैविक खेती के क्षेत्र में समझदारी से निवेश करते हुए एक सहायक पर्यावरण नीति तैयार करे. ऐसा किये बिना एक बड़े बदलाव की परिकल्पना करना बिल्कुल असंभव है.

मैं सरकार द्वारा जैविक और गैर-रासायनिक खेती को लेकर सरकार द्वारा बनाई गई एक टास्क फोर्स की सदस्य हूं और हमने हाल ही में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है. उम्मीद है कि हमारी तमाम सिफारिशों पर आवश्यक गंभीरता के साथ विचार किया जाएगा जो देश में स्थाई कृषि के लिये माहौल तैयार करने में काफी मददगार साबित होगा. और इसमें किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों की ही भलाई है.

अन्य देशों में कपास जैसे जीएम बीज सीधे तरीके से बेचे जाते हैं जबकि भारत में संकर के रूप में

हमारे किसानों को भी हताशा की स्थिति में धकेला जाता है जो इन्हें वर्तमान और दिन पर दिन खुद को बचाए रखने के बारे में सोचने पर मजबूर करती है.

ऐसी स्थिति में यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह जैविक खेती के क्षेत्र में समझदारी से निवेश करते हुए एक सहायक पर्यावरण नीति तैयार करे. ऐसा किये बिना एक बड़े बदलाव की परिकल्पना करना बिल्कुल असंभव है.

मैं सरकार द्वारा जैविक और गैर-रासायनिक खेती को लेकर सरकार द्वारा बनाई गई एक टास्क फोर्स की सदस्य हूं और हमने हाल ही में सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी है. उम्मीद है कि हमारी तमाम सिफारिशों पर आवश्यक गंभीरता के साथ विचार किया जाएगा जो देश में स्थाई कृषि के लिये माहौल तैयार करने में काफी मददगार साबित होगा. और इसमें किसानों और उपभोक्ताओं, दोनों की ही भलाई है.

आपने अपने कुछ अभियानों में जीएम की तुलना संकर (हाईब्रिड) से की है. क्या आप उनके पक्ष में हैं? आप एक दीर्घकालिक भविष्य में संकर के लिये क्या जगह देखती हैं?

हमें मालूम है कि तकनीक एक ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा कृषि व्यवसाय के निगम खुद को सदा के लिये सुरक्षित और मुनाफे वाले बाजार तलाश सकते हैं. जीएम और संकर दोनों ही इस श्रेणी से आते हैं.

एक तरफ जहां वास्तव में संकर प्रजाति अधिक उपज देते हैं या अच्छा फायदा करवाते हैं. लेकिन वे तभी स्वीकार्य होंगे अगर उन्हें एक ऐसे नियंत्रण तंत्र के रूप में प्रयोग न किया जाए जहां कृषि समुदाय के साथ तमाम जानकारियां साझा की जाएं.

सबसे ज्यादा दुख की बात तो यह है कि देश में किसी भी बीज का प्रजनन न तो जैविक तरीके से होता है और न ही ऐसा करते हुए गरीब किसानों की दशा का ध्यान रखा जाता है.

हमारा मानना है कि अबतक परंपरागत जर्मप्लाज्म का मूल्यांकन उनकी पूर्ण क्षमता पर नहीं किया गया है और पहले ऐसा ही किया जाना चाहिये.

इसके अलावा किसानों पर बीज की लागत न डालते हुए उन्हें बीजों के मामले में संप्रभुता प्रदान करते हुए विभिन्न किस्मों की नई प्रजातियों को तैयार करने में अधिक निवेश किये जाने की आवश्यकता है.

यहां पर यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अन्य देशों में कपास जैसे जीएम बीज सीधे तरीके से बेचे जाते हैं जबकि भारत में संकर के रूप में! यहां पर आईपीआर के साथ तकनीक का प्रयोग भी किसानों को वश में रखने के लिये किया जाता है.

First published: 30 May 2016, 7:42 IST
 
निहार गोखले @nihargokhale

Nihar is a reporter with Catch, writing about the environment, water, and other public policy matters. He wrote about stock markets for a business daily before pursuing an interdisciplinary Master's degree in environmental and ecological economics. He likes listening to classical, folk and jazz music and dreams of learning to play the saxophone.

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