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सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जोसेफ की नियुक्ति पर साधी चुप्पी, इंदु मल्होत्रा को मिला क्लीयरेंस

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 April 2018, 10:25 IST

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम की सिफारिश मानते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता इंदू मल्होत्रा को सुप्रीम कोर्ट का जज बनने की अपनी मंजूरी दे दी है. इसके साथ ही बार से सीधे सुप्रीम कोर्ट की जज नियुक्त होने वाली इंदू मल्होत्रा देश की पहली महिला होंगी. लेकिन वहीं सरकार ने उत्तराखंड के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ की पदोन्नति रोके रखने का फैसला किया है. इस मामले पर सरकार ने चुप्पी साधी हुई है.

बता दें कि जस्टिस केएम जोसेफ वही जज हैं जिन्‍होंने उत्‍तराखंड में हरीश रावत की सरकार के दौरान राष्‍ट्रपति शासन लगाने को अमान्‍य घोषित कर दिया था. इसके अलावा न्यायमूर्ति जोसेफ उस पीठ का भी हिस्सा थे, जिसने 2016 में उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले को रद्द कर दिया था.

 

गौरतलब है कि 10 जनवरी को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया दीपक मिश्रा की अगुवाई में पांच जजों की कोलेजियम ने वरिष्ठ अधिवक्ता इंदु मल्होत्रा और उत्तराखंड के चीफ जस्टिस केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने का सुझाव दिया था. लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार ने सिर्फ वरिष्ठ वकील इंदू मल्होत्रा के जज बनने को अपनी मंजूरी दी है. कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को इंदू मल्होत्रा को नियुक्त किए जाने के सरकार के फैसले के बारे में पत्र लिखेंगे.

हालांकि जस्टिस जोसेफ की फाइल अब भी लॉ मिनिस्ट्री के पास है. सरकार को लगता है कि न्यायमूर्ति जोसेफ के नाम की सिफारिश कर कालेजियम ने वरिष्ठता और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का सम्मान नहीं किया है. वह हाईकोर्ट के 669 न्यायाधीशों की वरिष्ठता सूची में 42वें स्थान पर हैं.

गौरतलब है कि न्यायमूर्ति के. एम. जोसेफ की पदोन्नति को लेकर केरल बार एसोसिएशन ने कुछ दिन पहले सर्वसम्मति से जोसेफ के नाम पर कोई भी फैसला न लेने के कारण राष्ट्रपति को पत्र लिखकर चिंता व्यक्त की थी. केरल बार एसोसिएशन की जनरल बॉडी ने सर्वसम्मति से जस्टिस केएम जोसेफ को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र भेजा था.

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केरल बार एसोसिएशन का कहना था कि कॉलेजियम ने 10 जनवरी को जोसेफ का नाम सुप्रीम कोर्ट के लिए दिया था लेकिन एक महीने बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार ने इस पर अभी तक कोई भी कार्रवाई नहीं की है. पत्र में कहा गया था कि जस्टिस जोसेफ को उनकी ईमानदारी, कानून के, ज्ञान और अपने न्यायिक कर्तव्यों का स्वतंत्र निर्वहन के लिए जाना जाता है. किसी भी जस्टिस में इस तरह के गुण होना किसी भी व्यक्ति की नियुक्ति के लिए निषेध नहीं हो सकते. किसी भी जज को ईमानदार और निडर होने के लिए किसी भी तरह की सजा नहीं दी जा सकती.

First published: 26 April 2018, 10:16 IST
 
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