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जीएम कपासः सरकार को किसानों और मॉनसैंटों में एक को चुनना है

नीरज ठाकुर | Updated on: 30 May 2016, 8:12 IST
(कैच)

जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज भारत में विवादित विषय रहा है. जीएम कपास (बीटी कॉटन) के किसानों की दुर्दशा भी मीडिया की सुर्खियों में रहती है. भारत सरकार एक बार फिर जीएम बीज को लेकर विवाद में है.

मार्च में भारत सरकार ने जीएम कपास के बीज की कीमत कम करते हुए इसपर राजस्व शुल्क 74% कम कर दिया था.

इस फैसले के बाद जीएम कपास की बॉलगार्ड II बीज (450 ग्राम पैकेट) की कीमत 830-1,000 रुपये से घटकर 800 रुपये हो गई थी.

सरकार ने ये फैसला तब लिया था जब जीएम बीज बनाने वाली कंपनी मॉनसैंटो ने कहा था कि अगर दाम कम हुए तो वो भारत में अपने कारोबार की समीक्षा करेगा.

सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एनडीए सरकार के इस साहसिक फैसले की काफी तारीफ की थी. लेकिन मई अंत में सरकार ने अपना फैसला वापस ले लिया. शायद सरकार मॉनसैंटो के दबाव के आगे झुक गई है.

जीएम बीज पर विवाद क्यों?

पिछले कुछ सालों में देश के कपास किसानों में आत्महत्या के ढेरों मामले सामने आए हैं. इसकी वजह खराब खेती, कम बारिश और बीटी कॉटन के मंहगे उत्पादन से पड़ने वाला आर्थिक बोझ बताया जाता है.

देश के 90 % कपास किसान बीटी कॉटन बीज का प्रयोग करते हैं. किसान ये बीज खरीदने के लिए पूरी तरह मॉनसैंटो नामक अमेरिकी कंपनी पर निर्भर रहते हैं.

बीटी कॉटन सामान्य कपास का जेनेटिकली मॉडिफाइड बीज है. इसे मॉनसैंटो ने विकसित किया है. ये बीज सामान्य कपास के बीज से महंगे होते हैं.

कीड़े न लगने का दावा

जीएम बीज  का भारत में 2002 में इस्तेमाल शुरू हुआ. तब ये कहा गया कि इनसे होने वाली फसल में कीड़े नहीं लगते. हालांकि महाराष्ट्र और कर्नाटक के कई किसानों की फसल कीड़े लगने के कारण बर्बाद हो गई. 

बीटी कॉटन में कीट नाशक के प्रयोग की जरूरत न होने के कारण खेती की लागत कम होने का दावा भी खरा साबित नहीं हुआ. इन कारणों से धीरे धीरे किसान बीटी कॉटन का प्रयोग बंद करने लगे.

सरकार की भूमिका

ऐसे में सवाल ये है कि क्या सरकार मॉनसैंटो से बीज का दाम कम करवा सकती है?

कुछ विशेषज्ञों के अनुसार इस समय मॉनसैंटो पर दबाव बनाना उचित नहीं होगा क्योंकि बीटी कॉटन का बॉलगार्ड II बीज अनुपयोगी हो जाएगा.

जीएम बीज का उपयोग करते रहने के लिए इसमें लगातार सुधार करते रहना होता है क्योंकि कीड़े धीरे धीरे बीज के डीएनए के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं. उसके बाद वो फसल को नुकसान पहुंचाने लगते हैं.

नए बीज की समस्या

जीएम बीज के उपयोग का अर्थ ये हुआ कि आप एक ही कंपनी के ऊपर बीज के लिए निर्भर हो जाते हैं. कंपनी अपने बीज ऊंचे दामों पर बेचना चाहती है.

कीट प्रतिरोधक कपास के बीज की कीमत क्या होगी ये न तो सरकार को पता है, न ही किसानों को. जीएम बीज और मॉनसैंटो पर अत्यधिक निर्भरता के कारण ही पूरी दुनिया के एक्टिविस्ट इसका विरोध करते हैं.

वहीं कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि लंबे समय तक जीएम बीज के प्रयोग से मिट्टी की गुणवत्ता कम होती जाती है और उपज की मात्रा कम होने लगती है.

ऐसे में ये सरकार की जिम्मेदारी  है कि वो किसानों के हितों का ख्याल रखे और मॉनसैंटो के दबाव में न आए.

First published: 30 May 2016, 8:12 IST
 
नीरज ठाकुर @neerajthakur2

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बिज़नेसवर्ल्ड, डीएनए और बिज़नेस स्टैंडर्ड में काम कर चुके हैं.

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