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हाउसिंग फाइनेंस का मौजूदा तरीका रियल एस्टेट सेक्टर में गिरावट की बड़ी वजह है

पी पुल्लाराव | Updated on: 11 July 2016, 7:35 IST
(आर्य शर्मा)
QUICK PILL
  • एक ओर सरकार जहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद और बाकी बहुत से शहरों में 2020 तक \'सबके लिए आवास\' की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर आसानी से ऐसे करोड़ों फ्लैट मिल जाएंगे जिनके कोई खरीददार नहीं है.
  • दरअसल, यह पूर्णत: काल्पनिक और पुराना तरीका है क्योंकि विकसित राष्ट्रों विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका में संपत्ति खरीद और मकान की अर्थव्यवस्था को लेकर बिल्कुल भिन्न रवैया है.

भारत में करोड़ों मकान और फ्लैट बने हुए हैं लेकिन बिक नहीं पा रहे हैं, दूसरी तरफ देश में एक बड़ी आबादी बेघर है. एक ओर सरकार जहां राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नोएडा, गुड़गांव, फरीदाबाद और बाकी बहुत से शहरों में 2020 तक 'सबके लिए आवास' की योजना बना रही है, वहीं दूसरी ओर आसानी से ऐसे करोड़ों फ्लैट मिल जाएंगे जिनके कोई खरीददार नहीं है.

भारत में बैंक और कई अन्य वित्तीय संस्थान आवास के लिए कर्ज उपलब्ध करवाते हैं. परन्तु ये योजनाएं आपके लिए हैं या नहीं यह आवेदक की आय और आयु पर निर्भर है. अगर आपकी उम्र 60 साल से अधिक है और सेवानिवृत्त हैं तो यह ऋण योजना आपके लिए नहीं है. 

अगर आपकी नौकरी और आयु इन योजनाओं के अनुरूप है तो आपको कर्ज मिल सकता है. सामान्यत: कर्ज योजना ऐसी होती हैं जिसकी अवधि 7 वर्ष से कम नहीं होती. बैंक यह योजना इस आधार पर बनाते हैं कि आपकी आय कितनी है.

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भारत में बैंक आपकी वास्तविक आय और उम्र के अलावा किसी और पक्ष को अहमियत नहीं देते. ज्यादा से ज्यादा वे ऐसी आय को गिनते हैं जो किसी संपत्ति से किराये के रूप में मिल रही हो.

दरअसल, यह पूर्णत: काल्पनिक और पुराना तरीका है क्योंकि विकसित राष्ट्रों विशेष रूप से उत्तरी अमेरिका में संपत्ति खरीद और मकान की अर्थव्यवस्था को लेकर बिल्कुल भिन्न रवैया है.

विकसित अर्थव्यवस्था में हाउसिंग फाइनेंस

घर खरीदने के लिए कर्ज देने से पहले जिन घटकों को आधार बनाया जाता है, वे हैं- आय, उम्र व ऐसे ही कुछ अन्य. परन्तु संपत्ति की कीमत और समय के साथ इसकी कीमत में होने वाला इजाफा सबसे महत्वपूर्ण सवाल है. संपत्ति की भावी कीमत और समय के साथ उसमें वृद्धि की संभावना का आकलन किया जाता है.

भारत में लोन देने वाले बैंक आवेदक की संभावित आयु और कीमत को सर्वाधिक महत्व देते हैं. जबकि इसके विपरीत अमेरिका में बैंक लोन देने के वक्त संपत्ति की संभावित आयु और इसकी कीमत को ज्यादा महत्व दिया जाता है. इसीलिए अमेरिका में मकान या संपत्ति पर कर्ज की अवधि 25-30 साल तक की होती है.

संक्षेप में कहा जाए तो विदेश में किसी भी और बाजार की ही तरह प्रॉपर्टी बाजार भी है

वहां खरीददार एक निश्चित रकम डाउन पेमेंट के रूप में देकर, शेष 30 साल तक की किस्तों में चुकाते रहते हैं. अगर किस्तें नहीं चुकाई जाती हैं तो मकान या सम्पत्ति की जब्ती के काफी सख्त कानून हैं. इस पर अदालत मकान मालिक को उसमें असीमित समय तक रहने की रियायत बिल्कुल नहीं देती है. 

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अगर खरीददार किस्तें नहीं चुका पाता है तो मकान जब्त करना अवश्यंभावी है. एक बार जब्त हो जाने के बाद संपत्ति कर्ज देने वाली संस्था की हो जाती है और वह इसे किसी को भी बचने के लिए स्वतंत्र है.

संक्षेप में कहा जाए तो विदेश में किसी भी और बाजार की ही तरह प्रॉपर्टी बाजार भी है. भारत में जैसे शानदार यूज्ड कार का बाजार है. स्वतंत्र रूप से कार बेची या खरीदी जाती हैं. अमेरिका में इसी तर्ज पर पुरानी प्रॉपर्टी का खुला बाजार है. इसीलिए अमेरिकी अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से प्रॉपर्टी बाजार पर निर्भर है.

संपत्ति खरीदना आसान

आप अमेरिका में अपने लिए एक संपत्ति पसंद कर कुछ ही दिनों में इसके लिए ऋण का इंतजाम कर सकते हैं. बस आपको इसके लिए न्यूनतम आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी. परन्तु सबसे महत्वपूर्ण पहलू उक्त संपत्ति की स्थिति, आयु और उसकी कीमत है.

दूसरी ओर भारत में लोन की राशि खरीददार पर अधिक निर्भर करती है संपत्ति पर कम. इसके अलावा भारत में डाउन पेमेंट बहुत अधिक है. भारत सरकार ने हाउसिंग फाइनेंस की समस्या पर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है.

जब हर कोने में लाखों फ्लैट बिकने के इंतजार में खाली पड़े हैं और करीब इतने ही लोग बेघर हैं तो स्थिति बदलनी चाहिए. सरकार को सीधे-सीधे हाऊसिंग फाइनेंस सेक्टर की कार्यप्रणाली बदलनी होगी. ऐसे कानून और नीतियां बनानी होंगी, जिसके अनुसार संपत्ति को केंद्र में रख कर कर्ज दिया जाए न कि व्यक्ति की आयु को.

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सरकार केवल एफडीआई की बात करती है जबकि करोड़ों लोग अपने घर का सपना संजोए हुए हैं

हमारे बैंकों में गारंटर पर बहुत अधिक जोर दिया जाता है जबकि अमेरिका में संपत्ति और उसकी बढ़ती कीमतों की संभावना ही गारंटर है. सरकार को तुरंत संपत्ति जब्तीकरण के भी नियम बनाने चाहिए, जिससे भारत में हाऊसिंग बाजार को बूम मिलेगा.

आज आप अगर किसी से पूछें कि क्या आप एक मकान खरीदना चाहते हैं या एक सेकेंड हैंड मकान, तो जवाब मिलेगा- हां, पर अगर उस पर तीस साल की किस्त है या फिर मौजूदा सात साल से ज्यादा की. सामान्यत: भारत में स्वरोजगार करने वालों को ऋण नहीं मिलता. बैंक सम्पत्ति नहीं बल्कि संभावित खरीददार को लोन का आधार मानता है.

हमारी सरकारों ने इस ओर से अभी तक आंखें मूंद रखी हैं. हम अमेरिका में प्रशिक्षित आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन और नीति आयोग के उपाध्यक्ष व मुख्य आर्थिक सलाहकार जो अमेरिका से प्रशिक्षित हो कर लौटे हैं, इन सब विशेषज्ञों के बारे में काफी सुनते हैं. परन्तु इन सबने भी कभी हाऊसिंग मार्केट और आसान व लम्बे ऋणों पर गौर नहीं किया.

अगर लोन की अवधि 25-30 साल होती तो अभी कई मकान बिक चुके होते. लोग पैसा बचत खातों में रखने के बजाय सैकेंड हैंड मकान खरीदना पसंद करेंगे. इससे अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही बैड लोन में कमी आएगी जो कि बिल्डरों ने लिया हुआ है.

सरकार केवल एफडीआई की बात करती है जबकि करोड़ों लोग अपने घर का सपना संजोए हुए हैं. जब तक हाऊसिंग सेक्टर में बड़े पैमाने पर सुधार नहीं हो जाते मकानों को खरीददार नहीं मिलेंगे और सपने कभी हकीकत नहीं बनेंगे.

First published: 11 July 2016, 7:35 IST
 
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